शिक्षकों और किताबों की मांग को लेकर तीन हफ्ते से धरने पर बैठे हैं छात्र | भारत | DW | 11.07.2019
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भारत

शिक्षकों और किताबों की मांग को लेकर तीन हफ्ते से धरने पर बैठे हैं छात्र

छात्रों का कहना है कि उनके कॉलेज में शिक्षकों और किताबों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि उत्तराखंड के छात्रों को पढ़ाई के लिए बाहर न जाना पड़े.

उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के एक कॉलेज के सैकड़ों छात्र पिछले तीन हफ़्ते से कॉलेज में अध्यापकों और पुस्तकों की मांग को लेकर धरने पर बैठे हैं लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है. छात्रों की मांग है कि उनके कॉलेज में और शिक्षकों और किताबों की व्यवस्था की जाए ताकि उत्तराखंड के छात्रों को मजबूर होकर पढ़ाई के लिए राज्य से बाहर न जाना पड़े. पिथौरागढ़ के राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के छात्रों की इस मांग को सुनने के लिए तीन हफ्ते बाद भी राज्य या केंद्र सरकार का न तो कोई अधिकारी पहुंचा है, न कोई जनप्रतिनिधि और न ही कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति, जिसके अधीन यह कॉलेज आता है.

नेपाल सीमा से लगे पिथौरागढ़ शहर में स्थित यह कॉलेज न सिर्फ पिथौरागढ़ का सबसे बड़ा कॉलेज है बल्कि उत्तराखंड के कुछ बड़े कॉलेजों में इसकी गिनती होती है. कॉलेज में पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और चंपावत जिलों के छात्र तो पढ़ने आते ही हैं, नेपाल से भी बड़ी संख्या में हर साल कई छात्र यहां प्रवेश लेते हैं. करीब सात हजार छात्रों को पढ़ाने के लिए यहां महज 122 अध्यापकों के पद सृजित हैं और उनमें भी ज्यादातर पद खाली हैं. मौजूदा समय में यहां सिर्फ 65 पूर्णकालिक शिक्षक काम करते हैं, बाकी काम अतिथि अध्यापकों से लिया जाता है.

इसके अलावा छात्रों की मांग ये भी है कि उनकी लाइब्रेरी में कुछ नई किताबें भी मंगाई जाएं क्योंकि ज्यादातर किताबें दस-बीस साल पुरानी हैं जिनमें कुछ तो अब काम की भी नहीं रहीं. छात्रों के आंदोलन में शामिल कॉलेज के एक पूर्व छात्र मुकेश कुमार कहते हैं, "कॉलेज में शिक्षकों की इतनी कमी है कि कई कोर्सेज की तो पढ़ाई ही नहीं हो पाती है. लाइब्रेरी का हाल तो पूछिए मत. कुछ किताबें तो इतनी पुरानी हैं कि उनमें लिखा इतिहास तक बदल चुका है.”

किताबों के लिए तरसते छात्र

इतिहास से एमए कर रहे छात्र किशोर जोशी कहते हैं, "हम अभी भी 90 के दशक की किताबें पढ़ रहे हैं, उन किताबों में सोवियत रूस अभी भी महाशक्ति है और शीत युद्ध चरम पर है ऐसे में हमसे कैसे उम्मीद की जा सकती हैं कि तेजी से बदल रहे वैश्वीकरण के इस दौर में हम अच्छे शिक्षण संस्थानों से मुकाबला कर सकेंगे.”

विज्ञान संकाय के हालात भी कुछ ऐसे ही हैं. धरने पर बैठी बीएससी की छात्रा अंशिका का कहना है, "कॉलेज में प्रयोगशाला की हालत इतनी खराब है कि विज्ञान जैसे विषय भी किताबी ज्ञान पर चल रहे हैं और अधिकतर छात्र - छात्राओं को किताबें भी उपलब्ध नहीं हो पातीं.”

कॉलेज के छात्र अपनी इन्हीं तमाम मांगों को लेकर छात्रसंघ के नेतृत्व में 17 जून से धरना प्रदर्शन कर रहे हैं. हालांकि छात्र इस तरह का आंदोलन पहले भी कर चुके हैं और पहले भी कॉलेज में शिक्षकों और किताबों के अभाव की शिकायतें की गई हैं. पिछले साल छात्रों ने इस संबंध में उच्च शिक्षा निदेशालय को एक ज्ञापन भी दिया था लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.

