वर्चस्व स्थापित लेकिन जादू फीका | ब्लॉग | DW | 24.05.2015
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ब्लॉग

वर्चस्व स्थापित लेकिन जादू फीका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार का एक साल पूरा होने जा रहा है. क्या पहले साल में मोदी चुनाव के दौरान किए गए वादे पूरे कर पाए हैं? कुलदीप कुमार कर रहे हैं मोदी शासन के एक साल का लेखा जोखा.

अब यह रस्म बन चुकी है कि किसी भी सरकार का एक साल पूरा होने पर उसके कार्यकाल का लेखाजोखा किया जाये. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार तो खुद ही हर वर्ष अपना रिपोर्ट कार्ड पेश किया करती थी. इस एक साल में नरेंद्र मोदी ने ‘अच्छे दिन' लाने और देश को पारदर्शी सुशासन देने का अपना वादा किस हद तक निभाया है, यह देखना दिलचस्प है. वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर जैसे बीजेपी के प्रवक्ता दावा कर रहे हैं कि इस एक साल में देश की अर्थव्यवस्था की हालत बहुत सुधरी है और मोदी सरकार ने मजबूत नींव बनाने का काम किया है. अब सिर्फ इस नींव पर अर्थव्यवस्था के भव्य भवन के निर्माण का काम बचा है.

आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि मुद्रास्फीति कम हुई है, लेकिन आम आदमी का अनुभव इससे काफी भिन्न है. बाजार में आटा-दाल हो या फल-सब्जी, हर चीज के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं. सरकार पेट्रोल और डीजल की दामों में भी लगातार बढ़ोतरी करती जा रही है. उधर ‘मेक इन इंडिया' के नारे को अमली जामा पहनाने के लिए कोई उल्लेखनीय पहल सामने नहीं आयी है. उद्योग और व्यापार जगत को भी मोदी सरकार से जितनी उम्मीदें थीं, वे पूरी नहीं हो सकी हैं क्योंकि इस सबके मूल में मोदी की शासन शैली है, इसलिए उद्योग एवं व्यापार जगत में भी बेचैनी के लक्षण दिखने लगे हैं.

जिस ‘गुजरात मॉडल' की बहुत चर्चा थी, उसे भारत जैसे विविधता वाले विशाल देश पर लागू करना नितांत अव्यावहारिक है. मुख्यमंत्री के रूप में मोदी कुछ गिने-चुने विश्वासपात्र अफसरों के सहारे सरकार चलाते थे. प्रधानमंत्री के रूप में भी उन्होंने यही करने की कोशिश की है. नतीजतन मंत्री अप्रासंगिक होते गए हैं और सारी सत्ता प्रधानमंत्री कार्यालय में केन्द्रित होती गई है. यह स्पष्ट है कि केवल प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसरों के बल पर पूरे देश का शासन नहीं चलाया जा सकता. इस समय एक अजीब सी विरोधाभासी स्थिति है.

एक ओर मोदी सरकार देश को तेज गति के साथ विकास के रास्ते पर ले जाना चाहती है, और दूसरी ओर उसके फैसलों की गति बेहद धीमी है. सुशासन के लिए जिन नई प्रशासनिक संरचनाओं का निर्माण किया जाना चाहिए था, वह नहीं किया गया और पहले की संरचनाओं को ध्वस्त कर दिया गया. स्पीड के नाम पर 51 विधेयकों में से 43 को संसद की स्थायी समितियों के पास भेजा ही नहीं गया. इससे संसदीय प्रणाली कमजोर पड़ती है और सरकार के निर्णय लेने की गति में भी कोई तेजी नहीं आती.

प्रधानमंत्री मोदी संसद में उपस्थित होने के प्रति कतई उदासीन हैं. उन्होंने अभी तक न लोकपाल को नियुक्त करने की जरूरत महसूस की है और न ही मुख्य सूचना आयुक्त और मुख्य सतर्कता आयुक्त को. ऐसे में किस तरह भ्रष्टाचार मुक्त पारदर्शी ‘सुशासन' दिया जा सकता है, यह कोई भी समझ सकता है. मोदी रोजगार पैदा करने पर बहुत ज़ोर देते हैं. रोजगार के लिए शिक्षित एवं विभिन्न प्रकार के कौशल एवं क्षमता से लैस युवाओं की जरूरत होगी. लेकिन इस सरकार ने शिक्षा के प्रति जिस तरह का अगंभीर रवैया दिखाया है, वह अभूतपूर्व है. मानव संसाधन मंत्री के पद पर अभिनेत्री स्मृति ईरानी को बैठाया गया है जो स्वयं केवल बारहवीं कक्षा तक पढ़ी हैं. आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों के निदेशकों का चयन गैर-पेशेवर तरीके से किया जा रहा है. विश्वविद्यालयों में कुलपति के पद या तो खाली पड़े हैं और या उन पर ऐसे लोगों को नियुक्त किया जा रहा है जो आरएसएस की निगाह में तो योग्य हैं पर जिनकी शिक्षा जगत में कोई ख्याति नहीं है.

एक साल के भीतर पार्टी और सरकार में नरेंद्र मोदी का वर्चस्व पूरी तरह से स्थापित हो गया है. लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि आम जनता के बीच उनका जादू कुछ फीका पड़ा है. काला धन वापस लाने और महंगाई घटाने के उनके वादे खोखले साबित हुए हैं. उनकी पार्टी के सांसद और सरकार के मंत्री लगातार मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ उग्र और भड़काऊ बयान देते रहे हैं, लेकिन मोदी ने एक बार भी उन पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है. लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार करते समय अल्पसंख्यकों के एक वर्ग ने उनके आश्वासनों पर यकीन किया था और उन्हें वोट दिया था. लेकिन एक साल के दौरान उनका यह यकीन डगमगाया है. एक साल में नरेंद्र मोदी की छवि निखरने के बजाय धूमिल ही हुई है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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