शियाओं को समझाने प्रधानमंत्री क्वेटा पहुंचे | दुनिया | DW | 13.01.2013
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दुनिया

शियाओं को समझाने प्रधानमंत्री क्वेटा पहुंचे

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ रविवार को क्वेटा में शिया समुदाय के लोगों से मिलने पहुंचे. जातीय हिंसा के अब तक की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक में मारे गए लोगों के शवों के साथ पीड़ित परिवार प्रदर्शन पर बैठे हैं.

शिया हाजरा समुदाय के हजारों लोग 86 शवों के साथ भारी बारिश के बीच पिछली दो रातों से उस जगह पर बैठे हैं जहां हुए धमाके ने उनके अपनों की जान ले ली. गुरुवार की रात बम धमाके में इन लोगों की जान गई. पीड़ित परिवार के लोगों ने साफ कह दिया है कि जब तक उनकी सुरक्षा की गारंटी पक्की नहीं हो जाती वे मारे गए लोगों का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे. इस्लामी परंपरा में माना जाता है कि मरने वाले का अंतिम संस्कार जितनी जल्दी हो सके कर देना चाहिए. अपने प्रियजनों के शव को जमीन पर इतनी देर तक रख कर बैठे लोग किस तरह के दुख और सदमे की हालत में हैं इसे समझा जा सकता है.

शिया नेता मांग कर रहे हैं कि प्रांत की सरकार को बर्खास्त कर दिया जाए और सेना क्वेटा को अपने घेरे में ले ले जिससे की सुरक्षा की गारंटी हो सके. दो बेटों के शवों के साथ प्रदर्शन पर बैठी 56 साल की सकीना बीबी कहती हैं, "हमें यह भरोसा चाहिए कि हत्यारे पकड़े जाएंगे और हमारे जवान बच्चों की और मौत नहीं होगी." यह कहते कहते उनकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली है और रूंधे गले से आवाज फूटी, "वो मेरे सब कुछ थे...यहां बैठने से वो वापस नहीं आएंगे, लेकिन विरोध करना हमारा अधिकार है."

प्रधानमंत्री रविवार की सुबह क्वेटा में स्थानीय नेताओं से बात करने के लिए रवाना हुए. क्वेटा पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान की राजधानी है. इससे पहले शनिवार को प्रधानमंत्री की तरफ से धार्मिक मामलों के मंत्री के नेतृत्व में भेजे एक प्रतिनिधिमंडल से शिया समुदाय के लोगों ने मिलने से इनकार कर दिया था. अब तक सरकार की तरफ से शिया समुदाय के लोगों पर हुए हमलों के बारे में कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया है. प्रतिबंधित आतंकवादी गुट लश्करे ए जांगवी ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है. सुन्नी मुस्लिमों का आतंकवादी संगठन लश्कर ए जांगवी शिया समुदाय के लोगों को देश से बाहर निकालना चाहता है. पाकिस्तान की कुल 18 करोड़ आबादी में 20 फीसदी हिस्सेदारी शिया मुस्लिमों की है.

पाकिस्तान में बीते महिनों में जातीय हिंसा में काफी तेजी आई है. हालांकि आतंकवादी हमलों की आंच थोड़ी कम हुई है. मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि पिछले साल 400 लोग जातीय हिंसा में बमों और बंदूकधारियों की गोलियों का निशाना बने. इस साल की शुरूआत में ही भारी हिंसा हुई है. ह्यूमन राइट्स वॉच का मानना है कि इस साल यह हिंसा और बढ़ सकती है.

एनआर/आईबी (रॉयटर्स, एएफपी)

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