शिखर सम्मेलनों से पहले क्या इंडोनेशिया और जर्मनी सम्बंध मजबूत कर सकते हैं? | दुनिया | DW | 09.05.2022

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दुनिया

शिखर सम्मेलनों से पहले क्या इंडोनेशिया और जर्मनी सम्बंध मजबूत कर सकते हैं?

जर्मनी की ओर से इंडोनेशिया को जून में होने वाले जी 7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया है. उम्मीद की जा रही है कि इससे तनावपूर्ण भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच द्विपक्षीय सहयोग की संभावनाएं बेहतर होंगी.

जी20 के वित्त मंत्रियों की बैठक में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो

जी20 के वित्त मंत्रियों की बैठक में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो

 दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संघ यानी आसियान ने अक्सर यूरोपीय संघ के तौर-तरीके अपनाने की कोशिश की है. दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने अक्सर आसियान के लिए एक बड़े भाई और छोटे भाई वाले दृष्टिकोण को अपनाया है, जिसे दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में अच्छी निगाह से नहीं देखा गया है. इस ब्लॉक-टू-ब्लॉक साझेदारी की विशिष्टता को देखते हुए, यह उम्मीद की जा सकती है कि दोनों क्षेत्रीय संघों के दो बड़े दिग्गजों- जर्मनी और इंडोनेशिया के बीच संबंध प्रगाढ़ होंगे. हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि ऐसा नहीं है.

वियना विश्वविद्यालय में इंडो-पैसिफिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ अल्फ्रेड गेर्ल्सटल कहते हैं, "यह देखते हुए कि जर्मनी और इंडोनेशिया यूरोपीय संघ और आसियान के भीतर आर्थिक रूप से मजबूत राष्ट्र और प्रमुख हिस्सेदार हैं, लेकिन उनके बीच के द्विपक्षीय संबंध बहुत ही अविकसित स्थिति में हैं.”

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डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, "दोनों देशों के बीच ना तो राजनीतिक और ना ही आर्थिक या नागरिक समाज के संबंध बहुत करीबी हैं.”

हालांकि इंडोनेशिया आसियान देशों के कुल सकल घरेलू उत्पाद की एक तिहाई का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन जर्मनी के साथ उसका व्यापार काफी कम है. जर्मनी के व्यापारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में द्विपक्षीय व्यापार करीब 6.6 अरब यूरो का था. इसकी तुलना यदि आसियान समूह के छोटी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों से करें तो वियतनाम और मलेशिया के साथ जर्मनी का व्यापार लगभग 13 अरब यूरो का था.

जी7 की बैठक के लिए जर्मन चांसलर ने भारत को भी न्यौता दिया है

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इंडोनेशिया के G20 शिखर सम्मेलन में जर्मनी मध्यस्थ है?

हालांकि जर्मनी और इंडोनेशिया इस वर्ष द्विपक्षीय संबंधों की 60 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि इन संबंधों में कुछ गर्मी आएगी. 

इस हफ्ते एक महत्वपूर्ण बयान में जर्मनी ने कहा कि वह जून के अंत में बवेरियन आल्प्स में होने वाले जी7 शिखर सम्मेलन में भारत, दक्षिण अफ्रीका और सेनेगल के साथ-साथ इंडोनेशिया को भी आमंत्रित करेगा.

जर्मनी मौजूदा समय में G7 देशों का अध्यक्ष है जो उसे रोटेशन क्रम के तहत मिली है और इंडोनेशिया इस वर्ष G20 का अध्यक्ष है.

अल्फ्रेड गेर्स्ट्ल कहते हैं, "यह निमंत्रण उस साझेदारी में कुछ जोश ला सकता है जो ‘बहुत अधिक महत्वाकांक्षी नहीं है'. तुलनात्मक रूप से कम आर्थिक लेन-देन के विस्तार और जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया है.”

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इंडोनेशिया नवंबर में होने वाले G20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा और इस बात को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा है कि क्या इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को आमंत्रित करेंगे?

विडोडो ने कहा है कि वो चाहते हैं कि पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की दोनों ही इसमें भाग लें. लेकिन अधिकांश पश्चिमी देशों की सरकारों ने पुतिन के भाग लेने पर शिखर सम्मेलन का बहिष्कार करने की धमकी दी है और इंडोनेशिया से अपना निमंत्रण वापस लेने का आह्वान किया है.

