रूह अफजा: जो देश के बंटवारे के समय बंट गया | दुनिया | DW | 09.05.2019
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

रूह अफजा: जो देश के बंटवारे के समय बंट गया

रूह अफजा सिर्फ एक शरबत नहीं रह गया है बल्कि एक इतिहास रच चुका है. एक शरबत जिसने आजादी की सुबह देखी और देश के बंटवारे के साथ साथ खुद अपना बंटवारा भी देखा.

हर भारतीय की जुबान पर रहने वाला ठंडे शरबत का एक ब्रांड रूह अफजा आजकल मार्केट से गायब सा है. रमजान का महीना चल रहा है, जब कई मुसलमान रोज़े रखते हैं. इसमें सूरज निकलने से पहले और डूबने तक कुछ न खाने पीने के बाद, रोजा खोलने के लिए इफ्तारी की जाती है. जब भी गर्मियों में इफ्तारी हो तो रूह अफजा शरबत का इंतजाम जरूर होता था. गहरे लाल रंग का यह शरबत पहले से बना कर रख लिया जाता और हर कोई इससे अपनी प्यास बुझाता.

लेकिन इस बार मार्केट में रूह अफजा की कमी हो गई. बहुत से रोजेदारों ने अपनी परेशानी सोशल मीडिया पर शेयर कर लिखा कि रूह अफजा के बिना इफ्तार अधूरा है, रूह अफजा की कमी खल रही है वगैरह. नतीजा मीडिया में स्टोरी आ गई कि रूह अफजा के बिना रमजान अधूरा रहेगा. ट्विटर पर रूह अफजा ट्रेंड कर गया. जिन लोगों को रूह अफजा की बोतल मिल गई, उन्होंने उसके साथ सेल्फी भी सोशल मीडिया पर पोस्ट की. बात यहां तक पहुंची कि पाकिस्तान में रूह अफजा बनाने वाली कंपनी के प्रमुख ने वहां से ट्रक में भरकर इसे भारत भेजने की पेशकश भी कर दी.

रूह अफजा का इतिहास

साल 1906 में हकीम अब्दुल मजीद ने दिल्ली के लाल कुआं इलाके में हमदर्द नाम का यूनानी दवाखाना खोला. फिर 1907 में एक सॉफ्ट ड्रिंक रूह अफजा मार्केट में लांच की. शीशे की बोतल में पैक रूह अफजा का लोगो तब मिर्ज़ा नूर मोहम्मद ने बनाया था. इसके स्टीकर बॉम्बे से तब छप कर आये थे. इसमें तमाम जड़ी बूटियां, संदल, फलों के रस मिलाए गए थे, जिसके कारण इसको पीते ही ठंडक पहुंचती थी. हाथों हाथ रूह अफजा बिकना शुरू हो गया. इसका नाम लखनऊ के पंडित दया शंकर 'नसीम' की किताब 'मसनवी गुलज़ार ए नसीम' से लिया गया था जिसमे रूह अफजा नाम का एक पात्र था.

सालों साल से रूह अफजा भारत में लोगों की पसंद बना रहा. लेकिन 1947 में भारत का बंटवारा हुआ और तब परिवार के एक सदस्य हकीम अब्दुल सईद पाकिस्तान चले गए. जहां पर उन्होंने हमदर्द पकिस्तान की स्थापना की. इस तरह वहां भी रूह अफजा पहुंच गया. हकीम अब्दुल सईद ने रूह अफजा को पूर्वी पाकिस्तान में भी पहुंचाया और जब वो 1971 में बांग्लादेश बन गया तब उन्होंने अपना कारोबार समेटने के बजाए वहीं के कर्मचारियों को दे दिया. इस तरह आज रूह अफजा बांग्लादेश में भी है. यानी भारत से शुरू हुआ प्रोडक्ट जैसे जैसे देश बनते गए वहां वहां पहुंचता गया.

