यूरोप में विद्रोह के सरगना रहेंगे हंगरी के ओरबान | ब्लॉग | DW | 09.04.2018
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ब्लॉग

यूरोप में विद्रोह के सरगना रहेंगे हंगरी के ओरबान

हंगरी में मतदाताओं ने अपने विवादास्पद प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान को भारी बहुमत से जिताया है. डॉयचे वेले के समीक्षक फोल्कर वागेनर का कहना है कि लोकतांत्रिक वैधता प्राप्त निरंकुश शासन का आकर्षण बढ़ सकता है.

अंगेला मैर्केल और विक्टर ओरबान में क्या समानता है? सिर्फ एक कि दोनों चौथे कार्यकाल के लिए चुने गए हैं, लेकिन मैर्केल के विपरीत ओरबान एकछत्र राज कर सकते हैं. उन्हें गठबंधन के साथियों के समर्थन की जरूरत नहीं. मैर्केल को ओरबान की स्थिति पर ईर्ष्या होगी.

असल में ओरबान की जीत अंगेला मैर्केल के लिए चिंता की वजह है. ओरबान का हंगरी 1945 के बाद यूरोप में उदारवादी सहमति को विदा कहने का मॉडल है. ये लोकतांत्रिक वैधता वाला एकदलीय शासन है, जैसा कि ओरबान खुद कहते हैं, "एक अनुदारवादी लोकतंत्र".

पूरब के स्टार नेता

ओरबानवाद एक करोड़ आबादी वाले हंगरी की सीमा से बाहर भी लोकप्रिय है. पोलैंड की सत्ताधारी पीआईएस पार्टी पूरी ताकत के साथ उसकी नकल कर रही है. चेक गणतंत्र और स्लोवाकिया भी राज्य के पुनर्गठन के मॉडल का खुलेआम समर्थन करते हैं. ये चारों देश विजेग्राद संघ में शामिल है जो यूरोपीय संघ के नेतृत्व का विरोधी है और उस पर वर्चस्व का आरोप लगाता है.

पीआईएस के नेता यारोस्लाव काचिंस्की ने 2016 में ही कहा था, "हम उनसे सीख रहे हैं." यूरोपीय संघ के अपेक्षाकृत छोटे से देश में शायद ही कोई और चुनाव हो, जिसका पूरब और पश्चिम के रिश्तों के लिए इतना व्यापक महत्व है. ओरबान ने कहा था कि "2018 बड़ी लड़ाइयों का साल होगा." अब संसदीय चुनावों में बड़ी जीत के बाद 54 वर्षीय ओरबान ब्रसेल्स के खिलाफ और हमलों के लिए तैयार हैं.

Wagener Volker Kommentarbild App

फोल्कर वागेनर

बड़ी चुनौती

यूरोपीय संघ के पुराने और नए सदस्य देशों के बीच समझ का अभाव खतरनाक है. पूरब की ओर से देखने पर वे पश्चिमी देशों के समकालीन बहुसांस्कृतिकवाद को न तो समझने को और न ही स्वीकार करने को तैयार हैं. पश्चिमी नजरिए से देखने पर ओरबान की फिदेश पार्टी और काचिंस्की की पीआईएस पार्टी दक्षिणपंथी पॉपुलिस्ट पार्टियां हैं, यूरोपीय संघ से फायदे लेने वाले कृतघ्न लोग. ये है दोनों का एक दूसरे के लिए नजरिया.

साफ है कि ओरबान यूरोपीय संघ के पूरब में विस्तार के बाद से यूरोपीय परिवार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. यूरोपीय संघ के पैमाने पर वे एकदलीय शासन के प्रणेता हैं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वे पुतिन, एर्दोवान और ट्रंप जैसे नई लोकतांत्रिक तानाशाही के समर्थक.कुल मिलाकर उस सबसे विरोधी जो दशकों से यूरोप की एकता की वजह रहा है, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति और मीडिया की स्वतंत्रता, कानून का शासन.

ओरबान की ताकत ईयू की कमजोरी

मुल्क के अंदर ओरबान का विजय अभियान सालों से इसलिए भी सफल है कि यूरोपीय संसद में कंजरवेटिव पार्टियों का धड़ा, जिसमें चांसलर मैर्केल की सीडीयू पार्टी भी शामिल है, हंगरी में शासन तंत्र के पुनर्गठन को हाथ पर हाथ धरे देखते रहे हैं. यूरोपीय पीपुल्स पार्टी और खासकर उसके सबसे बड़े धड़े जर्मनी की यूनियन पार्टियों को ओरबान की फिदेश पार्टी के सांसदों का समर्थन चाहिए, ताकि संसद में बहुमत सोशलिस्ट पार्टियों की ओर न चला जाए. वह अपने हित में फिदेश का समर्थन कर रही है. फिदेश की आलोचना उसे अविश्वसनीय बनाता है.

इसलिए ओरबान बिना किसी पार्टी कार्यक्रम के भी जीत पाए. उनका एकमात्र नारा था हंगरी बचाओ. अगर यूरोपीय संघ को अपने संकट पर काबू पाना है तो उसे समझना होगा कि पश्चिम के मुकाबले पूर्वी देशों का विकास अलग रहा है. पोलैंड, हंगरी या सर्बिया में निरंकुश नेता का समर्थन इसलिए है कि लोग इसे समाजवाद के समय से जानते हैं. नेतृत्व के इस तरीके की लोकप्रियता की एक वजह विचारधारा की वजह से राष्ट्रीय पहचान का खोना भी रहा है.

यूरोपीय संघ में पूरी तरह मिलने से पहले वतन की जरूरत आवश्यक लगती है. शरणार्थियों और खासकर मुसलमानों के विरोध की वजह परायों के साथ अनुभव की कमी है. जो म्यूनिख, कोपेनहागेन या लियोन से अलग ढंग से बड़ा हुआ है उसे पश्चिम के पॉलिटिकल करेक्टनेस के साथ समस्या होगी है. दूसरी ओर संधि होती है. हंगरी यूरोपीय संघ में शामिल हुआ है. पोलैंड भी. उसकी जिम्मेदारियां हैं, खेल के नियम कायदे पहले से पता थे. अब मध्यस्थता का समय आ गया है.

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