विख्यात गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन | भारत | DW | 14.11.2019
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भारत

विख्यात गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन

प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन हो गया. कहा जाता है कि उन्होंने कभी आइंस्टाइन के सिद्धांत को भी चुनौती दी थी. 

सुप्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण का वृहस्पतिवार को पटना में निधन हो गया. वे 77 वर्ष के थे और लगभग पिछले चार दशकों से शिजोफ्रेनिया से पीड़ित थे. वृहस्पतिवार की सुबह उनकी हालत नाजुक होने के बाद उन्हें पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (पीएमसीएच) ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. 

भोजपुर जिले के बसंतपुर के रहने वाले सिंह को गणित के क्षेत्र में उनकी अद्वितीय उपलब्धियों के लिए याद किया जाता है. उन्होंने आइंस्टाइन के रिलेटिविटी के सिद्धांत को भी चुनौती दी थी. झारखण्ड (तब के बिहार) के प्रतिष्ठित नेतरहाट आवासीय विद्यालय से स्कूली शिक्षा और पटना साइंस कॉलेज से स्नातक करने के बाद, सिंह ने अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की. उनकी पीएचडी के विषय को आज भी अनूठा माना जाता है. विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर आज भी उनका विवरण मौजूद है. 

डॉक्टरेट पूरी हो जाने के बाद उन्हें अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा में काम करने का मौका मिला. 1971 में भारत लौट कर आने पर उन्होंने आईआईटी कानपुर में पढ़ाना शुरू किया. उसके बाद में वे मुंबई स्थित टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के साथ जुड़ गए. 1973 में वे कोलकाता में इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट में स्थायी प्राध्यापक नियुक्त किए गए. 2014 में उन्हें अपने गृह राज्य बिहार के मधेपुरा में भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक नियुक्त किया गया.

गणित में उनकी प्रतिभा विलक्षण थी. कुछ लोगों ने उनकी तुलना अमेरिकी गणितज्ञ जॉन नैश से भी की है जो उनकी ही तरह एक विलक्षण दिमाग के मालिक भी थे और शिजोफ्रेनिया के शिकार भी थे. नैश के जीवन पर "ए ब्यूटीफुल माइंड" नाम की फिल्म भी बनी थी. नैश की मानसिक बीमारी का अच्छा इलाज हुआ और वो उससे काफी हद तक बाहर भी आ गए थे. दूसरी तरफ सिंह एक लम्बे समय तक इलाज से वंचित रहे और उनकी दिमागी हालत लगातार बिगड़ती ही रही.

1972 में उनका विवाह भी हुआ लेकिन चार साल बाद उनकी बीमारी से ना जूझ पाने के कारण उनकी पत्नी उनसे अलग हो गईं. उनके भाई मानते हैं कि इसका उनकी दिमागी हालत पर और बुरा असर पड़ा. 1976 में उनके परिवार ने उन्हें रांची के पास कांके मानसिक रोगों के संस्थान में भर्ती करवाया जहां करीब 9 साल उनका इलाज चला. 1987 में वे अचानक घर से गायब हो गए और चार साल तक उनकी कोई खबर नहीं मिली. चार साल बाद कहीं से उनके परिवार को खबर मिली कि उन्हें अस्त-व्यस्त अवस्था में उनकी पूर्व-पत्नी के गांव में कूड़े के ढेर के पास पाया गया.

उसके बाद जब होहल्ला मचा तब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने उन्हें इलाज के लिए सरकारी खर्च पर बैंगलुरू भेजा. बाद में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा ने उनका इलाज दिल्ली के एक अस्पताल में भी कराया. गुरुवार को उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिहत प्रमुख लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनके निवास पर गए, उन्हें श्रद्धांजलि दी और पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनके अंतिम संस्कार की घोषणा की.

लालू प्रसाद के बेटे और पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी ट्वीट कर श्रद्धांजलि दी है. 

बेहद प्रतिभाशाली होने के बावजूद भी जिस तरह सिंह के जीवन का एक लम्बा काल दरिद्रता में बीता उसी तरह उनकी मृत्यु भी दयनीय अवस्था में ही हुई. बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी.

लेकिन उनका शव राजधानी के प्रमुख अस्पताल पीएमसीएच के बाहर घंटों खुले में पड़ा रहा. कम से कम दो घंटे तक अस्पताल प्रशासन ने उनके परिवार को एंबुलेंस मुहैया नहीं कराया. 

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