dw.com बीटा पेज पर जाएं. कार्य प्रगति पर है. आपकी राय हमारी मदद कर सकती है.
हम आपके लिए अपने कंटेंट को बेहतर बनाने के लिए कूकीज का इस्तेमाल करते हैं. अधिक जानकारी डाटा सुरक्षा पेज पर उपलब्ध है.
नीदरलैंड्स में किसान अपनी सरकार से बहुत नाराज हैं, क्योंकि सरकार जानवरों से होने वाले उत्सर्जन को घटाकर आधा करना चाहती है. इसीलिए मवेशियों की संख्या को कम करने पर भी बात हो रही है.
ईको इंडिया के इस एपिसोड में देखिए, कैसे दिल्ली का एक स्टार्टअप बेकार बचे भोजन को मवेशियों का चारा बनाने में इस्तेमाल कर रहा है. इसके अलावा स्पेन में जरूरतमंदों के लिए शुरू हुए फूड बैंकों पर खास रिपोर्ट. बात होगी उपयोगी लार्वा की और आखिर में जानिए कि पर्यावरण के लिए दूध की बजाय काजू से बनता चीज क्यों बेहतर विकल्प हो सकता है.
मवेशी दुनिया में 14% ग्रीनहाउस गैस के लिए जिम्मेदार हैं. लोगों ने कार्बन-फुटप्रिंट घटाने के लिए मांस छोड़ दिया. लेकिन डेयरी उत्पादों यानी दूध से बने उत्पादों का असर भी पर्यावरण पर हो रहा है. कितना? यह निर्भर करता है कि उन्हें कैसे बनाया जा रहा है. देखिए, क्या हो सकते हैं चीज के बेहतर विकल्प.
दुनियाभर में पैदा होने वाले अनाज का एक-तिहाई बर्बाद जाता है. और भारत में यह आंकड़ा करीब 40% है. दिल्ली का एक स्टार्टअप- 'वेस्टलिंक' बर्बाद हो रहे अनाज को मवेशियों के खाने में बदल रहा है.
कई लोग लकड़बग्घों से नफरत करते हैं और उन्हें बेदर्दी से मारा दिया जाता है, जबकि वे बहुत जरूरी हैं. वे बीमारियां फैलने से बचाते हैं. मवेशी पालन में भी उनकी बड़ी भूमिका है.
सोमालिया, केन्या और इथोपिया जैसे देश भयानक सूखा झेल रहे हैं. कई गांवों में मरे हुए मवेशियों का ढेर लग गया है. इससे बीमारियां फैलने का खतरा भी है.
केन्या में भयंकर सूखे के हालात हैं. जानवर इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. जानवरों की मौत से इलाके में बीमारियों के बढ़ने का भी खतरा है. फोटोजर्नलिस्ट एड रैम ने सूखे की भयावहता तस्वीरों के जरिए दुनिया के सामने रखी.
आधुनिक खेती ने पर्यावरण पर बहुत बुरा असर डाला है. इसमे काफी CO2 का उत्सर्जन होता है और बहुत जमीन की जरुरत होती है. खेती करने के कुछ पुराने तरीके बड़े पैमाने की खेती को भी टिकाऊ बना सकते हैं. जैसे कि एग्रोफोरेस्ट्री - यानी, पेड़ों को फसल और मवेशियों के साथ जोड़ना.
दक्षिण अमेरिका के वर्षावनों में आसानी से छुपने और निडर घूमने वाले जैगुआरों का आवास सिमटता जा रहा है. भूख मिटाने के लिए पालतू मवेशियों का रुख करने की मजबूरी के चलते इन्हें पालने वाले किसान भी जैगुआर को नहीं बख्शते. ऐसे में जैगुआर को बचाने की कोशिश में उन्हें क्यों साथ आना चाहिए, जानते हैं एक प्राइवेट नेचर रिजर्व के प्रयोग के माध्यम से.
गांवों में सूर्यास्त का पता गोधूलि से चलता है. मवेशी जब चारागाहों से वापस लौटते हैं तो शाम की घोषणा हो जाती है. गांवों में जो मजा गोधूलि के गुबार में है, पहाड़ों और नदी किनारे वही मजा सूर्यास्त के सुर्ख रंगों में है.
रूस और चीन के बीच बसा मंगोलिया. सर्दियों में यहां खूब ठंड पड़ती है. तापमान माइनस तीस तक भी चला जाता है. गर्मियों में जब पौधों और घास को उगने का मौका मिलता है, तो मवेशी इसे खा जाते हैं. जिस रफ्तार से ये जानवर घास को चर रहे हैं, बहुत मुमकिन है कि भविष्य में मंगोलिया के मैदान रेगिस्तान में तब्दील हो जाएं.