लुप्तप्राय जीव बनने जा रहे हैं जिराफ | विज्ञान | DW | 23.08.2019
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विज्ञान

लुप्तप्राय जीव बनने जा रहे हैं जिराफ

संयुक्त राष्ट्र की लुप्तप्राय जीवों के कारोबार को नियमबद्ध करने वाले विश्व वन्यजीव संरक्षण के कंवेशन में जिराफ के अंगों के वैध कारोबार को अंतरराष्ट्रीय नियमों में बांधने की कोशिश की गई है.

पहली बार जिराफों को खतरे में पड़े जीवों की सूची में डालने की बात हो रही है. इसका पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वालों और खासकर उप-सहारा अफ्रीकी देशों ने स्वागत किया है. विश्व वन्यजीव संरक्षण सम्मेलन में हुई वोटिंग में सम्मेलन का आयोजन करने वाली समिति यानी साइट्स ने कुछ प्रस्तावों की रूपरेखा सामने रखी. इन उपायों से जिराफ के शरीर के हिस्सों के व्यापार को नियंत्रित करने का काम होगा. जिराफ की खाल, हड्डियों की नक्काशी और मांस के व्यापार पर खास नजर होगी हालांकि इस पर पूरी तरह बैन नहीं लगाया जाएगा. इन उपायों को 21 के मुकाबले 106 वोटों से पास कर दिया गया. सात देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया. 

वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसायटी के इंटरनेशनल पॉलिसी की वाइस प्रेसिडेंट सुजन लीबरमान का कहना है, "इतने सारे लोग जिराफ के बारे में जानते हैं कि उन्हें लगता है बहुत सारे जिराफ होंगे. जैसे दक्षिण अफ्रीका में भले ही लगता हो कि वे ठीक होंगे लेकिन असल में गंभीर रूप से लुप्तप्राय हैं." लीबरमान बताती हैं कि पश्चिमी, केंद्रीय और पूर्वी अफ्रीका के हिस्सों में जिराफ खास तौर पर खतरे में हैं.

सोसायटी का मानना है कि जिराफ जैसे खतरों का सामना कर रहे हैं, उसके कारण उनकी जनसंख्या घट रही है. जिराफ के रहने की जगह कम होती जा रही है, जलवायु परिवर्तन के कारण ज्यादा सूखा पड़ने लगा है और उनके अंगों के अवैध व्यापार के लिए जिराफ की जान का खतरा बढ़ता जा रहा है. सदस्य देशों को जिराफ के अंगों के निर्यात का रिकॉर्ड रखना जरूरी होगा जो फिलहाल केवल अमेरिका कर रहा है. इसके साथ ही कारोबार के लिए परमिट लेना भी अनिवार्य किया जाएगा.

अफ्रीकन वाइल्डलाइफ फाउंडेशन की मैना फिलिप मुरुथि का कहना है, "पिछले 30 सालों में ही जिराफों का आबादी में 40 फीसदी से अधिक कमी आई है. अगर ऐसा चलता रहे तो हम उन्हें खो देंगे." केन्या में भी जिराफ की आबादी तेजी से कम हो रही है. इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) के पास मौजूद आंकड़ों के मुताबिक 1985 से 2015 के बीच अफ्रीका में जिराफों की संख्या 40 फीसदी घट कर एक लाख तक आ गई. फिर भी अफ्रीका के सभी देश इसे लेकर सहमत नहीं हैं. तंजानिया के प्राकृतिक संसाधन और पर्यटन मंत्रालय में वन्यजीव निदेशक मौरुस मसूहा ने कहा, "मुझे इस निर्णय का समर्थन करने की कोई वजह नहीं दिखती. क्योंकि तंजानिया में तो जिराफों की आबादी बढ़ ही रही है." उन्होंने बताया कि तंजानिया के आधे से ज्यादा जिराफ सेंरेंगेटी इकोसिस्टम के सुरक्षित माहौल में रहते हैं.

साइट्स के अधिकारी टॉम डे मॉयलेनार ने बताया कि सम्मेलन का मुख्य लक्ष्य जिराफ के अंगों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर ध्यान दिलाना था. जिराफ के अंगों का सबसे बड़ा खरीदार अमेरिका है. अमेरिका के भीतर भी जीव संरक्षण कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि ट्रंप प्रशासन जिराफ को अमेरिका के इन्डेजर्ड स्पिशीज एक्ट के अंतर्गत लेकर आए. एक हफ्ते पहले ही ट्रंप प्रशासन ने इस एक्ट को और हल्का बनाए जाने की बात कही है.

सहारा के आसपास के अफ्रीकी इलाकों में अब केवल 97,500 जिराफ बचे हैं. इंटरनेशनल यूनियन फॉर द कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) के मुताबिक 1985 की तुलना में यह संख्या करीब 40 फीसदी कम है. पश्चिम और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में जिराफ पाये जाते हैं. वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण यूरोप में पाया जाने वाला बोहिलिनिया नाम का जीव चीन और भारत की तरफ चला आया. बोहिलिनिया को आधुनिक जिराफ का पूर्वज माना जाता है.

आरपी/एनआर (एपी)

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