रिम्शा के सारे आरोप खत्म | दुनिया | DW | 20.11.2012
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दुनिया

रिम्शा के सारे आरोप खत्म

पाकिस्तान की एक अदालत ने ईशनिंदा के आरोप झेल रही ईसाई लड़की रिम्शा मसीह के खिलाफ सारे आरोप खत्म कर दिए हैं. मासूम बच्ची पर ईशनिंदा के आरोप लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय कड़ी निंदा कर चुकी है.

रिम्शा के वकील अकमल भट्टी ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "कोर्ट ने मामला खत्म कर दिया है और रिम्शा को बेगुनाह करार दिया है." पाकिस्तान की राष्ट्रीय कैबिनेट में एकमात्र ईसाई सदस्य पॉल भट्टी ने इस बात की पुष्टि की है कि हाई कोर्ट ने रिम्शा के खिलाफ सारे आरोप खत्म कर दिए हैं.

पॉल भट्टी ने कहा, "मैं इस फैसले का स्वागत करता हूं, न्याय हुआ है. अदालत के फैसले से देश में न्याय की नींव मजबूत हुई है. इस फैसले से पूरे पाकिस्तान की एक सकारात्मक छवि बनेगी और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह संदेश जाएगा कि यहां का समाज न्याय और सहिष्णुता के लिए उठ खड़ा हुआ है."

रिम्शा मसीह को इसी साल 16 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया था और उसे तीन हफ्ते की रिमांड पर बड़े लोगों की जेल में रखा गया. रिम्शा मसीह पर कथित रूप से कुरान के पन्ने जलाने के आरोप लगाए गए. इस मामले पर दुनिया भर से तीखी प्रतिक्रिया आई. सितंबर में रिम्शा को जमानत पर रिहा कर दिया गया.

इसके बाद पुलिस ने बताया कि रिम्शा ने कोई अपराध नहीं किया है. वास्तव में दोषी वह नहीं, मस्जिद का मौलवी था जिसने जान बूझ कर जले हुए कुरान के पन्ने रिम्शा के थैले में रख दिए जिससे कि उसे फंसाया जा सके. पुलिस ने कहा कि रिम्शा की बजाय मौलवी पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए. मौलवी हाफिज मुहम्मद खालिद चिश्ती ने पुलिस को सबसे पहले रिम्शा के खिलाफ सबूत के तौर पर कुरान के जले हुए पन्ने दिए थे. खालिद चिश्ती पर कुरान को अपवित्र करने और सबूत के साथ छेड़छाड़ करने का मामला दर्ज किया गया है.

एक आधिकारिक मेडिकल रिपोर्ट में रिम्शा को अशिक्षित और 14 साल की उम्र का बताया गया. इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि रिम्शा की मानसिक आयु उसकी उम्र से कम है. कुछ लोगों ने यह भी कहा कि दिमागी तौर पर उसकी आयु 11 साल ही है और वह निराशा के दौर से गुजर रही है. उसका परिवार इन आरोपों की वजह से डर के साए में जी रहा है. रिम्शा के जेल से रिहा होने के बाद उसे परिवार समेत पाकिस्तान के किसी अज्ञात स्थान पर रहने के लिए भेज दिया गया है.

पाकिस्तान में ईशनिंदा के कानून की वजह से अकसर मामले उलझ जाते हैं. देश में कट्टरपंथियों को इस कानून के जरिए अपनी ज्यादतियों को जायज ठहराने का मौका मिल जाता है और उदारवादी लोग इसके शिकार बनते हैं.

एनआर/एमजी(एएफपी)

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