आज भारत में मौजूद हमदर्द (वक्फ) लैबोरेट्रीज रूह अफजा के अलावा और भी तमाम उत्पाद बनाती है. ये कंपनी अपने आपको वक्फ यानी इस्लामिक ट्रस्ट के सिद्धांत पर चलाने का दावा करती है. भले ही रूह अफजा के प्रोडक्शन पर असर पड़ा हो लेकिन मीडिया में छपी खबरों के अनुसार अब हकीम परिवार में एकाधिकार की जंग छिड़ चुकी है जिससे कंपनी का कामकाज प्रभावित हो रहा है. फिलहाल रूह अफजा के उत्पादन पर ब्रेक लगा हुआ है. हालांकि ऐसी किसी बात कि अधिकारिक पुष्टि रूह अफजा की तरफ से नहीं की गयी है.

रूह अफजा का फेसबुक अकाउंट सितम्बर 2018 से अपडेट नहीं था. इधर इतना हल्ला मचने और रूह अफ़ज़ा की कमी के बाद उस पर 6 मई को अपडेट किया गया, जिसमें उन्होंने अपने ग्राहकों द्वारा दर्शाए गए प्यार का धन्यवाद दिया और स्टॉकिस्ट की लिस्ट जारी की है. रूह अफजा की एक बोतल की कीमत भारत में 145 रुपये है.

Indien Ramzan (UNI)

जुलाई 2015 में रूह अफजा के साथ इफ्तार पार्टी में शामिल कांग्रेस नेता शकील अहमद और अन्य.

रूह अफजा और रमजान

रूह अफजा भले ही पहले एक चिकित्सीय पेय की तरह बनाया गया हो लेकिन जल्दी ही ये एक गर्मी में शीतलता देने वाला पेय बन गया. इसकी इतने दिन तक टिके रहने की वजह एक ये भी है कि ये अपनी पुरानी रेसिपी पर चल रहा है. इसका स्वाद कभी नहीं बदला. जिसने बचपन में रूह अफजा पिया है उसको आज भी वही स्वाद मिलता है. इससे एक लॉयल कस्टमर बेस तैयार होती गई.

रमजान जब जब गर्मी में हुए हैं तब हमेशा इफ्तार के समय ठंडा पेय जरूर बनाया जाता था. ऐसे में रूह अफजा आसानी से उपलब्ध रहता था. इसको बनाना भी बहुत आसान था. इसका कंसन्ट्रेट ठंडे पानी में घोलिए और रूह अफजा तैयार. एक बोतल बहुत चलती थी. आमतौर पर हर मुस्लिम घर में रूह अफजा रहता ही था. शादी के बाद भी लड़कियां अपने ससुराल जाकर रूह अफजा जरूर बनाती थीं. इसके अलावा इसका लाल रंग अलग से आकर्षित करता था. धीरे धीरे रूह अफजा अब रमजान में इफ्तार का एक हिस्सा बन गया. इसीलिए इस बार जब इसकी कमी हुई तो हाय तौबा मच गई कि रमजान में रूह अफजा उपलब्ध नहीं है और मुसलमान परेशान हो रहे हैं. वैसे रमजान में रूह अफजा का शरबत बनाने का कोई धार्मिक महत्व नहीं है.

लखनऊ की रहने वाली ज़ेबा रफत के अनुसार, "रूह अफजा से आप सिर्फ शरबत नहीं बल्कि मिल्क शेक, लस्सी और आइसक्रीम तक बना सकते है. इतनी विविधता किसी एक ड्रिंक में नहीं मिलती है.” अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र में पीएचडी कर रहे सलमान सिद्दीकी कहते हैं, "रमजान के पहले दिन रूह अफजा नहीं मिला. फिर मैंने ढूंढ कर एक दुकान से एक बोतल खरीदा. हाथ में लेते ही लगा कि कुछ खास मिल गया.” दिल्ली के रहने वाले शाहनवाज़ मलिक तो तीन बोतल रूह अफजा खरीद लाए और बड़े गर्व से फेसबुक पर फोटो पोस्ट की. मलिक कहते हैं, "अब पूरे रमजान का रूह अफजा मेरे पास स्टॉक में हैं.”

DW.COM

विज्ञापन