शित्जोफ्रेनिया का खतरनाक जीन | विज्ञान | DW | 08.08.2013
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विज्ञान

शित्जोफ्रेनिया का खतरनाक जीन

वैज्ञानिकों ने उत्तरी फिनलैंड के सुदूर इलाकों में शित्जोफ्रेनिया का एक बिल्कुल स्थानीय जीन ढूंढ निकाला है. दूसरे जीन की तुलना में इस जीन से बीमार होने का जोखिम तीन गुना ज्यादा है.

दुनिया भर में इंसानों के शित्जोफ्रेनिया का शिकार बनने का खतरा करीब एक फीसदी है लेकिन उत्तर पूर्वी फिनलैंड में इस मानसिक बीमारी का खतरा दुनिया के बाकी हिस्से के मुकाबले तीन गुना ज्यादा है. सुदूर उत्तरी इलाके ग्रामीण समुदायों के घर हैं और कुल मिला कर 40 परिवार हैं. हेलसिंकी के इंस्टीट्यूट फॉर मॉलिक्यूलर मेडिसिन में आनुवांशिकी विज्ञानी आरनो पलोटी ने बताया कि इन समुदायों की जीन पृष्ठभूमि एकदम अलग है, "हमने शित्जोफ्रेनिया को अच्छे से समझने के लिए इसे रिसर्च के अच्छे मौके की तरह देखा." शित्जोफ्रेनिया के शिकार लोगों में भ्रम, भूलना, बोलने और सोचने में अटकने जैसी दिक्कतें होती है. अगर समय पर पता चल जाए तो मरीजों के भ्रम की परेशानी को नियंत्रित किया जा सकता है.

पलोटी और उनके साथी शित्जोफ्रेनिया से जुड़े रिसर्च के लिए उत्तर पूर्वी इलाकों में गए और उन्होंने स्थानीय आबादी का अध्ययन करने के दौरान टीओपी3बीटा नाम के जीन को देखा. रिसर्च के दौरान मिले इस जीन में प्रोटीन टीओपी3बीटा है और दिमाग में होने वाली गड़बड़ी के लिए इसी को जिम्मेदार माना जाता है. पलोटी ने डीडब्ल्यू को बताया, "अगर हमने बड़े शहरों में रहने वाले मिलेजुले समुदाय के लोगों के जीन पर अध्ययन किया होता तो यह जीन नहीं मिलता."

पलोटी अपनी टीम के साथ अभी शित्जोफ्रेनिया के साथ इस जीन के संबंध का अध्ययन कर ही रहे थे कि अचानक उन्हें एक ईमेल मिला. जर्मनी की वुर्त्सबुर्ग यूनिवर्सिटी के बायोकेमिस्ट काफी पहले से टीओपी3बीटा पर रिसर्च कर रहे थे. जब उन्हें पलोटी की खोज का पता चला तो वो जोश में भर गए. वुर्त्सबुर्ग यूनिवर्सिटी के गेओर्ग श्टोल ने डीडब्ल्यू को बताया, "तब तक हमें सिर्फ शक ही था कि जीन शित्जोफ्रेनिया से जुड़ा है लेकिन हम पक्के तौर पर नहीं कह सकते थे." जब दोनों रिसर्च टीमों ने अपने आंकड़ों की तुलना की तो उन्हें पता चल गया कि कुछ ठोस हासिल होने की शुरुआत हो गई है. उनके संयुक्त रिसर्च से पता चला कि अगर कोशिका में प्रोटीन टीओपी3बीटा नहीं है तो शित्जोफ्रेनिया का जोखिम नाटकीय रूप से बहुत ज्यादा बढ़ जाता है.

रिसर्चरों ने ऐसे कई जीन और जेनेटिक पदार्थों का पता लगाया जो किसी इंसान में शिजोफ्रेनिया विकसित होने या न होने पर असर डालते हैं. इसके अलावा इससे जुड़ी एक और बात पता चली है जो काफी दिलचस्प है. टीओपी3बीटा एक बड़े जीन समूह का हिस्सा है. इसका एक सहयोगी जीन है एफएमआरपी और यह भी मानसिक बीमारी पर असर डालता है. इसे फ्रेजाइल एक्स सिंड्रोम कहते हैं और यह ऑटिज्म का एक रूप है. मानसिक बीमारियों के स्पेक्ट्रम पर देखें तो दोनों बीमारियां एक दूसरे के विपरीत हैं. दोनों बीमारियों को जेनेटिक तौर पर एक दूसरे से जोड़ा जा सकता है और हाल के रिसर्च से इस बात की पुष्टि भी हो गई है. पलोटी ने बताया कि फ्रेजाइल एक्स शित्जोफ्रेनिया का जोखिम भी बढ़ा देता है. इसका मतलब है कि जो लोग फ्रेजाइल एक्स सिंड्रोम के मरीज हैं वो शित्जोफ्रेनिया के भी शिकार हो सकते हैं.

रिपोर्टः ब्रिगिटे ऑस्टेराथ/एनआर

संपादनः आभा मोंढे

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