लॉकडाउन की वजह से बदल रहा है बच्चों का स्वभाव | विज्ञान | DW | 13.04.2020
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विज्ञान

लॉकडाउन की वजह से बदल रहा है बच्चों का स्वभाव

देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से लगातार घर में रहने के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है. वे बात-बात पर गुस्सा जता रहे हैं.

बाल रोग विशेषज्ञों और मनोचिकित्सकों के पास हाल के दिनों में ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं. इससे परेशान अभिभावक पश्चिम बंगाल बाल अधिकार सुरक्षा आयोग की हेल्पलाइन पर लगातार फोन कर रहे हैं. आयोग के काउंसेलरों ने कई बच्चों और किशोरों की काउंसेलिंग की है. देश के बाकी हिस्सों में भी यही स्थिति है. अब लॉकडाउन बढ़ने की स्थिति में समस्या और गंभीर होने का अंदेशा है.

14 साल का अनिकेत बीते सप्ताह एक दिन अचानक अपने माता-पिता पर चिल्लाने लगा. मानसिक तौर पर एकदम स्वस्थ अपने इकलौते बेटे का यह रूप देख कर वे  दोनों घबरा गए. लेकिन लॉकडाउन की वजह से तत्काल डॉक्टर के पास जाना संभव नहीं था. इसलिए अनिकेत के पिता सौरभ ने राज्य बाल अधिकार सुरक्षा आयोग के हेल्पलाइन नंबर पर फोन कर अपनी समस्या बताई. वहां से फोन पर ही दो दिनों तक लगभग आधे-आधे घंटे की काउंसेलिंग के बाद अब अनिकेत कुछ हद तक शांत है.

15 साल की मोमिता तो हर बात पर नाराज हो जाती है. मां की हर बात उसे कड़वी लगने लगी है. उसकी मां जूही बताती हैं, "मेरी बेटी पहले काफी सौम्य और शांत थी. लेकिन बीते 8-10 दिनों से उसका रवैया कुछ अजीब हो गया है. वह हर बात में मुंह फूला लेती है. पसंद का खाना नहीं बना तो नाराज, पढ़ने या खेलने के लिए बोलने पर भी वह नाराज हो जाती है.”

यह समस्या सिर्फ अनिकेत और मोमिता की नहीं है. बीते 20 दिनों से जारी लॉकडाउन की वजह से स्कूल और मोहल्ले के पार्क में आवाजाही बंद होने से लाखों बच्चे और उनके माता-पिता इसी हालत से गुजर रहे हैं. भारत में बच्चों की आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा है. मोटे अनुमान के मुताबिक देश में 47 करोड़ से ज्यादा बच्चे हैं. ऐसे में उनकी और उन के घरवालों की समस्या की गंभीरता समझी जा सकती है. खासकर शहरों में एकल परिवारों में यह समस्या और गंभीर होती जा रही है. यही वजह है कि पश्चिम बंगाल बाल अधिकार सुरक्षा आयोग समेत बच्चों के हित में काम करने वाली तमाम संस्थाओं की हेल्पलाइन पर रोजाना आने वाले फोन की तादाद लगातार बढ़ती ही जा रही है.

आयोग ने भी बच्चों की मानसिक स्थिति में आने वाले इस बदलाव पर चिंता जताते हुए कहा है कि लॉकडाउन और बढ़ने की वजह से हालात अभी और बिगड़ सकते हैं. आयोग की अध्यक्ष अनन्या चक्रवर्ती और काउंसेलर यशवंती श्रीमानी इस विषय को गंभीरता से ले रही हैं. यशवंती कहती हैं, "आजकल खासकर किशोर अपने घर में कुछ समय अकेले अपनी मर्जी के मुताबिक समय बिताना पसंद करते हैं. कुछ को अपने दोस्तों के साथ खेलना और गप्पें लड़ाना पंसद है. लेकिन लॉकडाउन की वजह से मां-बाप के हमेशा घर में रहने की वजह से यह सब बंद हो गया है.” वे कहती हैं कि ज्यादातर मां-बाप बेवजह ही बच्चों पर निगाह रखने के लिए उनके कमरों में जाते रहते हैं और हर बात में टोका-टोकी करते रहते हैं. इससे खास कर किशोर उम्र के लड़के-लड़कियों पर दबाव बढ़ रहा है. नतीजतन उनमें चिड़चिडापन पैदा हो रहा है. यह चिड़चिड़ापन बेवजह नाराजगी के तौर पर सामने आ रहा है.

