लाहौर की मेट्रो रेल से कौन लोग गरीब हो गए | दुनिया | DW | 25.12.2020

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दुनिया

लाहौर की मेट्रो रेल से कौन लोग गरीब हो गए

लाहौर में चीन की मदद से मेट्रो रेल सेवा शुरू हुई है. स्थानीय यात्रियों की सुविधा तो बढ़ गई है लेकिन हजारों लोग अपनी संपत्ति और रोजी रोटी पर संकट के कारण नाखुश हैं. मेट्रो रेल ने इन लोगों का सुख चैन छीन लिया है.

लाहौर के अनारकली इलाके में जब बुलडोजरों की दहाड़ शुरू हुई तो शकील अहमद और उनके पड़ोसियों ने जा कर पास के एक धर्मस्थल में शरण ली. जाहिर है कि उन्हें अपनी संपत्ति और जमीन को खोने से नुकसान हुआ. 40 साल के अहमद का कहना है कि उन्हें अपना घर पंजाब की प्रांतीय सरकार को बाजार से कम कीमत में बेचने पर विवश किया गया. ये सारी कवायद इसलिए ताकि चीन के पैसे से पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े शहर में मेट्रो रेल चलाई जा सके.
1.8 अरब अमेरकी डॉलर की इस परियोजना का पहला चरण अक्टूबर में शुरू हो गया. इससे शहर के ट्रैफिक और प्रदूषण दोनों में भारी कमी आएगी. दक्षिण एशिया के सबसे प्रदूषित शहरों में एक लाहौर के लिए यह खुशी की बात है लेकिन इसकी वजह से सैकड़ों लोगों का भविष्य अनिश्चय में झूल रहा है. अहमद का कहना है, "मैं कहीं और नहीं जाना चाहता. मैंने पूरी जिंदगी में सिर्फ इसी जगह को जाना है." फिलहाल उन्होंने विख्यात मौज दरिया के पीछे एक कमरा किराए पर लिया है लेकिन उन्हें डर है कि इलाके में मेट्रो स्टेशन आने के बाद यहां किराया बढ़ जाएगा और तब उन जैसे लोगों का गुजारा मुश्किल होगा.

चीनी रेलवे नोरिंको इंटरनेशनल और उसके पाकिस्तानी साझीदारों की चलाई ऑरेंज लाइन चीन की उन दो दर्जन परियोजनाओं में शामिल है जिसे खरबों डॉलर के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत दुनिया के कई देशों में शुरू किया गया है. हर दिन ढाई लाख लोग इस रेल सेवा का इस्तेमाल करते हैं. बेहद सस्ती कही जाने वाली रेल सेवा का किराया 40 पाकिस्तानी रुपये है. सस्ती होने के साथ ही इसमें यात्रियों को आरामदायक और आधुनिक तकनीक से लैस यात्रा का मजा मिलता है.
अनारकली के चमचमाते मेट्रो स्टेशन के सामने खड़े स्थानीय निवासी 54 साल के कफील चौधरी का कहना है कि इससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को फायदा होगा. क्षेत्रीय पड़ोसियों के साथ ही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भी कोरोना वायरस की महामारी के कारण मंदी का सामना कर रही है.
चौधरी का कहना है, "इस तरह की आधुनिक सेवा के पाकिस्तान में कम ही उदाहरण हैं. ऐसी ट्रेनें तो केवल यूरोप में ही दिखती हैं लेकिन अब ये चीन की वजह से पाकिस्तान में भी हैं."

"नाकाफी मुआवजा"

ऑरेंज लाइन के कारण विस्थापित हुए लोग इस कारण मुश्किल में हैं, खासतौर से शहर के मेट्रो रूट पर मौजूद ऐतिहासिक इलाके में सदियों से रहते आए लोग. अहमद बताते हैं, "10 लाख रुपये में हमें इस इलाके मे कभी जगह नहीं मिलेगी." सरकारी इमारत महाराजा बिल्डिंग के एक कमरे वाले अपार्टमेंट में उनका परिवार बड़ी मुश्किल से गुजारा कर रहा है.

