रिटायर होने के बाद भी क्यों काम करना चाहते हैं पेंशनर | दुनिया | DW | 23.09.2019
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दुनिया

रिटायर होने के बाद भी क्यों काम करना चाहते हैं पेंशनर

अपने आस पास देखिए, बहुत से लोग रिटायर होने के बावजूद काम करते दिखेंगे. किसी के लिए अतिरिक्त आय जरूरी है तो किसी के लिए अपना अनुभव बांटने की ललक. पेंशनरों का स्वस्थ और तंदरुस्त होना भी इस प्रक्रिया को बढ़ावा दे रहा है.

इन दिनों भारत सरकार की पेंशन के नियम बदलने वाली एक योजना पर चर्चा है. अभी तक लोग आम तौर पर जिस महीने में 60 के हो जाते हैं उसके अगले महीने से वे पेंशन के हकदार हो जाते हैं. केंद्र सरकार में बहुत सारी ऐसी नौकरियां बना दी गई हैं जो पेंशन की उम्र के बाद ही अधिकारियों को दी जाती है. एक तरह से नौकरी की आयु बढ़ाने की प्रक्रिया. प्रोफेसरों के रिटायरमेंट की उम्र पहले ही 60 से 65 की जा चुकी है. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में भी जजों के रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने के प्रस्ताव हैं. बहुत से लोग इसलिए भी काम करते रहना चाहते हैं कि नौकरी का मतलब सिर्फ पूरा वेतन ही नहीं होता, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक दबदबा भी होता है. दूसरी ओर यह भी कहा जा सकता है कि पेंशन इतना कम है कि लोग काम करते रहना चाहते हैं. लेकिन काम करते रहने की हर किसी की वजह अलग हो सकती है.

जर्मनी में हालात अलग हैं. पेंशन को भरे पूरे काम के जीवन का ताज समझा जाता है जब काम किए बिना एक खास रकम मिलती रहे और जीवन चलाने के लिए काम करने की जरूरत न रहे. यहां पेंशन की उम्र सामाजिक और आर्थिक जरूरतों के हिसाब से तय की जाती है और हाल के सालों में बढ़ाई गई है. कुछ साल पहले तक यहां पेंशन की उम्र 65 थी जिसे अब बढ़ाकर 67 कर दिया गया है. इससे सरकारी पेंशन फंड पर बोझ घटा है. सरकार पर अभी भी पेंशन का बड़ा बोझ है. जर्मन सरकार का सालाना बजट करीब 357 अरब यूरो है. इसमें से सबसे बड़ा हिस्सा यानि करीब 144 अरब यूरो का बजट केवल श्रम मंत्रालय का है, जिसके जिम्मे कुल आबादी के करीब 20 प्रतिशत लोगों को पेंशन देने की भी जिम्मेदारी है. इस बोझ को और घटाने के लिए अक्सर पेंशन की आयु को बढ़ाकर 70 करने पर भी बहस होती रहती है. लेकिन बहुत से लोग इसके खिलाफ हैं, क्योंकि वे 40-45 साल की मेहनत वाली नौकरी के बाद कुछ समय खुद अपने लिए, अपने परिवार के लिए और अपनी हॉबी के लिए चाहते हैं. बहुत से पेशे ऐसे भी हैं जिनमें शारीरिक मेहनत के कारण 67 की उम्र तक काम करना संभव नहीं है.

जर्मनी में आम तौर पर पेंशन की आयु तय है. ट्रेड यूनियम के साथ हुए अधिकतर समझौतों में तय है कि 67 की आयु में कर्मचारी रिटायर हो जाएगा. ऐसा इसलिए भी है कि लोग रिटायर होंगे तभी कंपनियों या दफ्तरों में युवा लोग आ पाएंगे, उन्हें नौकरी मिल पाएगी. यदि पुराने लोग अपने अनुभव का हवाला देकर रिटायर ही ना होना चाहें तो फिर पूरी संरचना में ठहराव आ जाएगा और युवा लोगों को न तो नौकरी मिलेगी और न ही उनका प्रमोशन होगा, जिसके साथ नई जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं. इसलिए पिछले सालों में जर्मनी में ट्रेड यूनियनों की बड़ी मांग रही है कि उद्यम युवा लोगों को प्रशिक्षित करें और प्रशिक्षण के बाद उन्हें नौकरी पर भी रखें. फिर भी बहुत से लोग हैं जो रिटायर होने के बाद भी काम करना चाहते हैं. इनमें से कुछ लोग ऐसे हैं जिनका पेंशन पर्याप्त नहीं है. पेंशन फंड पर दबाव के चलते पिछले सालों में जर्मनी में पेंशन घटा है. अर्थव्यवस्था पर दबाव और बचत पर पर्याप्त ब्याज न मिलने के कारण भी कम आय वाले लोगों की आर्थिक मुश्किलें बढ़ी हैं. दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने काम से संतुष्ट रहे हैं और रिटायर होने के बाद कमाई के लिए नहीं बल्कि अपने अनुभव बांटने के लिए काम करते रहना चाहते हैं.

