लिंडाऊ में विज्ञान का कुंभ शुरू | दुनिया | DW | 02.07.2012
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दुनिया

लिंडाऊ में विज्ञान का कुंभ शुरू

ऊर्जा के नए रास्ते तलाशते वैज्ञानिकों के साथ जर्मन शहर लिंडाऊ में नोबेल विजेताओं का सालाना सम्मेलन शुरू हो गया. घटते प्राकृतिक संसाधन और फुकुशीमा परमाणु हादसे के बाद नई तरह की ऊर्जा पर रिसर्च तेज हो गया है.

जर्मन शिक्षा मंत्री आनेटे शावान (बाएं)

जर्मन शिक्षा मंत्री आनेटे शावान (बाएं)

पहाड़, झील और सागर के बीच बसे छोटे से द्वीपीय शहर लिंडाऊ में हर साल विज्ञान के सबसे बड़े नाम जमा होते हैं. इस वजह से इसे हफ्ते भर का सबसे अक्लमंद शहर भी कहा जाता है. यहां नोबेल पुरस्कार विजेताओं के 62वें सम्मेलन को संबोधित करते हुए जर्मनी की शिक्षा और रिसर्च मंत्री अनेट शावान ने कहा कि ऊर्जा के क्षेत्र में रिसर्चर और नीति निर्धारकों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं.शावान ने कहा, “हम युवा रिसर्चरों को बढ़ावा देना चाहते हैं, जो भविष्य की तकनीक तैयार कर सकें. भविष्य के लिए यह हमारी जिम्मेदारी बनती है.” उन्होंने बताया कि इस बार नोबेल विजेताओं की बैठक में ऊर्जा का मुद्दा ही छाया रहेगा.जर्मनी में 2022 तक परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को बंद करने का फैसला किया जा चुका है और इस बीच दूसरे स्रोतों से ऊर्जा हासिल करने की तकनीक बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. इसे जर्मनी के सबसे बड़े राजनीतिक फैसलों में गिना जाता है.शिक्षा मंत्री शावान ने डॉयचे वेले से बातचीत में कहा कि तकनीक और विकास के क्षेत्र में भारत बड़ा रोल निभा सकता है. उन्होंने कहा, ”मैं इस साल नवंबर में भारत जाने वाली हूं और मुझे उम्मीद है कि उस दौरे में विकास और रिसर्च पर कुछ बड़े फैसले हो सकते हैं.”

जर्मनी, ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड की सीमा पर बसे खूबसूरत जर्मन शहर लिंडाऊ में इस बार फीजिक्स यानी भौतिकी पर आधारित सम्मेलन में 27 नोबेल पुरस्कार विजेता हिस्सा ले रहे हैं. यहां भारत के लगभग दो दर्जन युवा वैज्ञानिकों और रिसर्चरों सहित 69 देश की कुल 592 युवा प्रतिभाएं मौजूद हैं.इस मौके पर सिंगापुर के राष्ट्रपति और वैज्ञानिक रह चुके टोनी टे को सम्मानित किया गया. उन्हें लिंडाऊ फाउंडेशन के मानद सीनेट में शामिल कर लिया गया. यहां बारी बारी से हर साल मेडिकल साइंस, फीजिक्स और केमिस्ट्री के नोबेल पुरस्कार विजेता और युवा रिसर्चर जमा होते हैं.

कैसे शुरू हुआ सम्मेलन

लिंडाऊ शहर में 1950 से हर साल नोबेल विजेता वैज्ञानिकों और रिसर्चरों का जमावड़ा लगता है. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब जर्मनी बाकी दुनिया से अलग थलग हो गया तो दो वैज्ञानिकों गुस्ताव पराडे और फ्रांस क्राल हाइन ने इस आयोजन की शुरुआत की ताकि विज्ञान के क्षेत्र की जानकारी साझा हो सके.हालांकि पहले साल सिर्फ सात नोबेल पुरस्कार विजेता पहुंचे लेकिन अब इसे विज्ञान का कुंभ कहा जाने लगा है. यहां युवा रिसर्चरों को सिर्फ एक बार आने का मौका मिलता है. अलबत्ता अगर वे नोबेल पुरस्कार जीत जाएं, तो दोबारा आ सकते हैं.

भारत की छाप

लिंडाऊ नोबेल लॉरेट के आयोजन समिति की प्रेसिडेंट काउंटेस बेटिना बर्नाडोटे ने भारतीय पोशाक में आयोजन का उद्घाटन किया. सुनहरे रंग की सलवार कमीज पहने बर्नाडोटे ने कहा, ”लिंडाऊ भविष्य तय करने वाली जगह है. यहीं से शुरू हुई चर्चा के बाद दुनिया का सबसे बड़ा प्रयोगशाला सर्न शुरू हुआ.” इस साल डार्क मैटर से लेकर ऊर्जा सप्लाई तक के मुद्दों पर अहम बहस होने वाली है.इस मौके पर भारतीय मूल के अमेरिकी नोबेल पुरस्कार विजेता हरगोविंद खुराना को भी याद किया गया, जिनका बीते बरस निधन हो गया. यह सम्मेलन छह जुलाई तक चलेगा.

रिपोर्टः अनवर जे अशरफ, लिंडाऊ (जर्मनी)

संपादनः एन रंजन

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