लड़कियों के मन से कैसे निकलेगा अंधेरे का डर? | ब्लॉग | DW | 16.12.2019
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ब्लॉग

लड़कियों के मन से कैसे निकलेगा अंधेरे का डर?

अंधेरा घिरते ही जल्दी से घर पहुंचने या फिर घर से नहीं निकलने का डर भारत की लड़कियों के जीवन का जरूरी हिस्सा है. रात का अंधेरा हमारे समाज को क्यों बदल देता है?

भारत आज भी उबल रहा है और सात साल पहले भी उबल रहा था. हैदराबाद की डॉक्टर के साथ हुई गैंगरेप और हत्या की घटना के बाद देश में माहौल काफी हद तक वैसा ही बन गया जैसा निर्भया कांड के बाद हुआ था. कई शहरों में अनजान लोग महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर सड़क पर एक साथ उतरे हैं. इस उम्मीद में कि वो बदलाव ला सकते हैं. क्या कुछ बदलने वाला है?

7 साल पहले के उस वक्त की आपको याद दिलाते हैं. तब पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे. इंडिया गेट से लेकर सफदरजंग, दिल्ली से लेकर कोलकाता, असम से लेकर गुजरात तक बस एक ही नारा था, दोषियों को फांसी दो. इन सात सालों में लेकिन क्या बदला?

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली के मुनिरका से द्वारका जा रही लड़की का सामूहिक बलात्कार किया गया और बर्बरता से मार कर सड़क पर अधमरा छोड़ दिया गया. कई लोगों ने सड़क पर पड़ी उस लड़की को देखने के लिए गाड़ी धीमी की, और फिर अपने काम या अपने घर की ओर निकल पड़े. फिर पुलिस ने उसे देखा. अस्पताल पहुंचाया. सबको एकजुट करने वाली, सबको सड़कों पर लाने वाली खुद बच नहीं पाई.

निर्भया केस मेरे जैसे पत्रकारों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण रहा है. यह मेरा पहला रिपोर्टिंग असाइनमेंट था. कई कई दिन, कई कई घंटे सफदरजंग अस्पताल के बाहर खड़ी रही हूं. अस्पताल के बाहर कई लोग उस बेटी के लिए दुआएं मांगते भी देखे हैं. इंडिया गेट महिलाओं की सुरक्षा मांगते लोगों का ठिकाना बन गया था. बिना किसी नेता, पार्टी या झंडे के जमा हुए ये लोग एकजुट थे. युवाओं के नारों ने पूरा देश हिला दिया था. दोषियों को पकड़ा गया, उनको फांसी की सजा भी सुना दी गई. सात साल बीतने के बावजूद लेकिन सजा की प्रक्रिया मुकम्मल नहीं हो पाई है.

सवाल आज भी वही है जो 16 दिसंबर 2012 की घटना के वक्त था. क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश, युवाओं की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला मुल्क, महिलाओं में सुरक्षित होने का अहसास भर पाता है? जवाब हम सबको मालूम है. आज भी दिल्ली में लड़कियां सूरज डूबने के बाद अकेले घूमने में हिचकिचाती और घबराती हैं. चाहे दफ्तर से लौटने का वक्त हो या दोस्तों के साथ बाहर जाना, रोज सूर्यास्त लड़कियों के लिए सुरक्षा कवच को जैसे तोड़ देता है. दिल्ली में रहने वाली मेरे जैसी हर लड़की ने छेड़खानी, बदतमीजी जैसी घटनाओं का कई बार सामना किया है. लेकिन बदला कुछ नहीं.

अभी मैं दिल्ली से करीब 6200 किलोमीटर दूर जर्मनी के बॉन शहर में हूं. यहां पर डीडब्ल्यू हिंदी के साथ कुछ हफ्तों के लिए ट्रेनिंग पर आई हूं. यहां मुझे 2 हफ्ते पूरे हो गए हैं. सुबह 8 बजे ऑफिस पहुंचने के लिए निकलती हूं तो यहां अंधेरा रहता है. शुरु शुरु में अपने अपार्टमेंट से ऑफिस आने में वही डर लगा था जिसकी दिल्ली में आदत थी. सोचती थी कहीं कोई पीछा ना कर रहा हो, कोई ट्रेन में घूर ना रहा हो. ऑफिस से घर आने के समय भी इसी डर से जल्दी जल्दी घर आती रही.

