यूरोप एशिया का सहयोग जरूरी | दुनिया | DW | 12.11.2013
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दुनिया

यूरोप एशिया का सहयोग जरूरी

सुरक्षा से लेकर आपदा प्रबंधन और शिक्षा के क्षेत्र में एशिया और यूरोप के बीच सहयोग बढ़ाना आसेम के विदेश मंत्रियों की बैठक का मुद्दा है. 49 देशों के प्रतिनिधि बैठक के लिए दिल्ली के उपनगर गुड़गांव में जमा हुए हैं.

2007 में इस गुट से जुड़ने के बाद भारत पहली बार इतनी बड़ी बैठक की मेजबानी कर रहा है. दो दिन की बैठक के लिए 36 विदेश मंत्री और 12 उप विदेश मंत्री गुड़गांव पहुंचे हैं. 1996 में एशिया और यूरोप के देशों का यह संगठन बनाया गया जिसके 49 सदस्य हैं. कुल मिला कर दुनिया की 60 फीसदी आबादी इस संगठन के दायरे में आती है. आसेम के सदस्य देश दुनिया की जीडीपी में 52 फीसदी की हिस्सेदारी देते हैं और दुनिया के कारोबार का 68 फीसदी इन्हीं देशों में होता है.

बैठक का उद्घाटन भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने किया जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने की. जर्मन विदेश मंत्री गीडो वेस्टरवेले भी इस बैठक में शामिल होने के लिए भारत आए हैं. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने कहा कि आसेम के विदेश मंत्रियों की बैठक की अध्यक्षता कर रहे भारत की कोशिश बातचीत में नया रुख लाने और सहयोग को बड़े स्तर तक ले जाने की है. उन्होंने बताया कि खासतौर से आपदा प्रबंधन, अक्षय ऊर्जा, पानी और कचरे का प्रबंधन, क्षमता के विकास और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए कोशिश की जा रही है.

बैठक में आर्थिक वृद्धि के साथ ही टिकाऊ विकास के लिए यूरोप और एशिया की चुनौतियों के अलावा गैर पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों पर भी चर्चा हो रही है.

पांच साल पहले यूरोजोन की अर्थव्यवस्थाओं को लगे पहले झटके जब उनके लिए अब तक के सबसे लंबे समय तक चलने वाले तकलीफदेह वित्तीय और आर्थिक संकट बन गए तो यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष होसे मानुएल बारोसो ने एशियाई देशों से सहयोग की अपील की. उस वक्त संरक्षणवाद, अलगाव और आर्थिक राष्ट्रवाद की कहीं कोई गुंजाइश नहीं थी. अक्टूबर 2008 में बीजिंग में एशिया यूरोप की बैठक में बारोसो ने नेताओं से कहा, "हम या तो साथ तैर सकते हैं या साथ डूब सकते हैं." बीते सालों में आर्थिक परिद्श्य काफी बदल गया है, औद्योगिक देशों ने मजबूत वृद्धि हासिल की है जबकि मंदी के संकट में मदद करने वाले विकासशील देशों की स्थिति अब उतनी अच्छी नहीं है.

अच्छी बात यह है कि सहयोग की आवाज दोनों महादेशों में अब भी गूंज रही है. इसके लिए आसेम के आर्थिक "स्तंभ" पर मजबूती से ध्यान देना होगा और दोनों तरफ के आर्थिक विशेषज्ञों, नीति बनाने वालों और कारोबारी नेताओं की नियमित बैठकें करानी होंगी.

यूरोपीय संघ और एशियाई आसेम देशों के बीच मौजूदा कारोबार करीब 900 अरब सालाना का है. यूरोपीय कंपनियां एशिया के लिए प्रमुख निवेशक भी हैं. 2010 में यूरोपीय कंपनियों के बाहरी निवेश का सबसे बड़ा हिस्सा करीब 17.2 फीसदी एशियाई देशों में हुआ. पिछले पांच साल में एशियाई देशों निर्यात ने यूरोजोन की अर्थव्यवस्थाओं को डूबने से बचने में बड़ी मदद की है. एशियाई देश यूरोजोन की चिंता का हल अपने यहां होने की बात से बहुत अच्छी तरह वाकिफ हैं. खासतौर से यूरोपीय निर्यात की मांग यूरोप में ही घटने और विकास की नीची जाती दर को देखते हुए उन्होंने अपनी सीमा से बाहर जा कर यूरो के समर्थन में आवाज बुलंद की है. इस बीच यूरोप ने एशियाई माल के लिए अपने बाजार खोले हैं और यूरोपीय कंपनियां एशिया मे निवेश जारी रखे हुए हैं.

2012 में यूरोपीय संघ के कुल आयात में 29.8 फीसदी और कुल निर्यात में 21.4 फीसदी हिस्सा एशिया का था. चार एशियाई देश यूरोप के 10 शीर्ष कारोबारी साझीदारों में हैं. इसमें 12.5 फीसदी के साथ चीन शीर्ष पर है तो 3.4 फीसदी के साथ जापान दूसरे और 2.2 हिस्सेदारी के साथ भारत और दक्षिण कोरिया तीसरे नंबर पर हैं. इनसे बस थोड़ा सा ही पीछे है सिंगापुर जिसकी हिस्सेदारी 1.5 फीसदी है.

आर्थिक उठापटक के मौजूदा दौर में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अपनी गति में वापस लौटती दिखने लगी है तब एशिया और यूरोप के लिए मिल कर काम करना बेहद जरूरी है जिससे कि अचानक सामने आने वाली बाधाओं से बचा जा सके.

रिपोर्टः एन रंजन (पीटीआई)

संपादनः आभा मोंढे

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