इंडोनेशिया जी20 की बैठक में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को बुलाना चाहता है

इंडोनेशिया जी20 की बैठक में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को बुलाना चाहता है

यदि विडोडो इससे असहमति दिखाते हैं, तो यह ना केवल शिखर सम्मेलन बल्कि इस साल G20 के अध्यक्ष के रूप में इंडोनेशिया के कार्यकाल और पश्चिम देशों में कई लोगों की नजर में इंडोनेशिया की छवि को खराब कर सकता है.

हालांकि पुतिन को G20 के निमंत्रण के मामले में जर्मनी पश्चिमी देशों में सबसे कम विरोध करने वालों में से रहा है और अब तक इस मामले में अडिग रहा है.

जर्मन विदेश मंत्री अनालेना बेयरबॉक ने इस हफ्ते की शुरुआत में कहा था, "जब G20 का एक सदस्य इस दुनिया में किसी दूसरे देश को बम से नष्ट करना चाहता है, तो हम केवल यह दिखावा नहीं कर सकते कि कुछ नहीं हुआ और फिर हमेशा की तरह हम राजनीति में वापस लौट आएं. लेकिन रूस को G20 से बाहर करने के लिए हमें अन्य सभी G19 देशों की आवश्यकता है.”

जर्मन चांसलर ओलाफ शॉल्त्स ने कहा है कि यदि पुतिन को जकार्ता में होने वाले G20 शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया जाता है तो वो पुतिन के साथ बैठने की संभावना से इंकार नहीं कर रहे हैं. जर्मन मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, "मुद्दा सामने आएगा तो हम फैसला लेंगे कि क्या करना है.”

एशिया विशेषज्ञ गेर्स्टल कहते हैं कि उनकी समझ में जर्मनी को G20 शिखर सम्मेलन से पहले G7 देशों के अन्य सदस्यों और इंडोनेशिया के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करने की आवश्यकता होगी, और शायद इसी वजह से इंडोनेशिया को जून में G7 की बैठक में आमंत्रित किया गया है.

अपने देश को G20 के अध्यक्ष पद के तौर पर सफल बनाने के लिए उत्सुक विडोडो को, शॉल्त्स जैसे व्यक्ति की अगुवाई करने में खुशी होगी. इसके लिए जर्मनी और इंडोनेशिया के बीच सामान्य से अधिक संवाद की आवश्यकता होगी.

क्या इंडोनेशिया और जर्मनी चीन की नीति पर सहयोग कर सकते हैं?

गेर्स्टल का मानना ​​है कि इंडोनेशिया और जर्मनी के बीच बेहतर संबंध यूरोपीय संघ और आसियान के संबंधों को सुदृढ़ करने में मदद कर सकते हैं. इंडोनेशिया आसियान तंत्र का केंद्र है और यहां की राष्ट्रीय सरकार ने अक्सर क्षेत्रीय एजेंडा निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

चीन के उत्थान का मतलब यह भी है कि जर्मनी जैसी यूरोपीय शक्तियों के साथ इंडोनेशियाई साझेदारी अब ऐसे दो पक्षों के लिए अधिक फायदेमंद है जो चीन के दबदबे का मुकाबला करने में बराबर दिलचस्पी रखते हैं.

यूरोपीय संघ एक सामूहिक इंडो-पैसिफिक नीति पर चल रहा है और जर्मनी ने साल 2020 में अपने इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी पेपर की घोषणा की.

जर्मनी में इंडोनेशिया के बारे में यह समझा जाता है कि इसकी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका या चीन के साथ बहुत नजदीकी नहीं है.

वारसॉ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के सहायक प्रोफेसर राफल उलातोव्स्की कहते हैं कि जर्मन-इंडोनेशियाई संबंधों में सुधार की संभावनाएं ‘उम्मीद जगाने वाली' हैं.

वो ये भी कहते हैं कि चूंकि दोनों देशों के बीच कोई गंभीर रणनीतिक मतभेद नहीं हैं, इसलिए ये परिस्थितियां एक-दूसरे को भागीदारी के लिए आकर्षित करती हैं.

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