इस इमारत का एक हिस्सा मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए गिरा दिया गया. इसकी वजह से यहां रहने वाले अहमद समेत करीब 200 लोग बेघर हो गए. बाद में उन्हें उसी इमारत के बचे हिस्से में एक कमरा किराए पर मिल गया. इस इमारत में रहने वाले ज्यादातर लोगों को बस यही लगता है कि शहर के सबसे विख्यात इलाके में मौजूद उनकी संपत्ति छिन गई. अब यहां कीमतें बढ़ रही हैं लेकिन उन्हें इसका कोई फायदा नहीं मिलेगा.

लाहौर डेवलपमेंट अथॉरिटी के मुताबिक इमारत में रहने वाले करीब 50 परिवारों को एकमुश्त 10 लाख पाकिस्तानी रुपया प्रति रूम के हिसाब से दिया गया. हालांकि ज्यादातर लोग इससे नाखुश हैं. उनका कहना है कि घर खाी कराने के लिए वो लोग पुलिस के साथ आए. स्थानीय वकील जरगाम लुकेसर इस मेट्रो का रूट बदलवाने के लिए अभियान चलाने वालों में हैं. उनका कहना है कि निचले तबके के बहुत सारे लोगों को इस मेट्रो रेल के लिए संपत्ति बेचने पर मजबूर किया गया.


लाहौर डेवलपमेंट अथॉरिटी का कहना है कि सरकारी इमारतों में रहने वाले लोगों के मुआवजे के लिए 1.6 अरब और निजी संपत्ति के मालिकों के लिए 20 अरब रुपये निकाले गए थे. जमीन का अधिग्रहण अंग्रेजों के जमाने में बने 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत किया गया. इस कानून में सरकार को अधिकार है कि वह मुआवजा और एडवांस नोटिस दे कर लोगों की जमीन अपने कब्जे में ले सकती है.
अथॉरिटी के प्रवक्ता लोगों पर संपत्ति बेचने के लिए दबाव डालने से इनकार करते हैं और साथ ही बाजार भाव से कम मुआवाजा देने की बात से भी. उनका कहना है कि सरकार ने ऐसे लोगों को भी मुआवजा दिया है जिनके पास संपत्ति के पर्याप्त दस्तावेज मौजूद नहीं थे. प्रवक्ता का कहना है, "निवासियों को मानवीय आधार पर सरकार ने पुनर्वास के लिए मुआवजा दिया, वो भी तब जब उनके मालिकाना हक के पूरे दस्तावेज भी नहीं थे."

"मेट्रो ने बनाया गरीब"

महाराजा बिल्डिंग का एक हिस्सा गिराने के बाद वहां रहने वालों को लगा की उनकी मुसीबत खत्म हो गई लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हुआ. इमारत के बाहर पैदल चलने वालों के लिए बना रास्ते पर अब भी धातु की चादरें रखी हुई हैं. ऑरेंज लाइन के लिए मौज दरिया की जब मुख्य मस्जिद ढहा दी गई तो उसके बदले बनी एक कोने में अस्थायी मस्जिद बनाई गई. महाराजा बिल्डिंग में रहने वाली समीना नईम कहती हैं, "ये इमारत अब सुरक्षित नहीं है." सरकार ढहाई गई मस्जिद के बदले एक और मस्जिद बना रही है.


वकील लुकेसार कहते हैं कि सिर्फ स्थानीय लोगों की जिंदगी में ही ऑरेंज लाइन के कारण उथल पुथल नहीं हुई है. उनके मुताबिक, "पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था बिखर गई है. गली में बैठने वाले छोटे दुकानदारों को हटना पड़ा, पेड़ों को हटाया गया, बहुत ज्यादा असर हुआ है." मेट्रो लाइन के रास्ते में आए 600 पेड़ गिरा दिए गए. मौज दरिया समेत कई ऐतिहासिक विरासतों को भी नुकसान पहुंचा.
मेट्रो से नाखुश लोगों की एक दलील यह भी है कि चीन का निवेश पाकिस्तान पर कर्ज का बोझ बढ़ा रहा है. देश पर अब राष्ट्रीय बजट का 40 फीसदी कर्ज है. मेट्रो के सस्ते टिकट की कीमत पूरे देश की जनता के कंधों पर है. 40 साल की मुमताज कहती हैं, "मैं जब अपने शहर, अपनी जेब, अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण की ओर देखती हूं तो लगता है कि हम और गरीब हो गए."
एनआर/ओएसजे(रॉयटर्स)

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