यूक्रेन पर रूसी जनता पुतिन के साथ | दुनिया | DW | 10.05.2014
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दुनिया

यूक्रेन पर रूसी जनता पुतिन के साथ

दस साल से रूस के राष्ट्रपति पद पर बने हुए व्लादिमीर पुतिन का उनके देश में जलवा सिर्फ बरकरार ही नहीं है, बल्कि यूक्रेन मामले पर उनके सख्त कदमों के कारण उनके समर्थकों की तादाद में ऐतिहासिक बढ़ोत्तरी हुई है.

रूसी लोग उन्हें बुद्धिमान, अनुभवी, काबिल और स्पष्ट और आकर्षक मानते हैं. पुतिन ने राष्ट्रपति के तौर पर सफलता से दो कार्यकाल पूरे कर लिए हैं. इस दौरान रूस में आर्थिक विकास की दर धीमी हुई है और देश लगातार यूक्रेन के साथ आधिपत्य की लड़ाई में उलझा रहा है. यूक्रेन में क्रीमिया पर कब्जे और अब देश के पूर्वी हिस्से को भी हथियाने की कोशिश करने के लिए पश्चिमी देशों के गुस्से का रूस की जनता पर कोई असर होता नहीं दिखा है. हाल ही में वहां हुए जनमत संग्रह के नतीजे साफ बताते हैं कि पुतिन को यूक्रेन के संकट से सीधा फायदा पहुंचा है.

शक्तिशाली, निर्भीक नेता की छवि

रूस की लेवाडा पोलस्टर नामकी स्वतंत्र एजेंसी के अप्रैल में हुए एक सर्वे में पाया गया कि करीब 82 फीसदी लोग पुतिन के समर्थन में हैं. 2010 से लेकर यह अब तक उन्हें मिला सबसे भारी समर्थन है. मजे की बात यह भी है कि जहां ज्यादातर लोग राजनीति में उनके रुख को पसंद करते हैं, वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो 61 साल के हो चुके अपने राष्ट्रपति को शारीरिक रूप से बहुत आकर्षक मानते हैं. पिछले सालों में सरकारी टेलीविजन पर कई बार उन्हें घुड़सवारी, तैराकी और शिकार करते हुए दिखाया गया. कई बार सामने आईं पुतिन की खुली छाती वाली तस्वीरें भी रूसी लोगों को काफी पसंद आईं.

2012 में तीसरी बार रूस के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद कुछ जगहों पर उनके खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे थे. देखने में आया कि धीरे धीरे क्रेमलिन ने देश में होने वाले विरोध प्रदर्शनों को शांत करने में कामयाबी पा ली. साल 2000 से 2008 के बीच चले पुतिन के पहले दोनों कार्यकाल में आर्थिक तेजी के समय भी उनकी लोकप्रियता ने वह ऊंचाइयां नहीं छुईं, जो 2012 से अब तक के समय में यूक्रेन पर उनकी कार्यवाई ने दिलाई हैं.

पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का असर

लेवाडा सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि क्रीमिया को वापस अपने कब्जे में लेकर पुतिन ने रूसियों के मन में राष्ट्रीय गर्व की भावना को बढ़ावा दिया है. कुछ रूसियों का यह भी मानना है कि इस तरह रूस विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति के रूप में पहचान बना पाएगा.

सोवियत यूनियन के विलय के करीब दो दशक बाद भी कई रूसी मानते हैं कि यूक्रेन में रहने वाले रूसी भाषी लोगों की मदद कर देश ने सही कदम उठाया. पश्चिमी देशों ने यूक्रेन पर रूस की कार्यवाई से नाराज होकर उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाने की बात कही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रूस में धीमी होती दिख रही आर्थिक विकास दर के इस दौर में यह प्रतिबंध ज्यादा दिनों तक पुतिन की लोकप्रियता को बचा नहीं पाएंगे. क्रेमलिन में मीडिया पर भी सरकार का पूरा कब्जा होने के कारण फिलहाल तो रूस में पुतिन की किसी भी तरह की आलोचना दिखाई या सुनाई नहीं देने वाली है.

आरआर/आईबी (रॉयटर्स)

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