यूरोप में साझा बाजार ने भी रिटायर्ड विशेषज्ञों को नई संभावनाएं दी हैं. जर्मनी और ऑस्ट्रिया में इस बीच कई ऑनलाइन जॉब पोर्टल बने हैं जो सीनियर विशेषज्ञों को काम करने और उद्यमों को रिटायर्ड एक्सपर्टों की सेवाएं लेने का मौका देते हैं. खासकर श्रम बाजार में कामगारों की कमी को देखते हुए रिटायर्ड लोगों की सेवाएं कुछ क्षेत्रों में बहुत जरूरी हो गई हैं. मसलन चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में. अस्पतालों में काम का बोझ बढ़ने की वजह से रिटायर्ड डॉक्टरों की भी मांग बढ़ी है. खासकर वीकएंड में जब दूसरे युवा डॉक्टर अपने परिवारों के साथ रहना चाहते हैं, वे उनका बोझ बांट सकते हैं. उद्यमों के लिए एक फायदा यह भी है कि उन्हें रिटायर्ड लोगों की सेवा लेने के लिए उनके मेहनताने पर पेंशन, चिकित्सा या बेरोजगारी भत्ते का हिस्सा नहीं देना पड़ता. इस मद पर करीब 20 प्रतिशत की बचत हो जाती है. ये बेवजह नहीं है कि जर्मनी में करीब 10 प्रतिशत पेंशनर काम कर रहे हैं. पिछले साल हुए माइक्रो जनगणना के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं. 2017 में 65 से ज्यादा उम्र के करीब 10 लाख लोग काम कर रहे थे जबकि 10 साल पहले 2007 में ये तादाद करीब 600,000 ही थी. इसकी एक वजह तो ये है कि आजकल के पेंशनरों का जीवन के प्रति रवैया बदल रहा है. वे पिछली पीढ़ी के मुकाबले ज्यादा सक्रिय रहना चाहते हैं.

जर्मन उद्योग ने तो सीनियर एक्सपर्ट सर्विस नाम से एक संस्था भी बना रखी है जिसके माध्यम से रिटायर्ड एक्सपर्ट विकासशील देशों और जर्मनी में विभिन्न प्रोजेक्टों में काम कर रहे हैं और दुनिया के 160 देशों में अपने अनुभव स्वयंसेवी के रूप में दे रहे हैं. ये एक्सपर्ट 50 विभिन्न पेशों के हैं और संस्था का पहला प्रोजेक्ट 1983 में ब्राजील में एक कृषि सहकारिता बनाने में मदद देना था. इस बीच वे छोटे और मझौले उद्यमों, सरकारी प्रशासन, सामाजिक और चिकित्सीय संस्थानों और शिक्षा संस्थानों में मदद दे रहे हैं. इस संस्था की मदद से ऐसे लोग भी सामाजिक सेवा कर रहे हैं जो पहले अपने पेशों की वजह से इसके लिए समय नहीं दे पाए. जर्मन उद्योग जगत की यह संस्था दुनिया भर के देशों के साथ विकास सहयोग में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है.

जर्मनी में बुढ़ापे पर कराए गए एक सर्वे के अनुसार पांच में से 3 लोग काम करने को लोगों के साथ संपर्क में रहने का साधन मानते हैं. बड़े परिवार रहे नहीं. रिटायरमेंट अकेले गुजारने के बदले नौकरी करने में यही उनकी प्रेरणा भी है. दो तिहाई लोगों का कहना है कि वे रिटायर होने के बाद काम करते रहने को बहुत खास समझते हैं. ये भावना उन्हें प्रेरित करती है कि समाज को अभी भी उनकी जरूरत है. स्वाभाविक है काम करने वाले पेंशनरों में ऐसे लोगों का अनुपात दोगुना है जिनके पास विश्वविद्यालय की डिग्री है. वे हफ्ते में 10 से 16 घंटे काम करते हैं और उनका कहना है कि उनके पास आराम करने और परिवार के साथ रहने के लिए पर्याप्त वक्त होता है. ऐसे लोगों की संख्या करीब एक तिहाई है जो अपने पेंशन में इजाफे के लिए काम करते हैं, ताकि एक एक्स्ट्रा छुट्टी बिता सकें या फिर पोते-पोतियों को तोहफा देने के लिए उनके पास अतिरिक्त साधन हों.

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