दिल्ली में कई साल तक रहने के बाद यह डर आपके मन में घर बना लेता है. कुछ दिन तो बॉन में भी मेरे मन की यही दशा थी लेकिन धीरे धीरे पता चला कि यहां कोई ना किसी को घूरता है और ना ही पीछा करता है. अगर आप रास्ता भटक गए हैं तो आपको रास्ता बताने वाले कई लोग मिल जाएंगे लेकिन ना आपको उनसे कोई डर लगेगा ना वो डराएंगे. 

ऐसा नहीं है कि दिल्ली या भारत में आपके मददगार लोग नहीं हैं. बात है उस डर की जो नियमित छेड़खानियों और गैंगरेप की ऐसी घटनाओं के बाद हर लड़की के मन में बैठ गया है. उस डर को कैसे निकाला जाए जो बार बार हो रही रेप की घटनाओं के बाद और ज्यादा गहराता जा रहा है.

जर्मनी के बॉन शहर में आजकल उजाला सिर्फ 8 घंटे रहता है. दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा को देखते हुए हर ऑफिस में शाम 7 बजे के बाद उनको घर तक छोड़ा जाता है. या ऐसी शिफ्ट ही नहीं लगाई जाती कि ऑफिस में ही उनको देर हो जाए. सोचिए दिल्ली में भी सर्दियों में दिन अगर 8 घंटे के होते तो काम पर जाने वाली महिलाओं का क्या होता. क्या वो ऐसे मौसम में काम कर पाती.

मैंने दिल्ली और देश के अलग-अलग राज्यों में 7 साल रिपोर्टिंग की है. विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव, बाढ़, भूकंप और कोई भी बड़ी घटना रही हो उसे मैंने करीब से देखा है. निर्भया रेप केस मेरे दिल के हमेशा करीब रहेगा, इसके बहुत सारे कारण हैं. मैंने पहली बार देश को एकजुट होते हुए और सरकार से न्याय की मांग करते देखा था. हैदराबाद गैंगरेप और फिर संदिग्धों के एनकाउंटर के बाद देश में आवाजें उठने लगी कि भारत लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है.

भारत में ज्यादातर कंपनियां लड़कियों को रात के समय गार्ड के साथ गाड़ी देती हैं, जो उन्हें सही सलामत घर पहुंचाती है. सोचने वाली बात यह है कि हमें गार्ड की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्यों ऐसा माहौल नहीं बनाया जा रहा जहां पर लड़कियां घर से बाहर निकलने से पहले घड़ी देखने की मोहताज ना रहें.

भारत और खास कर उत्तर भारत की संस्कृति में बॉलीवुड का दखल काफी रहा है. लड़कियों को छेड़ना भले ही कम हो गया हो लेकिन सभी भारतीय लड़कियां छींटाकशी का सामना कर चुकी हैं. जर्मनी में किसी ने ईव टीजिंग शब्द नहीं सुना. थोड़ी चर्चा के बाद जब मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि ईव टीजिंग होती क्या है तो भी वो नहीं समझ सके.

किसी  राह चलती लड़की को ताने देने, सीटी बजाने या घूरने से क्या सुकून मिलता होगा. पूरा भारत बुरा नहीं है, लेकिन ज्यादातर लोग इस बुराई को रोकने के लिए खड़े नहीं होते. कुछ मामलों में तो छेड़खानी का विरोध करने पर झगड़ा और यहां तक कि हत्या जैसे मामले भी सामने आए हैं. ऐसे में राह चलते लोग अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए छेड़खानी देखते हुए भी चुपचाप गुजर जाते हैं. ईव टीजिंग धीरे धीरे हमारी संस्कृति में जैसे शामिल हो चुका है और अब ये किसी को अटपटा भी नहीं लगता. गांव और शहर दोनों जगह मेरी परवरिश होने की वजह से मैं आपको बता सकती हूं कि लड़की के चेहरे और कपड़ों से छेड़खानी का कोई संबंध नहीं है.

बहरहाल, ये बातें होती आ रही हैं और ज्यादातर लोगों को लगता है कि अब इसका कोई असर भी नहीं होगा. हैदराबाद में वेटेनरी डॉक्टर की हत्या और उसके बाद सड़कों पर उतरी जनता से साबित हो गया कि सरकार बदली, लेकिन वक्त अभी भी वहीं टिका हुआ है. यह वक्त खड़े खड़े आने जाने वाली लड़कियों पर फब्ती कसता है.

बहुत कम लड़कियां ही होती हैं, जो घर से दूर जाकर ही ये समझ पातीं हैं कि सुरक्षा और आत्मविश्वास जैसी चीजें आखिर होती क्या हैं. लेकिन क्यों ये समझने के लिए हजारों मीलों की दूरी तय करनी पड़ती है. यह अंधेरा कब तक भारत की लड़कियों को डराएगा.

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