मनोचिकित्सकों का कहना है कि इस समय कई माता-पिता घर से ही दफ्तर का काम भी कर रहे हैं. ऐसे में उनको घर और दफ्तर के काम के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है. इससे उनके दिमाग पर भी अतिरिक्त दबाव पैदा हो रहा है. इस वजह से ज्यादातर लोग बात-बेबात बच्चों को झिड़क देते हैं. इससे बच्चों पर दबाव पड़ता है. मनोचिकित्सक डॉक्टर सुब्रत लाहिड़ी मौजूदा हालात के लिए सिर्फ मां-बाप को ही दोषी नहीं मानते. वह कहते हैं, "अभिभावकों के सामने भविष्य की चिंता भी है. इतने लंबे लॉकडाउन से नौकरियां सुरक्षित रहेंगी या नहीं? और अगर रहीं भी तो कब तक? इसके अलावा ज्यादातर निजी कंपनियों ने वेतन में कटौती करने या दफ्तर बंद रहने के दौरान वेतन नहीं देने का भी एलान किया है. इस वजह से भी मां-बाप तनाव में रहते हैं.”

बाल अधिकार सुरक्षा आयोग की अध्यक्ष अनन्या कहती हैं, "हालात बेहद जटिल हैं और ऐसे में न चाहते हुए भी कई बार अप्रिय स्थिति पैदा हो जाती है. आयोग ने पहले ही अनुमान लगाया था कि लॉकडाउन का बच्चों के स्वभाव पर प्रतिकूल असर होगा. इसलिए हमने पहले ही हेल्पलाइन नंबर चालू करने का फैसला किया था.” वे बताती हैं कि इस हेल्पलाइन के जरिए मानसिक रोग विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों ओर बाल रोग विशेषज्ञों के साथ बच्चों और उनके माता-पिता की कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बात कराई जाती है. फिलहाल रोजाना सैकड़ों फोन आ रहे हैं. कई मामलो में बच्चों की काउंसेलिंग भी करनी होती है.

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मानसिक रोग विशेषज्ञों का कहना है कि शहरों में बढ़ते एकल परिवारों की वजह से यह समस्या और जटिल हो गई है. एक विशेषज्ञ डॉक्टर शिवब्रत चौधरी कहते हैं, "बच्चों को अपने जीवन में पहली बार ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है जब वे लगातार 20 दिनों से अपने घरों में बंद हैं. न तो बाहर खेलने जा सकते हैं और न ही स्कूल जा सकते हैं. किसी दोस्त से मुलाकात भी नहीं होती. ऐसे में आखिर बच्चे मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी से कब तक मन बहलाएंगे? दरअसल वे हालात से सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं. उम्र कम होने की वजह से उनमें परिस्थिति के मुताबिक खुद को ढालने की क्षमता विकसित नहीं हो सकी है.”

क्या इस स्थिति से बचने का कोई रास्ता नहीं है? मानसिक रोग विशेषज्ञ जयशंकर दासगुप्ता कहते हैं, "स्कूलों के बंद होने के बावजूद बच्चों को पहले के रूटीन के मुताबिक ही पढ़ाई करनी चाहिए. मां-बाप स्कूली शिक्षकों की तरह उनको रोजाना होमवर्क दे सकते हैं. इसके अलावा उनको घर के भीतर ही विभिन्न गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए. संभव हो तो समय निकाल कर मां-बाप को भी बच्चों के साथ उनकी ऐसी गतिविधियों में शामिल होना चाहिए. इससे बच्चा अलग-थलग महसूस नहीं करेगा. इसके साथ ही उनको समझाना होगा कि जल्दी ही यह दौर भी बीत जाएगा.”

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के कुछ आवासीय परिसरों में तो वहां रहने वालों ने बच्चों को व्यस्त रखने के लिए एक अनूठा कार्यक्रम शुरू किया है. इसके तहत परिसर के भीतर ही बच्चों से ऑर्गेनिक सब्जियों की खेती कराई जा रही है. इससे बच्चे खेती-किसानी के काम से जुड़ रहे हैं और खुश हैं. शहरी बच्चों के लिए यह एक नया अनुभव है. आठवीं में पढ़ने वाला सौम्यदीप कहता है, "यह काम बहुत अच्छा लग रहा है. इसमें समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता.” बच्चों की इस व्यस्तता और उनके चेहरे पर खिलने वाली हंसी देख कर वहां रहने वाले लोगों ने राहत की सांस ली है.

ऐसे एक परिसर में रहने वाले आईटी इंजीनियर विकास मंडल बताते हैं, "शुरुआत में हम बच्चों को ले कर काफी परेशान थे. घर से दफ्तर का काम करने की वजह से हम उनको ज्यादा समय नहीं दे पाते थे. लेकिन उसके बाद सबने मिल कर बच्चों को इस काम में लगाने का फैसला किया. अब बच्चे भी खुश हैं और हम भी. बच्चे रोजाना कुछ न कुछ नया सीख रहे हैं.”

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