श्रीलंका की सिलोन टी: 200 साल से हो रहे शोषण की दास्तां | दुनिया | DW | 23.09.2020
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दुनिया

श्रीलंका की सिलोन टी: 200 साल से हो रहे शोषण की दास्तां

श्रीलंका के बागानों की सिलोन टी अपने स्वाद के लिए प्रसिद्ध होनी चाहिए. लेकिन भारतीय तमिलों के जो वंशज 200 साल से इस स्वाद को दुनिया भर में पहुंचा रहे हैं, उनकी जिंदगी हर दिन कड़वी हकीकतों का सामना करती है.

श्रीलंका में चाय के बागान

भारतीय तमिलों के वंशज श्रीलंका में पीढ़ियों से यही काम कर रहे हैं

श्रीलंका के चाय बागानों को दूर से देखने पर लगता है कि पहाड़ियों पर किसी ने हरा कंबल बिछा दिया है और अपनी टोकरियां लेकर चढ़ती महिलाएं रंग बिरंगी चीटियों जैसी लगती हैं. भारतीय तमिलों के बहुत से वंशज श्रीलंका के चाय बागानों में लंबे समय से काम कर रहे हैं. लेकिन आज भी वे श्रीलंकाई समाज में सबसे निचले पायदान पर खड़े हैं. ज्यादातर लोग थोड़े से पैसों के लिए बहुत मुश्किल परिस्थितियों में काम कर रहे हैं.

हम श्रीलंका के चाय बागान वाले एक गांव नानु ओया में पहुंचे. यहां ज्यादातर महिलाएं पीढ़ियों से चाय की पत्तियां तोड़ने का काम कर रही हैं. इन्हीं में शामिल हैं 50 वर्षीया कोवसालियादेवी पलानी. उन्होंने 16 साल की उम्र में यह काम शुरू किया था. श्रीलंका के चाय उद्योग में उनके जैसी पांच लाख महिलाएं काम करती हैं. इनमें ज्यादातर का संबंध उन भारतीय तमिल परिवारों से है जिन्हें 1820 के दशक में काम करने के लिए भारत से ब्रिटिश सिलोन में लाया गया था.

श्रीलंका के चाय बागान

चाय बागानों में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर गरीबी में जी रहे हैं

श्रीलंका में जब कॉफी की खेती नाकाम हो गई तो अंग्रेजों ने चाय की खेती शुरू की. इस उद्योग को चलाने के लिए बागान मालिकों को बहुत से सारे लोगों की जरूरत थी और फिर भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु से यहां लोगों को लाया गया. हालांकि ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामी गैरकानूनी थी, लेकिन उस वक्त इन कामगारों को कोई पैसा नहीं दिया जाता था और वे पूरी तरह बागान मालिकों के रहमो करम पर थे. जब ये लोग यहां आए तो कर्ज में दबे हुए थे क्योंकि यहां आने की यात्रा का खर्च उन्हें खुद उठाना पड़ा था. फिर 1922 में नियमों को बदला गया.

कामगार बेहद दयनीय परिस्थितियों में रहे. उनकी बस्तियों में कोई साफ सफाई नहीं थी, पीने का साफ पानी भी नहीं था और ना ही चिकित्सा सुविधा या बच्चों के लिए स्कूल थे. बहुत मुश्किल हालात में उन्होंने काम किया. जब 1948 में श्रीलंका आजाद हुआ तो चाय कामगारों को कानूनी तौर पर "अस्थायी आप्रवासी" का दर्जा दिया गया, लेकिन नागरिकता नहीं दी गई.

1980 के दशक में श्रीलंका में 200 साल से ज्यादा रहने के बाद भारतीय तमिलों के वंशजों को नागरिकता का अधिकार दिया गया. लेकिन अब भी वे श्रीलंका में सबसे पिछड़े और गरीब तबकों में गिने जाते हैं.

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मुश्किल काम

पलानी काम पर जाने के लिए तैयार हैं. वह अपनी पड़ोसनों को साथ लेती हैं और चाय बागान की तरफ निकल पड़ती हैं. चाय बागान जहां से शुरू होता है, वहां एक सुपरवाइजर उनकी हाजिरी दर्ज करता है. और दिन के आखिर में वही यह भी लिखता है कि किसने कितने किलो पत्तियां तोड़ीं. सुपरवाइजर ही उन्हें बताता है कि कहां से पत्तियां तोड़नी हैं और इसके बाद वे पहाड़ी पर चढ़ने लगती हैं.

