लेखक लिखेगा नहीं तो समाज जिएगा कैसे | दुनिया | DW | 08.07.2016
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दुनिया

लेखक लिखेगा नहीं तो समाज जिएगा कैसे

मद्रास हाईकोर्ट ने लेखक पेरुमल के मामले में फैसला सुनाकर भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नया आयाम दिया है. कानूनी रास्ते से लेखक और लेखन का गला घोंटने की कोशिशें अब भारत में मुश्किल हो जाएंगी.

“अब पेरुमल जिंदा हो गया है,” अगर मद्रास (अब चेन्नई) हाईकोर्ट ने विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में फैसला नहीं सुनाया होता तो शायद ही तमिल साहित्यकार पेरुमल मुरुगन ऐसा न महसूस कर पाते. “लेखक पेरुमल मर गया है,” का ऐलान कर कलम रख देने वाले मुरुगन ने लेखन की मृत्यु की घोषणा तो कर ही दी थी. ये लगभग महान आर्टिस्ट मकबूल फिदा हुसैन की कला पर हमला और आत्मनिर्वासन में उनकी मौत हो जाने जैसा ही होता.

लेकिन हाईकोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी की हिफाजत की ऐसी अनूठी मिसाल पेश की है कि न सिर्फ लेखक समुदाय बल्कि तमाम नागरिक बिरादरी ने राहत की सांस ली है. और खुशी इस बात की है कि मुरुगन अपना लेखन फिर से शुरू कर सकेंगे. वे अपने समाज की विसंगतियों, बेचैनियों, अच्छाइयों और बुराइयों को अपने ढंग से अपनी रचनाओं में उतारते रहेंगे. कोर्ट ने जो कहा उसका लब्बोलुआब कुछ ऐसा था कि लेखक लिखेगा नहीं तो समाज जिएगा कैसे. आखिर जिंदा कौमें अपने लेखक को मरने नहीं देती. वे उसका पोषण करती हैं. क्या जर्मनी, स्पेन, फ्रांस, इटली, ईरान, फिलस्तीन की मिसालें हमारे सामने नहीं हैं?

करीब डेढ़ साल पहले प्रोफेसर पेरुमल मुरुगन की किताब “मधोरुबगन” को लेकर कुछ हिंदू कट्टरपंथी गुटों ने हिंसक प्रदर्शन किए थे. मुरुगन को बेइज्जत किया गया. उन्हें अधिकारियों की तरफ से समन जारी किया गया था और माफी मांगने के लिये मजबूर किया गया. इससे व्यथित होकर पेरुमल ने लिखना छोड़ दिया था. लेकिन अब अदालत ने कहा है कि उन्हें डरने की जरूरत नहीं और अपना लेखन जारी रखना चाहिये. इस फैसले से आश्वस्त मुरुगन ने फिर से लिखने का ऐलान किया है.

लेकिन इस राहत के साथ एक विडंबना और बड़ा दुर्भाग्य भी जुड़ा है कि एक रचनाकार की अभिव्यक्ति की आजादी को बरकरार रखने के लिये अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा है. संविधान निर्माण के लिए गठित संविधान सभा में हुई बहसों में ‘विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नागरिक स्वतंत्रताओं की आधार-रेखा कहा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने भी विचार और अभिव्यक्ति के इस मूल अधिकार को ‘लोकतंत्र के राजीनामे का मेहराब' कहा है. भारतीय संविधान की धारा 19(1) 6 मौलिक स्वतंत्रताओं को सुनिश्चित करती है जिसमें विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पहला स्थान है. धारा 19(2) में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिये तार्किक प्रतिबंधों का उल्लेख है. तमाम रचनाकर्मियों और पत्रकारों की शिकायत रहती है कि विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ तार्किक प्रतिबंधों का प्रावधान करके एक हाथ से जो अधिकार दिये गये हैं उन्हें दूसरे हाथ से ले लिया गया है.

लेकिन मुरुगन के मामले में अदालत का फैसला कहता है कि सरकार का काम कानून और व्यवस्था बनाए रखने का है और वो किसी रचनाकार की अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी नहीं लगा सकती. मुरुगन जैसे बहुत से मामले पिछले कुछ वर्षों में सामने आए हैं. न जाने कौन सी अधीरता, कौन सी बदनीयत समाज के एक हिस्से में घर करती जा रही है जो हर कड़वी और अप्रिय सी दिखने वाली बात पर बौखला और बाजदफा हिंसक हो जाती है. भारत की इन घटनाओं पर 1920 के दशक के इटली में पसरे फासीवाद के साए रेंगने लगते हैं.

इन तमाम खतरों और लेखकीय जोखिमो के बीच सवाल ये है कि क्या रचनाकारों के लिये कोई लक्ष्मणरेखा खींची जानी चाहिये. दक्षिणपंथी दुराग्रह चीख चीख कर कहता है कि रचनाकारों को एक लक्ष्मणरेखा का ख्याल रखना चाहिये और उन्हें ऐसा कुछ नहीं लिखना चाहिये जिससे किसी की भावना आहत हो. लेकिन अगर भावनाओं का सम्मान करने की दलील पर ही सोचने लग जाएं तब तो देश में आज भी सती प्रथा को जारी रखा जाना चाहिये था और संभवत: हिंदू कोड बिल भी न बना होता. कहने का आशय है कि असहमति को अवैध नहीं बनाया जा सकता है.

पेरुमल की किताब पर पाबंदी की मांग और हमले के बाद दक्षिण भारत में प्रगतिशील लेखकों के लिये लिखना ही चुनौती बन गई थी. लेखकों को लगने लगा था कि क्या वे लिखना जारी भी रख पाएंगे या नहीं. बताया जाता है कि चूंकि पेरुमल ने एक दलित महिला से विवाह किया है इसलिये भी उनके साथ ऐसा सलूक किया गया. आखिरकार लेखक के पास इन चीजों का मुकाबला करने के लिए क्या औजार बचते हैं? धमकियों और जानलेवा डर के साए में वो कैसे जिए, कैसे लिखे, कैसे छपे. मशहूर अंग्रेजी लेखिका नयनतारा सहगल ने पिछले साल ये बात उठाई थी कि रचनाकारों और प्रकाशकों की एक यूनियन होनी चाहिये जिससे कि भविष्य में कोई भी लेखक असुरक्षित न महसूस करे और अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा की जा सके. आखिर कोर्ट के सहारे तो लेखन जिंदा रहेगा नहीं.

एक सच्चे लेखक के पास ले देकर जो बचता है वो है उसमें विवेक, साहस और प्रतिरोध की भावना. वैसे माना तो यही जाता है कि बुरा दौर लेखन के लिए अच्छा दौर होता है. लेखक चुप रहेगा तो समाज सो जाएगा. हो सकता है वो बहुत गहरी नींद में चला जाए, कभी न जगे. सोचिए कितना भयावह होगा वो समय.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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