लॉकडाउन ने मारी नेपाल के बंदरों के पेट पर लात | विज्ञान | DW | 09.04.2020
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विज्ञान

लॉकडाउन ने मारी नेपाल के बंदरों के पेट पर लात

नेपाल में तीन हफ्तों से लॉकडाउन लगा है, सड़कें खाली हैं और बंदर समझ नहीं पा रहे हैं कि खाना देने वाले इंसान अचानक कहां गायब हो गए हैं. यही हाल रहा तो काठमांडू के बंदर भूखे मर जाएंगे.

नेपाल की राजधानी काठमांडू में पिछले सालों में आबादी के बढ़ने से जानवरों का प्राकृतिक आवास भले ही छिनता रहा हो लेकिन इस बढ़ती आबादी ने इन जानवरों के और खास कर बंदरों के खाने पीने का इंतजाम जरूर किया हुआ था. अक्सर मंदिरों के बाहर बैठे इन बंदरों को आते जाते लोग फल खिला जाते थे. लेकिन इन दिनों ना ही कहीं फल दिख रहे हैं और ना फलों को खिलाने वाले लोग. ऐसे में बंदरों ने मंदिरों पर हमला बोल दिया है. जहां से जो मिल जाए वह खाने के लिए जमा कर रहे हैं. आसपास के जंगलों में भी खाने का सामान खोज रहे हैं.

शोवा बजराचार्य पिछले तीन सालों से स्वयंभूनाथ मंदिर में बंदरों को खाना खिला रही हैं. समाचार एजेंसी डीपीए से बात करते हुए उन्होंने कहा, "बंदरों को खाना नहीं मिल पा रहा है क्योंकि अब एक आध लोग ही बाहर आते हैं." इस मुश्किल हालात में भी शोवा अपने भाई के साथ मिल कर हर रोज पांच किलो खाना बंदरों तक पहुंचा रही हैं. लेकिन इतने खाने में ज्यादा से ज्यादा 500 बंदरों का पेट भरा जा सकता है, जबकि काठमांडू में करीब 1,400 बंदर रहते हैं. ये ज्यादातर मंदिरों के इर्द गिर्द ही दिखते हैं. अकेले पशुपतिनाथ मंदिर के पास ही करीब 500 बंदर रहते हैं. यहां एक बंदर के पेड़ की छाल खाने वाली तस्वीर हाल में काफी देखी गई. लॉकडाउन के बाद से यहां ऐसी वारदातें भी देखी जा रही हैं जब बंदरों ने किसी राहगीर का बैग छीन लिया हो या दुकानों में घुस कर खाना चुराया हो.

नेपाल में 24 मार्च से लॉकडाउन लगा है. अभी तक वहां कोरोना संक्रमण के नौ मामले सामने आए हैं. लॉकडाउन के बीच बिना अनुमति के घर से बाहर निकलने पर एक महीने जेल जी सजा हो सकती है. अधिकार समूहों का कहना है कि लॉकडाउन का असर देश भर में हर किसी पर हो रहा है लेकिन आवारा जानवरों के लिए यह बेहद बुरा साबित हो रहा है. एनीमल नेपाल की राधा गुरुंग का कहना है, "नेपाल को हजारों आवारा जानवरों जैसे कुत्ते, बिल्ली, गाय और इंसानों पर निर्भर करने वाले जंगली बंदरों और पक्षियों की सुरक्षा की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. इनके लिए खाने का स्रोत रेस्तरां या राहगीर ही थे जो कि अब हैं ही नहीं." उन्होंने बताया कि आवारा जानवरों के अलावा घोड़ों, गधों और खच्चरों पर भी इसका असर हुआ है क्योंकि आम तौर पर दिहाड़ी मजदूर इस तरह के जानवरों का इस्तेमाल करते हैं.

इसके विपरीत वन्य जीव विज्ञानी मुकेश चालीसे का कहना है कि यह एक अच्छा मौका है बंदरों को सिखाने का कि उन्हें प्राकृतिक रूप से अपना खाना कैसे तलाशना है. मुकेश जंगली जानवरों के जीवन में इंसानी हस्तक्षेप के खिलाफ हैं. वे कहते हैं, "हमारे पास एक जंगल में 450 बंदर हैं जबकि वहां जगह सिर्फ 50 की है. इसलिए क्योंकि यहां इन्हें आसानी से जंक फूड मिल जाता है. इससे उनकी सेहत, उर्वरता और जीवन प्रत्याशा पर भी असर पड़ता है. जब गैरजरूरी इंसानी हस्तक्षेप नहीं होगा तो बंदर खाने और जीने के लिए कुदरत की ओर लौटना सीख सकेंगे."

आईबी/ एए (डीपीए)

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