विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर कानून से बच सकते हैं अमेरिकी राष्ट्रपति? | दुनिया | DW | 03.05.2019
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दुनिया

विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर कानून से बच सकते हैं अमेरिकी राष्ट्रपति?

ट्रंप जब से राष्ट्रपति बने हैं, मीडिया की चर्चाओं में लगातार "एक्सीक्यूटिव प्रिविलिज" यानी कार्यकारी विशेषाधिकार का इस्तेमाल होता रहा है. जानिए क्या होता है यह अधिकार.

चुनाव प्रचार के दौरान डॉनल्ड ट्रंप जनता को जो वायदे कर रहे थे, जानकार उन्हें चुनावी जुमले कह कर खारिज करते रहे. लेकिन ट्रंप राष्ट्रपति बने और उन्होंने अपने वायदों पर काम करना भी शुरू कर दिया. हालांकि लोकतंत्र में कोई भी फैसला सिर्फ एक इंसान के हाथ में नहीं होता है. कानून बनाने या बदलने की पूरी प्रक्रिया होती है और इसे करने में लंबा वक्त भी लग जाता है. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत भी इस बात से अनजान नहीं है.

इस पूरी प्रक्रिया में राष्ट्रपति को अपने सलाहकारों से, अधिकारियों से कई बार बाहरी किसी तीसरे पक्ष से भी चर्चा करनी होती है. लोकतंत्र में पारदर्शिता एक अहम अंग होता है. नागरिकों का अधिकार है कि उन्हें पता हो कि उनके लिए जो कानून बन रहे हैं, वे किस तरह से बन रहे हैं. उनके लिए किन लोगों से और क्या बातें हो रही हैं. हालांकि राष्ट्रपति की हर बातचीत तो सार्वजनिक नहीं की जा सकती. लेकिन किसी विवाद के उठने पर उसे सार्वजनिक करने जैसी नौबत आ सकती है.

इससे बचने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के पास कुछ "एक्सीक्यूटिव प्रिविलिज" यानी कार्यकारी विशेषाधिकार होते हैं. ट्रंप जब से राष्ट्रपति बने हैं, मीडिया की चर्चाओं में लगातार इस शब्द का इस्तेमाल होता रहा है. कई मुद्दों पर विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि ट्रंप अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर मामले से बच निकलेंगे या फिर किसी भी जवाबदेही से इनकार कर देंगे. पर आखिर ये विशेषाधिकार है क्या? इसे कैसे इस्तेमाल किया जाता है?

"एक्सीक्यूटिव प्रिविलिज" दरअसल एक ऐसा कानूनी अधिकार है जिसके चलते अमेरिकी राष्ट्रपति कोई जानकारी देने से इनकार कर सकता है. फिर चाहे वह फ्रीडम ऑफ इन्फॉर्मेशन एक्ट के तहत आती हो या फिर सांसदों की उनसे कोई मांग हो. इस अधिकार का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है ताकि राष्ट्रपति को अपने सलाहकारों या अधिकारियों के साथ होने वाली चर्चाओं को सार्वजानिक ना करना पड़े. इसके पीछे विचार यह है कि व्हाइट हाउस उस स्थिति में बेहतर ढंग से काम कर सकता है अगर राष्ट्रपति की बातें गुप्त रहें और जनता को उन पर खींचतान करने का मौका ना मिले.

इस विशेषाधिकार का जिक्र अमेरिका के संविधान में नहीं है.इसके बावजूद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "यह सरकार चलाने का मूल तत्व है और जो संविधान के तहत शक्तियों के विभाजन में निहित है." 1950 के दशक तक अमेरिका में इस शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ था. जब होना शुरू भी हुआ तब भी कोई ठीक तरह से इसकी सीमाओं के बारे में नहीं जानता था. हालांकि 70 के दशक में तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के खिलाफ एक मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा.

निक्सन से जुड़े मामले में टेप और अन्य मैटीरियल अदालत को सौंपने का आदेश दिया गया. नौ जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से माना कि राष्ट्रपति के विशेषाधिकार का का इस्तेमाल संसद द्वारा किसी मामले की जांच से बचने के लिए नहीं किया जा सकता. इस तरह से यह मुकदमा एक मिसाल बना कि देश का कोई राष्ट्रपति अपनी गलतियों को छिपाने के लिए इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता है.

जॉर्ज डब्ल्यू बुश, बिल क्लिंटन और बराक ओबामा, ये सब ही इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते रहे हैं लेकिन बहुत संभल कर. निक्सन वाले मामले से यह सीख मिली कि जैसे ही राष्ट्रपति के "एक्सीक्यूटिव प्रिविलिज" के इस्तेमाल की बात जनता तक पहुंचेगी, यह अपने आप में ही एक राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा. अब तो मीडिया भी इस पर नजर बनाए रखता है.

कानूनी जानकारों का मानना है कि जैसे ही किसी तीसरे पक्ष को राष्ट्रपति की किसी बातचीत के बारे में पता चलता है मसलन अगर ट्रंप की किसी बातचीत का हिस्सा मीडिया में दिखाया जा चुका है, तो वैसे भी वह गोपनीयता के दायरे से बाहर हो गया है और ऐसे में राष्ट्रपति उस पर जवाबदेही से बच नहीं सकते. इसके अलावा सांसदों के पास भी सवाल करने का हक है. उस स्थिति में अगर राष्ट्रपति जवाब ना दें, तो सांसद अदालत का रास्ता भी चुन सकते हैं. कुल मिला कर इसका मतलब यही हुआ कि जितनी आसानी से ट्रंप के "एक्सीक्यूटिव प्रिविलिज" के दावे सामने आते रहे हैं, राष्ट्रपति ट्रंप के लिए उसे अमल में लाना उससे कहीं ज्यादा मुश्किल है.

आईबी/एए (रॉयटर्स)

 

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