शराब पर पाबंदी- ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ खेल रही सरकारें | दुनिया | DW | 05.04.2017
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दुनिया

शराब पर पाबंदी- ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ खेल रही सरकारें

सुप्रीम कोर्ट की ओर से हाइवे के किनारे शराब की दुकानों और पबों पर पाबंदी लगाए जाने के बाद अब कई राज्य सरकारें राजस्व को होने वाले भारी नुकसान से बचने के लिए हाइवे को सामान्य सड़क का दर्जा देने के आदेश जारी कर रही हैं.

Indien Bundesstaat Kerala Gemälde an Mauer (UNI/Suneesh kumar)

केरल के एक्साइज विभाग ने शराब के बुरे असर को दिखाने के लिए दीवारों पर पेंटिंग्स की मदद से चलाया था जागरुकता अभियान.

सुप्रीम कोर्ट की ओर से पहली अप्रैल से हाइवे के किनारे स्थित शराब की दुकानों और पबों पर पाबंदी लगाए जाने के बाद अब तमाम राज्य सरकारें राजस्व को होने वाले भारी नुकसान से बचने के लिए ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात' की तर्ज पर हाइवे को सामान्य सड़क का दर्जा देने के आदेश जारी कर रही हैं. कई राज्य सरकारों ने केंद्र से भी नेशनल हाइवे को डी-नोटिफाई करने की अपील की है. देश के तमाम राज्यों के कुल राजस्व में शराब की बिक्री से मिलने वाली रकम का दूसरा या तीसरा स्थान है. ऐसे में आखिर सरकारें इस दुधारू गाय को अपने हाथों से कैसे निकलने दे सकती हैं ?

सुप्रीमकोर्टकाफैसला

सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल 15 दिसंबर को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए नेशनल और स्टेट हाइवे के पांच सौ मीटर के दायरे में शराब की बिक्री पर पाबंदी लगा दी थी. याचिका में दलील दी गई थी कि इन सड़कों के किनारे स्थित दुकानों पर शराब के सेवन से हाइवे पर सड़क हादसे साल-दर-साल बढ़ रहे हैं. पूर्वोत्तर राज्य मेघालय और सिक्किम की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए इन दोनों राज्यों को इस पाबंदी से छूट दी गई है. सुप्रीम कोर्ट ने इन इलाकों में शराब के विज्ञापनों और होर्डिंग्स को भी हटाने का निर्देश दिया है. अदालत ने इस साल 31 मार्च के बाद हाइवे पर स्थित शराब की दुकानों के लाइसेंसों का नवीनीकरण नहीं करने का भी निर्देश दिया है. अदालत के इस फैसले से केंद्र के अलावा तमाम राज्य सरकारों में भी हड़कंप मच गया है. एक मोटे अनुमान के मुताबिक, इस फैसले से 50 हजार करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान होगा. खासकर पर्यटन पर आधारित गोवा, राजस्थान, दमन और दीव जैसे राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों पर इसका सबसे प्रतिकूल असर पड़ना तय है.

फैसलेकीकाट

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शुरूआती एकाध दिन तो तमाम दुकानें बंद रहीं. लेकिन उसके बाद तमाम राज्यों ने इस फैसले की काट निकालते हुए हाइवे यानी राजमार्गों को सामान्य सड़क का दर्जा देना शुरू कर दिया. इसके लिए ताबड़तोड़ अधिसूचनाएं जारी की गईं. कई राज्य सरकारों ने केंद्र से नेशनल हाइवे के बड़े हिस्सों को भी सामान्य सड़क का दर्जा देने की अपील की है. कर्नाटक और केरल सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट की दूसरी खंडपीठ के समक्ष चुनौती देने का फैसला किया है. पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, चंडीगढ़ और पश्चिम बंगाल ने तो रातों रात अधिसूचनाएं जारी कर हाइवे को शहरी सड़कों का दर्जा दे दिया है. वहां ऐसी सड़कों के किनारे बनी शराब की दुकानें तीसरे दिन ही खुल गईं.