इनमें से ज्यादातर महिलाएं नंगे पैर हैं. जल्द ही वे अपना काम शुरू कर देती हैं और सबसे कोमल पत्तियों को तोड़ती हैं. पलानी कहती हैं, "मेरा एक बेटा है और एक बेटी. सौभाग्य से उनमें से कोई भी यहां काम नहीं करता है." वह हमें बताती हैं, "यहां काम करने वाली महिलाओं की संख्या घटती जा रही है. युवा महिलाएं यहां काम नहीं करना चाहती हैं क्योंकि यहां पैसा कम मिलता है और मेहनत बहुत करनी पड़ती है."

हर दिन 700 श्रीलंकाई रुपये कमाने के लिए पलानी को कम से कम 18 किलो पत्तियां जमा करनी पड़ती हैं. वह बताती हैं, "जो आदमी पहले चाय बागानों में काम करते थे, उनमें से बहुत से अब दूसरे काम करते हैं. कई लोगों के तो दूसरे बागान हैं और वहां वे ज्यादा कमा रहे हैं."

दिन भर काम करने के बाद महिलाएं नीचे उतरती हैं. उनकी पीठ पर चाय की पत्तियों से भरी टोकरियां हैं. सुपरवाइजर सबकी पत्तियों को तोलता है. पलानी कहती हैं, "आज का दिन अच्छा रहा. मैंने 18 किलो से ज्यादा पत्तियां जमा कीं." वह मुस्करा कर अपने कार्ड को देखती हैं और कहती हैं, "आज मैं 700 रुपये से ज्यादा कमाऊंगी."

वीडियो देखें 03:47

चाय पीना सीखता यूरोप

अधिकारों की मांग

श्रीलंका में अभी प्रति वर्ष 30 करोड़ किलो चाय का उत्पादन होता है. श्रीलंका दुनिया भर में चीन, भारत और केन्या के बाद चाय का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है. लेकिन यहां चाय बागानों में काम करने वाले बहुत से लोग गरीबी में जी रहे हैं. इस मुद्दे को वे अकसर श्रीलंकाई अधिकारियों के सामने उठाते हैं. लेकिन कोई खास नतीजा नहीं निकलता.

चाय मजदूर हताश हैं क्योंकि उनका मेहनताना बढ़ नहीं रहा है जबकि महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है. मजदूरों ने उचित मेहनताने की मांग के साथ विरोध प्रदर्शन भी किए. पूरे श्रीलंका में दसियों हजार चाय मजदूरों ने हाल से सालों में एकजुट होकर हर दिन कम से कम एक हजार श्रीलंकाई रुपये का मेहनताना देने की मांग की है. श्रीलंका के चाय मजदूरों के सबसे बड़े आंदोलनों में से एक का नाम ही "1000 मूवमेंट है."

अक्टूबर 2018 में चाय बागान मालिकों और मजदूरों के बीच एक समझौता हुआ था. उसमें कंपनियों ने हर दिन एक हजार रुपये देने की मांग को मानने से इनकार कर दिया. हर दिन का मेहनताना 500 रुपये से बढ़ाकर 700 कर देने पर अस्थाई सहमति बन गई, हालांकि कंपनियों को अभी इस समझौते पर हस्ताक्षर करने बाकी हैं.

चाय के बागान

चाय मजदूरों में अपने काम को लेकर हताशा दिखती है

मजदूरों का कहना है कि हाजिरी और प्रॉडक्टिव इंसेंटिव्स को मिलाकर पुराना मेहनताना 730 रुपये था. नए समझौते में इन इनसेंटिव्स को हटाया गया है. इस तरह सिर्फ 20 रुपये ही बढ़ाए गए हैं. श्रीलंका में अब कम ही लोग होंगे जो चाय बागानों में काम करने वालों के हर दिन के पारिश्रमिक को 1,000 रुपये से कम रखने के हक में हैं.

खुशी और संतोष

पलानी घर पहुंचने पर सबसे पहले अपनी नौ महीने की पोती के पास जाती हैं. जब वह उसका हाथ पकड़ती हैं तो उनका चेहरा खिल जाता है. लगता है कि इससे उनकी दिन भर की थकान उतर जाती है. वह कहती हैं, "ये मेरे घर की नन्ही गुड़िया है." इसके बाद पलानी अपने कपड़े बदलती हैं, खाना खाती हैं और फिर वापस पोती के साथ खेलने पहुंच जाती हैं.

पलानी कहती हैं, "मैं जो काम करती हूं, वह मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है. बहुत मेहनत करनी पड़ती है." लेकिन उन्हें एक संतोष भी है. वह कहती हैं, "सात पीढ़ियों से मेरे परिवार में यह काम हो रहा है. लेकिन अपने परिवार में इसे करने वाली मैं आखिरी सदस्य हूं."

रिपोर्ट: लॉरा फोर्नेल 

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