वायरस एक्सपर्ट बलि का बकरा बन रहे हैं? | दुनिया | DW | 02.06.2020
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दुनिया

वायरस एक्सपर्ट बलि का बकरा बन रहे हैं?

कोरोना महामारी से निटपने में सरकारों की मदद करने वाले विशेषज्ञ कई लोगों की नजर में नायक से खलनायक बनते जा रहे हैं. जर्मनी में वीरोलॉजिस्ट क्रिस्टियान ड्रोस्टेन पर हमलों ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है.

क्रिस्टियान ड्रोस्टेन

क्रिस्टियान ड्रोस्टेन एक जाने माने वायरस एक्सपर्ट हैं

हर देश में कम से कम एक ऐसा हाई प्रोफाइल कोविड-19 विशेषज्ञ है, जो इस संकट में अपनी सरकार के साथ हर जगह दिखता है. जर्मनी भी अपवाद नहीं है. यहां पर क्रिस्टियान ड्रोस्टेन बहुत जल्दी एक जाना माना नाम बन गए.

वह बर्लिन के मशहूर शारीटे अस्पताल के जाने माने वीरोलॉजिस्ट हैं. वह 2013 में सार्स वायरस को खोजने वाले वैज्ञानिकों में से एक रहे हैं. वह स्थानीय सरकारी प्रसारक एनडीआर के एक पॉडकास्ट से जन जन तक पहुंच गए. इसमें उन्होंने कोविड-19 से जुड़े लोगों के सवालों के जवाब दिए. यह इतना मशहूर हुआ कि इसे 4.3 करोड़ बार डाउनलोड या प्ले किया गया.

इस बीच ऐसे लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ने लगी जो कोविड-19 के खतरे से इनकार करते हैं और उन्होंने लॉकडाउन की पाबंदियों का विरोध करना शुरू कर दिया. ड्रोस्टेन और दूसरे वीरोलॉजिस्टों पर लोगों में दहशत फैलाने के आरोप लगने लगे. और फिर वे आलोचनाओं में घिरते गए.

ड्रोस्टेन बनाम बिल्ड

जर्मनी के सबसे बड़े अखबार बिल्ड ने ड्रोस्टेन पर बच्चों में कोविड-19 से जुड़े एक अध्ययन में फर्जी आंकड़े प्रकाशित करने और एक राजनीतिक एजेंडे को चलाने का आरोप लगाया. ड्रोस्टेन और उनकी टीम ने इस अध्ययन में पाया कि पूर्व के अनुमानों के विपरीत बच्चे भी इस वायरस से वैसे ही प्रभावित हो सकते हैं जैसे कि वयस्क. कुछ अन्य वैज्ञानिकों ने भी इस अध्ययन की आलोचना की.

लेकिन बिल्ड का दावा है कि ड्रोस्टेन के अध्ययन की वजह से जर्मनी में सभी स्कूल और किंडरगार्टेन बंद कर दिए गए. पाबंदियों का विरोध करने वाले इसे एक गलती बताते हैं. इसके बाद एक नई बहस शुरू हो गई. अर्थशास्त्री यॉर्ग स्टोए ने बिल्ड की कवरेज को "ड्रोस्टेन विरोधी मुहिम" का नाम दिया.

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कोविड-19 से निपटने पर ड्रोस्टेन की सलाहों पर आने वाले दिनों में संदेह और गहराने लगा. सोशल मीडिया के साथ साथ सड़कों पर उतर कर लोगों ने लॉकडाउन की पाबंदियों का विरोध किया. इस मामले में धुर दक्षिणपंथी और हर चीज में षडयंत्र तलाशने वाले लोग आगे दिखाई दिए.

यहां तक उदारवादी राजनीतिक पार्टियों से संबंध रखने वाले कई नेताओं ने भी ड्रोस्टेन और दूसरे वीरोलॉजिस्टों पर सवाल उठाए. जर्मनी में सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य नॉर्थराइन वेस्टफालिया राज्य के मुख्यमंत्री आर्मिन लाशेट सख्त लॉकडाउन कदमों के विरोधी हैं. वह कोरोना संकट को भुनाकर चांसलर अंगेला मैर्केल की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) के नए चेयरमैन बनना चाहते हैं. वह टीवी पर प्राइम टाइम बहस में वीरोलॉजिस्टों पर हर चंद दिनों में अपनी बात बदलने का आरोप लगा चुके हैं.

मौत की धमकियां

अन्य देशों में भी इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं. ब्रिटेन के साइटिंफिक एडवायजरी ग्रुफ फॉर इमरजेंसीज के सदस्य और वेलकम ट्रस्ट के निदेशक जेरेमी फारर ने ट्वीट कर कहा, "हममें से ज्यादातर लोगों को इस तरह की धमकियां मिल रही हैं."

अमेरिका में तो देश के अग्रणी संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ एंथनी फौसी को मौत की धमकियां मिलने के बाद निजी सुरक्षा मुहैया कराई जा रही है.

79 वर्षीय फौसी शटडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के कट्टर समर्थक रहे हैं जबकि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप उनकी बात से हमेशा सहमत नहीं होते. कई धुर दक्षिणपंथियों ने यहां तक कह दिया है कि फौसी का अकेला लक्ष्य ट्रंप को दोबारा राष्ट्रपति निर्वाचित होने से रोकना है. कई लोग फौसी की सलाहों को देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक मान रहे हैं.

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विज्ञान की प्रक्रिया

दूसरी तरफ कई लोग ड्रोस्टेन के समर्थन में भी आगे आए हैं. गोएटिंग इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी रिसर्च के मिषाएल ल्यूमन कहते हैं कि विज्ञान की प्रक्रिया को समझना होगा. उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "बहस, तर्क-वितर्क और विवाद विज्ञान का हिस्सा हैं और ज्ञान की खोज का हिस्सा हैं. विज्ञान की कोशिश हमेशा यह होनी चाहिए कि वह ज्ञान को समाज के लिए इस्तेमाल करे."

ल्यूमन यह भी कहते हैं कि अगर वैज्ञानिकों के योगदान पर पानी फेरने की कोशिश हो, उन्हें खारिज किया जाए तो फिर वैज्ञानिकों को भी एकजुट होकर लड़ना चाहिए. उनके मुताबिक, "इस संदर्भ में, एकजुटता सिर्फ एक शब्द नहीं है, ऐसे हमलों के खिलाफ एक रणनीति है.”

रिपोर्ट: केट ब्रैडी/एके

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