तमाम राज्य सरकारें इस फैसले से राजस्व को होने वाले भारी नुकसान को कम से कम करने की कवायद में जुटी हैं. सरकारी सूत्रों का कहना है कि राज्य सरकारें शहरों व कस्बों से होकर गुजरने वाले स्टेट हाइवे को शहरी सड़कों का दर्जा देकर इस पाबंदी के दायरे से बाहर निकल सकती हैं. लेकिन नेशनल हाइवे को शहरी सड़क का दर्जा देना केंद्र के हाथों में हैं. हालांकि जानकारों का कहना है कि राज्य सरकारों का यह फैसला उनके लिए भारी साबित हो सकता है. देर सबेर सुप्रीम कोर्ट इस मामले का संज्ञान लेकर कार्रवाई कर सकता है.

महाराष्ट्र के आबकारी मंत्री चंद्रशेखर बावानुकुले कहते हैं, "हाइवे के किनारे शराब की बिक्री पर पाबंदी के अदालत के फैसले से राज्य सरकार को सात हजार करोड़ रुपए का नुकसान होगा." ऐसे में वहां मुंबई, ठाणे व पुणे जैसे शहरों के आसपास के हाइवे को सामान्य सड़क का दर्जा देने की कवायद शुरू हो गई है.

आजीविकापरखतरा

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शराब की बिक्री के धंधे से जुड़े लाखों लोगों की रोजी-रोटी पर खतरा पैदा होने की दलीलें दी जा रही हैं. इससे होटल व पर्यटन उद्योग पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है. इस उद्योग ने केंद्र सरकार से वैकल्पिक उपाय तलाशने की अपील की है. लेकिन केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के डर से इस फैसले के खिलाफ अपील करने की स्थिति में नहीं है. इसकी वजह यह है कि एक अन्य मामले में केंद्रीय सड़क व परिवहन मंत्रालय खुद ही हाइवे पर बढ़ते हादसों के लिए उनके किनारे बनी शराब की दुकानों को जिम्मेदार ठहरा चुका है. नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने अपने एक ट्वीट में कहा है, "पर्यटन उद्योग से रोजगार के मौके पैदा होते हैं. इसे क्यों मारा जा रहा है?" ओबराय समूह के अध्यक्ष कपिल चोपड़ा कहते हैं, "इस पाबंदी से कम से कम 10 लाख नौकरियों पर खतरा पैदा हो गया है. इसके अलावा हजारों करोड़ के राजस्व का होगा. सरकार व निजी क्षेत्र को मिल कर इस समस्या के समाधान का उपाय तलाशना चाहिए."

स्थायीसमाधाननहीं

अदालती आदेश के तात्कालिक असर से निपटने के लिए तमाम राज्य सरकारें भले हाइवे को सामान्य सड़क का दर्जा देने की कवायद में जुटी हों, जानकारों का कहना है कि यह कोई स्थायी समाधान नहीं है. तमाम राज्य सरकारें अब तक स्टेट हाइवे को नेशनल हाइवे का दर्जा दिलाने का प्रयास करती रही हैं ताकि उनकी मरम्मत व रखरखाव का खर्च केंद्र सरकार उठा सके. अब शराब से मिलने वाले राजस्व के लिए अगर कोई राज्य सरकार नेशनल हाइवे को सामान्य सड़क का दर्जा दिलाती है तो यह खर्च उसके सिर पर आ जाएगा. जानकारों का कहना है कि इन सड़कों की मरम्मत व रखरखाव का खर्च शराब की ब्रिकी से मिलने वाले राजस्व से कई गुना ज्यादा होगा. यानी उनके लिए ‘नौ की लकड़ी नब्बे खर्च' वाली कहावत चरितार्थ होने लगेगी.

एक कानून विशेषज्ञ जीवेश कर्मकार कहते हैं, "सरकारें फिलहाल दूरगामी नतीजों पर विचार किए बिना हाइवे को सामान्य सड़कों का दर्जा देने की जिस कवायद में जुटी हैं वह आगे चल कर उनके लिए भारी साबित हो सकता है." लेकिन फिलहाल इस पहलू पर विचार किए बिना ज्यादातर राज्य सरकारें लाखों लोगों की आजीविका छिन जाने की दलील देकर हाइवे को सामान्य सड़कों में बदलने की कवायद में जुट गई हैं.

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