संगीत जगाए दर्द भरी यादें | दुनिया | DW | 05.01.2009
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दुनिया

संगीत जगाए दर्द भरी यादें

1847 में 38 साल की उम्र में प्रसिद्ध पाश्चात्य संगीतकार मेंडल्ससोन की मौत हुई. 200 साल और कई विवादों के बाद मेंडेल्ससोन को दुनिया के महान फ़नकारों के बीच अपनी जगह मिल पाई है.

19 वीं सदी के महान संगीतकार फेलिक्स मेंडल्ससोन बार्थोल्डी

19 वीं सदी के महान संगीतकार फेलिक्स मेंडल्ससोन बार्थोल्डी

संगीत. अभिव्यक्ति के हर माध्यम की तरह उतना ही राजनीतिक. इसी बात को संगीत के संदर्भ में देखा जाए तो ऐसे कछ कलाकार हैं जो बहुत हद तक संगीत की परिभाषा बदल देते हैं. फ़ीलिक्स मेंडल्ससोन भी उन फ़नकारों में से हैं, जिन्होंने संगीत को पूजाघरों और रईसों की जागीर न मानकर उसे एक लोकप्रिय माध्यम बनाने की कोशिश की.

इस साल 2009 में विश्व फ़ेलिक्स मेन्डेल्ससोन की 200वी वर्षगांठ मना रहा है. ज़ाहिर है इस अवसर पर दुनिया भर में मेन्डेल्ससोन की चर्चा होगी, उन पर गोष्ठियों और सेमिनारों का आयोजन होगा, और विभिन्न कलाकार मेन्डेल्ससोन की धुनों को बजाने का यह मौका नहीं छोड़ेंगे.

BdT Caspar-David-Friedrich-Ausstellung in Essen Wanderer über dem Nebelmeer

जर्मन उदासीनता की भावना की याद दिलाता है मेंडेल्ससोन का संगीत

मेंडल्ससोन का जीवन

फ़ेलिक्स मेन्डेल्ससोन 1809 में हाम्बुर्ग के एक समृद्ध यहूदी परिवार में पैदा हुए. उनके पिता ने उनकी पैदाइश के कुछ ही साल बाद ईसाई धर्म को गले लगा लिया. इसके बाद से यह परिवार मेन्डेल्ससोन-बार्थोल्डी के नाम से जाना जाने लगा.

9 साल की उम्र में मेन्डेल्ससोन अपनी बहन फ़ैनी के साथ पहली बार मंच पर उतरे. उनके पियानो वादन ने लोगों का दिल जीत लिया और उनकी तुलना प्रसिद्ध संगीतकार मोत्सार्ट से होने लगी. संगीत में तालीम हासिल करने के बाद मेन्डेल्ससोन ने ड्युसेल्डोर्फ़ के नगर संगीतकार का पद सम्भाला. इसके पश्चात लाइपत्सिग में उन्होंने चर्च संगीत का निर्देशन किया. 1841 में वह प्रशा के राजा फ़्रीड्रिष विलहेल्म चतुर्थ के राज्य संगीत निर्देशक बने. इस बीच उनहोंने लाइपत्सिग में जर्मनी का पहला संगीत महाविद्यालय स्थापित किया. 1847 में बहन फ़ैनी की मौत ने मेन्डेल्ससोन को तोड़ दिया. वे इतने दुखी हुए कि दिल के दौरे से कुछ ही महीनों के बाद उनकी मौत हो गयी. वह 38 के थे.

संगीत, समाज और संस्कृति

मेन्डेल्ससोन का संगीत 19वीं शताब्दी में जर्मनी की सांस्कृतिक गतिविधियों का एक अनूठा उदाहरण है. कला एक ऐसा माध्यम माना गया जिससे अच्छाई और बुराई दोनों को दर्शाया जा सकता है क्योंकि वह मनुष्य के तजुर्बों का हिस्सा हैं. प्रकृति को अपनी कलाओं में अहम भूमिका देते हुए कलाकारों ने चेतना को दिखावे से ऊंचा माना. लोकसंगीत, नृत्य और कहानियों पर आधारित कृतियों ने सांस्कृतिक विश्व में नयी जान डाल दी. जर्मन साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत में रोमांटीक के नाम से प्रसिद्ध इस वक़्त का मक़सद था मानवीय जज़बातों को आवाज़ देना और संगीत में भी जज़बातों को उकसाने वाले गीत लि खे जाने लगे.

Zubin Mehta dirigiert in Luzern

भारतीय संगीत निर्देशक ज़ूबिन मेहता ने मेंडेल्ससोन की कई रचनाओं को प्रस्तुत किया है

19वीं शताब्दी में मेन्डेल्ससोन के अलावा फ़्रेडेरिक शोपां, फ़्रांत्स लिस्त्ट और रूस के चाईकोव्स्की ने भी संगीत जगत को अपने हुनर से सजाया. सदियों से या तो केवल ईश्वर या समृद्ध घरानों के लिये बनाये जाने वाले धुनों को इस तरह अवाम के दिल में जगह मिली.

19 वीं शताब्दी के ख़त्म होते होते, मेन्डेल्ससोन की कला की भारी निंदा होने लगी. इसकी वजह थी, लोगों में यहूदियों के प्रति बढ़ती नफ़रत. आज, नए गीतकारों की मेहनत और कई वर्षों के अनुसंधान के बाद मेन्डेल्ससोन को दुनिया के बड़े फ़नकारों के बीच अपनी सही जगह मिली है.

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