शिक्षा और रोजगार को जोड़ने की जरूरत | ब्लॉग | DW | 04.09.2015
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

ब्लॉग

शिक्षा और रोजगार को जोड़ने की जरूरत

भारत भले ही दुनिया की सबसे अधिक तेजी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था होने का दावा करे, लेकिन उसके इस दावे की बुनियाद काफी खोखली है.

आर्थिक विकास के लिए शिक्षित और कौशलयुक्त कामगारों का होना बहुत आवश्यक है, लेकिन भारत में शिक्षा पर खर्च किए जाने वाले धन में लगातार कटौती की जा रही है. यूं भी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के बजाय उच्च शिक्षा पर हमेशा अधिक ध्यान दिया गया है. यह ऐसा ही है जैसे किसी भव्य भवन को कमजोर नींव पर खड़ा करने की कोशिश की जाए. आज भारत का एक भी विश्वविद्यालय ऐसा नहीं जिसकी गिनती दुनिया के 200 सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों में होती हो. नरेंद्र मोदी की सरकार ने शिक्षा के लिए बजट में करीब 25 प्रतिशत की कटौती की है और उसके लिए आवंटित धनराशि को 82771 करोड़ रुपये से घटाकर 69074 करोड़ रुपये कर दी है.

दूर-दराज के इलाकों में बसे गांवों के स्कूलों की हालत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की राजधानी दिल्ली के स्कूलों तक में शौचालय और पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की समुचित व्यवस्था नहीं है. स्कूलों के लिए इमारतें और विद्यार्थियों के बैठने के लिए कुर्सी-मेज तक का इंतजाम नहीं किया जा सका है. ऐसे में यदि देश के 57 प्रतिशत छात्रों के पास रोजगार प्राप्त करने की क्षमता प्रदान करने वाला कौशल नहीं है, तो इसमें बहुत अधिक आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

नोबल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन केवल मोदी सरकार की ही नहीं, इससे पहले की सरकारों की भी इसलिए आलोचना करते रहे हैं क्योंकि उनकी राय में शिक्षा और स्वास्थ्य पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया है. उनका कहना है कि आर्थिक विकास का आधार मानवीय क्षमता का विकास है. यदि मानवीय क्षमता में वृद्धि नहीं होगी और कौशलयुक्त श्रमशक्ति उपलब्ध नहीं होगी, तो आर्थिक विकास स्थायी रूप नहीं ले सकता. सेन का यह भी कहना है कि रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराना और लोगों को रोजगार के लिए सक्षम बनाना किसी भी सरकार का प्रमुख दायित्व है.

लेकिन ऐसा होता दीख नहीं रहा. इसीलिए एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत अध्यापकों का मानना है कि शिक्षा छात्रों के सर्वांगीण विकास पर केन्द्रित नहीं है. यही नहीं, अक्सर देखा गया है कि ग्रामीण इलाकों में पढ़ने वाले कक्षा चार के छात्र पहली कक्षा का पाठ्यक्रम भी ठीक से नहीं जानते. ऐसे में पूरी शिक्षा प्रणाली की प्रामाणिकता पर ही प्रश्न चिह्न लग जाता है और वह केवल औपचारिक खानापूरी बनकर रह जाती है. कुछेक आईआईटी या आईआईएम खोल देने से समूचे देश की शिक्षा का स्तर ऊंचा नहीं उठता. उसके लिए बिलकुल निचले स्तर से उसे ऊपर उठाने का प्रयास किए जाने की जरूरत है ताकि हर स्तर पर सुधार हो सके.

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने ‘मेक इन इंडिया' का नारा दिया और दुनिया भर के उद्योगपतियों से आग्रह किया कि वे भारत में अपने संयंत्र लगाकर यहां अपने उत्पादों का निर्माण करें. ऐसा तभी हो सकता है जब विदेशी निवेशकों और उद्योगपतियों को भारत में कुशल श्रमशक्ति उपलब्ध हो. इसके लिए जरूरी है कि शिक्षा और रोजगार को आपस में जोड़ा जाये और छात्रों के भीतर नए-नए कौशल और क्षमताएं पैदा की जाएं. यह तभी संभव हो सकता है जब शिक्षा नीति में आवश्यक बदलाव किया जाए और उस पर अपेक्षित मात्रा में खर्च किया जाए. वरना भारत के शिक्षित बेरोजगारों की संख्या बढ़ती ही जाएगी.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संबंधित सामग्री

विज्ञापन