राज कपूर की आवाज थे मुकेश | मनोरंजन | DW | 22.07.2014
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मनोरंजन

राज कपूर की आवाज थे मुकेश

मुकेश दर्द भरे नगमों के बेताज बादशाह थे. ना केवल उनके गाए गीतों में संवेदनशीलता झलकती है, बल्कि निजी जिंदगी में भी वह बेहद संवेदनशील इंसान थे, जो दूसरों के दुख दर्द को अपना समझकर उन्हें दूर करने की कोशिश में लग जाते थे.

एक बार एक लड़की बीमार हो गई. उसने अपनी मां से कहा कि अगर मुकेश उन्हें कोई गाना गाकर सुनाएं तो वह ठीक हो सकती है. मां ने जवाब दिया कि मुकेश बहुत बड़े गायक हैं, भला उनके पास कहां समय है. और अगर वह आते भी हैं तो इसके लिए काफी पैसे लेंगे. तब लड़की के डॉ़क्टर ने मुकेश को उसकी बीमारी के बारे में बताया. मुकेश तुरंत लड़की से मिलने अस्पताल गए और उसके लिए गाना गाया. लड़की को खुश देखकर मुकेश ने कहा, "यह जितनी खुश है, उससे कई ज्यादा खुशी मुझे मिली है." नर्म दिल मुकेश अगर आज हमारे बीच होते, तो उनका 91वां जन्मदिन मन रहा होता.

'किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार', 'सजन रे झूठ मत बोलो', 'मेरा जूता है जापानी', 'दुनिया बनाने वाले', 'सब कुछ सीखा हमने', 'दोस्त दोस्त ना रहा' मुकेश के ऐसे सुपरहिट गाने हैं जो आज भी सबकी जबान पर हैं. ये सब गाने राज कपूर पर फिल्माए गए थे. मुकेश ने राज कपूर की इतनी फिल्मों में गाने गए कि उन्हें राज कपूर की आवाज के नाम से जाना जाने लगा. राज कपूर को जब उनकी मौत की खबर मिली तो उनके मुंह से बरबस निकल गया, "मुकेश के जाने से मेरी आवाज और आत्मा दोनों चली गई."

केएल सहगल बनने का सपना

मुकेश चंद माथुर का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में हुआ था. उनके पिता लाला जोरावर चंद माथुर इंजीनियर थे और वह चाहते थे कि मुकेश उनके नक्शे कदम पर चलें. लेकिन वह अपने जमाने के प्रसिद्ध गायक अभिनेता कुंदनलाल सहगल के प्रशंसक थे और उन्हीं की तरह गायक अभिनेता बनने का ख्वाब देखा करते थे.

मुकेश ने दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद स्कूल छोड़ दिया और दिल्ली लोक निर्माण विभाग में सहायक सर्वेयर की नौकरी कर ली, जहां उन्होंने सात महीने तक काम किया. इसी दौरान बहन की शादी में गीत गाते समय उनके दूर के रिश्तेदार मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने उनकी आवाज सुनी और प्रभावित होकर उन्हें मुंबई ले गए. उन्हें अपने साथ रखकर पंडित जगन्नाथ प्रसाद से संगीत सिखाने का भी इंतजाम कर दिया.

इसी दौरान मुकेश को एक हिन्दी फिल्म 'निर्दोष' में अभिनेता बनने का मौका मिला. 1941 की इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता-गायक के रूप में अपना पहला गीत गाया. हालांकि यह फिल्म टिकट खिड़की पर बुरी तरह से नकार दी गयी. इसके बाद मुकेश ने 'दुख सुख' और 'आदाब अर्ज' जैसी कुछ और फिल्मों में भी काम किया लेकिन पहचान बनाने में कामयाब नहीं हो सके.

दिल जलता है तो जलने दे

इसके बाद मोतीलाल मुकेश को प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास के पास लेकर गए और उनसे अनुरोध किया कि वह अपनी फिल्म में मुकेश से कोई गीत गवाएं. 1945 में प्रदर्शित फिल्म 'पहली नजर' में अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में 'दिल जलता है तो जलने दे' गीत के बाद मुकेश कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए.

मुकेश ने इस गीत को सहगल की शैली में ही गाया था. सहगल ने जब यह गीत सुना तो उन्होंने कहा, "अजीब बात है, मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी यह गीत गाया है." इसी गीत को सुनने के बाद सहगल ने मुकेश को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था.

सहगल की गायकी के अंदाज से प्रभावित रहने के कारण अपनी शुरूआती दौर की फिल्मों में मुकेश सहगल के अंदाज मे ही गीत गाया करते थे. लेकिन 1948 में नौशाद के संगीत निर्देशन में फिल्म 'अंदाज' के बाद मुकेश ने गायकी का अपना अलग अंदाज बनाया.

ये मेरा दीवानापन है

मुकेश के दिल में यह ख्वाहिश थी कि वह गायक के साथ साथ अभिनेता के रूप में भी अपनी पहचान बनाएं. बतौर अभिनेता 1953 में प्रदर्शित 'माशूका' और 1956 में 'अनुराग' की विफलता के बाद उन्होंने फिर से गाने की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया. 1958 में फिल्म 'यहूदी' के गाने 'ये मेरा दीवानापन है' की कामयाबी के बाद मुकेश को एक बार फिर से बतौर गायक अपनी पहचान मिली. इसके बाद मुकेश ने एक से बढ़कर एक गीत गाकर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया.

मुकेश ने अपने तीन दशक के सिने करियर में 200 से भी ज्यादा फिल्मों के लिए गीत गाए. उन्हें चार बार फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके अलावा 1974 में फिल्म 'रजनीगंधा' के गाने 'कई बार यू हीं देखा' के लिए मुकेश नेशनल अवार्ड से भी सम्मानित किए गए.

राजकपूर की फिल्म 'सत्यम शिवम सुंदरम' के गाने 'चंचल निर्मल शीतल' की रिकॉर्डिंग पूरी करने के बाद वह अमेरिका में एक कंसर्ट में भाग लेने के लिए चले गए, जहां 27 अगस्त 1976 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया.

आईबी/एमजे (वार्ता)

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