शहर में तेंदुए का खौफ | ब्लॉग | DW | 24.02.2014
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ब्लॉग

शहर में तेंदुए का खौफ

उत्तराखंड के जंगलों से निकलकर आदमखोर बनी एक बाघिन का खतरा कम भी नहीं हुआ था कि उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में एक तेंदुए के घुस आने से हड़कंप मचा हुआ है. बाघ और तेंदुए कंक्रीट के जंगलों में बौखलाए भटक रहे हैं.

मेरठ में तेंदुए को पकड़ने की कोशिशें काम नहीं आई. उसे अस्पताल में बंद किया तो वो जनरल वार्ड की खिड़की तोड़कर भाग निकला. वो एक अपार्टमेंट में घुसा, एक सिनेमा हॉल में चला गया. शर्मीले तेंदुए के खौफ से बाजार स्कूल कॉलेज बंद है. लोग सहमे हुए हैं. जैसे चोर उचक्कों का डर रहता था वैसा ही अब तेंदुए का डर है. कौन जाने दीवार के किस कोने, किस गली, किस छत और किस मुंडेर पर वो बैठा हुआ हो और घबराहट में हमला कर दे. शहर में तेंदुआ जैसे हमारे समय के विद्रूप का एक प्रतीक बनकर घूम रहा है. वो विद्रूप जो हमने अपने पर्यावरण और अपने आसपास अपने जंगल और अपने शहर का बनाया है.

और ये कोई मेरठ की ही कहानी नहीं है, मुंबई में पिछले साल ऐसे ही तेंदुआ शहर में आ निकला था, पिछले ही सप्ताह छत्तीसगढ़ में वारदात हो चुकी है, दिल्ली में कुछ वर्षों पहले यही हुआ था, उत्तराखंड में तो तेंदुए का आतंक कुख्यात ही हैं.

संरक्षित जंगलों में अतिक्रमण हो रहा है. निर्माण और निवेश को खींचते खींचते हम जंगलों में दाखिल हो रहे हैं. वाहनों का शोर और प्रदूषण हमारे जंगलों में रहने वाले इन जानवरों की शांति में खलल डाल रहा है. वे चौंक गए हैं. उन्हें पानी तक ठीक से नहीं मिल पाता. जंगलों की नदियां सूखी पड़ी हैं और खनन के ठेकेदारों का बोलबाला है. राष्ट्रीय राजमार्गों को चमकाने और सड़कों को चौड़ा करने के अभियानों ने जंगलों की सीमाएं निगल ली हैं. जंगल का पूरा तंत्र छिन्न भिन्न हुआ है. वहां की खाद्य श्रृंखला बिखर गई हैं. बाघ या तेंदुए के अपने जंगली शिकार कम हो रहे हैं.

Bildergalerie Iran KW30 2013

इलाज के नाम पर कभी कभी नाइंसाफी भी

हिंदी के वरिष्ठतम कवि केदारनाथ सिंह की एक अत्यंत चर्चित लंबी कविता है- बाघ. उस अद्भुत जानवर के बारे में हिंदी में ये अपनी तरह की अलग और अकेली कविता हैः “…क्या वह भूखा था ? बीमार था ? क्या शहर के बारे में, बदल गए हैं उसके विचार ? यह कितना अजीब है, कि वह आया, उसने पूरे शहर को, एक गहरे तिरस्कार, और घृणा से देखा, और जो चीज़ जहां थी, उसे वहीं छोड़कर, चुप और विरक्त, चला गया बाहर!...”

अगर आप कभी कॉर्बेट के जंगलों में जाएं और उस निर्विकार और आध्यात्मिक शांति से भरी खामोशी, वीरानी और सन्नाटे में ध्यान से देखें तो बाघ की पदचाप दिखाई देती हैं और उसकी सांसे सुनाई देती हैं. एक अव्यक्त सी सरसराहट आप अपने दिल में महसूस करते हैं. पूरा जंगल मानो बाघ की दिव्यता और अलौकिकता के साये में चमत्कृत सा सोया पड़ा है.

उत्तराखंड का कॉर्बेट पार्क दुनिया में बाघों का सबसे बड़ा ठिकाना है. लेकिन अब गिनती के बाघ ही यहां रह गए हैं. यही हाल देश के दूसरे हिस्सों में पाए जाने वाले बाघों और तेंदुओं का है. 2011 की गणना के मुताबिक देश में इस समय करीब 1,700 बाघ हैं. जबकि तेंदुओं की संख्या 1,150 बताई गई है. द गार्जियन अखबार में डब्लूडब्लूएफ के जानकारों के हवाले से बताया गया है कि तेंदुओं के कॉरिडोर ब्लॉक कर दिए गए हैं. उनकी आवाजाही के रास्तों में निर्माण के रूप में अवरोध आ गए हैं लिहाजा वे निकलने के लिए छटपटा रहे हैं.

वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी ऑफ इंडिया के मुताबिक 2010 से लेकर इस साल अब तक 118 बाघ तस्करों ने मार डाले हैं. और पीछे से आंकड़ा निकालें तो हालात डराने वाले हैं. इसी तरह तेंदुए के शिकार के 600 से ज्यादा मामले 2010 से अब तक सामने आए हैं. ये शिकार खाल और अन्य अंगों के लिए किया जाता है. और इनकी तस्करी का धंधा संरक्षण और कड़े कानूनों के बावजूद फलफूल ही रहा है. साफ है कि कानून कड़ा होने के बावजूद अपराधियों को कोई डर नहीं है. दूसरी ओर संरक्षण परियोजनाओं से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के रवैये की भी अक्सर आलोचना की जाती है. उत्तराखंड के कुछ राष्ट्रीय राजमार्गों में बीच बीच में बाघों और तेंदुओं के शावकों की कुचलकर मरने की खबरें भी आती रहती है.

मशहूर पर्यावरणविद वाल्मीकि थापर ने एक जगह लिखा है कि किस तरह बाघों और तेंदुओं को मनमुताबिक ढालने के लिए उनके साथ खिलवाड़ किया जाता है. सैलानियों के लिए, नस्ल बढ़ाने के लिए और उनके इलाज के नाम पर उन्हें ट्रैकुलाइजर दिए जाते हैं, एंटीबायोटिक दवाओं के भारी डोज दी जाती हैं. उन्हें बेहोश कर कभी चिड़ियाघर तो कभी दूसरे जंगल या अभ्यारण्य में छोड़ दिया जाता है. इस तरह इन जानवरों के साथ अक्सर ही प्रयोग किये जाते हैं. उसका असर उनके व्यवहार पर पड़ता है.

बाघ और तेंदुए हमारी जैव विविधता का अभिन्न हिस्सा हैं. उनकी संख्या कम होगी तो असर अंततः हम पर ही पड़ेगा. इसीलिए जंगलों को जस का तस रहने दिया जाए, उनकी मौलिकता से छेड़छाड़ न की जाए तो ही ठीक होगा. वरना कड़े कानून, एजेंसियों का ताम झाम, पार्क या अभ्यारण अपनी जगत बने रहेंगे लेकिन उनमें रहने वाली अतुल्य जानवर हमेशा के लिए लुप्त हो जाएंगे.

ब्लॉग: शिवप्रसाद जोशी

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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