उसके बाद छात्रों ने अलग-अलग प्राधिकारियों को कुल चार ज्ञापन दिए और जब इन सबके बावजूद किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी तो मजबूरन छात्रों को धरने पर बैठना पड़ा. इस दौरान छात्रों ने जिलाधिकारी से मिलने की कोशिश की, मुंह पर पट्टी बांधकर मौन जुलूस निकाला और अब तो धरना देते हुए भी करीब तीन हफ़्ते बीत चुके हैं लेकिन फिलहाल कहीं इसका असर होता नहीं दिख रहा है. ऐसा तब है जबकि छात्र ऐसी मांग के लिए आंदोलन कर रहे हैं जिसके बिना किसी कॉलेज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

पलायन की समस्या

छात्रों के आंदोलन को अब उनके अभिभावकों का भी समर्थन मिल रहा है. अभिभावकों का कहना है कि उत्तराखंड से वैसे ही लोगों का बड़ी संख्या में पलायन हो रहा है और जब शिक्षा की मूलभूत सुविधाएं भी नहीं होंगी तो लोग विवश होकर बाहर जाएंगे ही. पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष महेंद्र रावत कहते हैं, "मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अधिकतर छात्र बेहतर शिक्षा के लिए या तो देहरादून जाते हैं या फिर दिल्ली. अध्यापकों की संख्या और लाइब्रेरी में किताबें तो बढ़ाई ही जाएं, नए और प्रोफेशनल कोर्सेज बढ़ाने की भी जरूरत है ताकि छात्रों का पलायन रुक सके.”

हालांकि धरने पर बैठे छात्रों से मिलने कॉलेज के प्रिंसिपल डीएस पांगती गए थे लेकिन उनका कहना है कि उनके हाथ में बहुत कुछ नहीं है. पांगती ने बताया कि फिलहाल वो कॉलेज के ही संसाधनों से लाइब्रेरी में पुस्तकें बढ़ाने की दिशा में कुछ अस्थाई इंतजाम करेंगे.

केवल उत्तराखंड की समस्या नहीं

दरअसल, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के ये हालात न सिर्फ पूरे उत्तराखंड में बल्कि पूरे देश में है, खासकर उत्तर भारतीय राज्यों में. उत्तराखंड साल 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर नया राज्य बना था. लेकिन उच्च शिक्षा में उत्तर प्रदेश के हालात भी बहुत अच्छे नहीं हैं. कॉलेजों और विश्वविद्यायलों की संख्या बढ़ी, छात्र बढ़े लेकिन सुविधाओं के नाम पर उस अनुपात में बढ़ोत्तरी नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी.

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में शिक्षकों के करीब 31 फीसदी पद खाली चल रहे हैं. आंकड़ों की मानें तो 16 राज्य विश्वविद्यालयों में 2,182 स्वीकृत पदों में से 691 पद, 331 सरकारी सहायता प्राप्त डिग्री कॉलेजों में 15763 स्वीकृत पदों में से 4320 पद और 158 राजकीय डिग्री कॉलेजों में 2750 पदों में से 867 पद खाली हैं. यही नहीं, स्वीकृत पदों की संख्या भी छात्रों की संख्या के अनुपात में बेहद कम है.

राज्य में सहायता प्राप्त कॉलेजों में शिक्षकों का चयन करने वाले उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग में नियुक्तियां पिछले कई साल से अटकी पड़ी हैं और कॉलेजों में पढ़ाने की अर्हता रखने वाले हजारों छात्र बेरोजगारी की मार सह रहे हैं. तमाम कॉलेजों में रिटायर्ड शिक्षक ही अपेक्षाकृत कम मानदेय पर पढ़ा रहे हैं. जहां तक लाइब्रेरी का सवाल है तो कुछ विश्वविद्यालों और कॉलेजों को छोड़कर शायद ही कहीं स्तरीय लाइब्रेरी और जरूरी किताबें हों.

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