युवाओं और जातीय समीकरण को साधने की कोशिश में दिग्विजय | दुनिया | DW | 11.05.2019
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दुनिया

युवाओं और जातीय समीकरण को साधने की कोशिश में दिग्विजय

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में चुनाव प्रचार के बीच आवारा कुत्तों ने एक छह साल के बच्चे को मार डाला. लेकिन ऋषभ शर्मा बता रहे हैं कि वहां प्रचार में नागरिक सुविधाएं और सुरक्षा जैसे मुद्दे नहीं, बल्कि धर्म और जाति हैं.

भोपाल का एमपी नगर क्षेत्र. जोन 2 में एक छोटा सा मंच लगाया गया है. मंच पर लगे पोस्टर में भोपाल से कांग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का फोटो लगा है. ये मंच यहां के स्थानीय व्यापारियों ने दिग्विजय सिंह की नुक्कड़ सभा के लिए लगवाया है. मंच के आसपास 20-25 कांग्रेस कार्यकर्ता मौजूद हैं.

खास बात यह है कि यहां पर दिख रहे अधिकांश कांग्रेस कार्यकर्ता युवा हैं. 2013 में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने के बाद से युवा तेजी से कांग्रेस से छिटक कर भाजपा में गए हैं. लेकिन भोपाल में तस्वीर थोड़ी उलट दिखाई दे रही है. भोपाल में दिग्विजय सिंह के प्रचार की जिम्मेदारी युवाओं पर ही ज्यादा है.

धीरे-धीरे यहां भीड़ बढ़ने लगी है. एक युवा एक नोटबुक में यहां दिग्विजय सिंह का मंच पर स्वागत करने वाले लोगों की सूची बना रहा है. इनका नाम शिवेंद्र सिंह है. इन्होंने अपना परिचय युवक कांग्रेस के प्रदेश महासचिव के रूप में दिया. चुनाव के बारे में पूछने पर शिवेंद्र बताते हैं कि राजा साहब के आने से कांग्रेस का यहां मृतप्राय काडर सक्रिय हो गया है. कांग्रेस भोपाल में पिछले आठ लोकसभा चुनाव हारी है. यह सीट परंपरागत रूप से बीजेपी की सीट है लेकिन इस बार कांग्रेस मजबूती से लड़ रही है.

Indien Wahlen Shivendra Pratap Singh in Bhopal (DW/O. S. Janoti )

शिवेंद्र बीजेपी पर कई आरोप लगाते हैं

शिवेंद्र बीजेपी पर सांप्रदायिक राजनीति और लोकतंत्र विरोधी होने का आरोप लगाते हैं. वो कहते हैं कि बीजेपी सरकार में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर लोगों का भरोसा कम हुआ है. "प्रज्ञा सिंह अपने नाम के साथ साध्वी और ठाकुर दोनों लगाती हैं लेकिन साधु संन्यासी की तो कोई जाति नहीं होती. ऐसे में वो ठाकुर और साध्वी साथ कैसे हो सकती हैं."

बीजेपी द्वारा दिग्विजय सिंह को दस साल के कार्यकाल में मूलभूत इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम ना करने वाले सीएम और "मिस्टर बंटाधार" प्रचारित करने पर शिवेंद्र मानते हैं कि दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में ऐसी गलतियां तो हुई थीं लेकिन इसका एक बड़ा कारण वो 1991 में हुए उदारीकरण और भारत में उस समय हुई कंप्यूटर क्रांति को बताते हैं.

वह कहते हैं कि 1993 में दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री बनने के समय भारत ने कंप्यूटर तकनीक में बहुत निवेश किया. इस वजह से बजट के आवंटन का एक बड़ा हिस्सा उधर लगा दिया गया और मूलभूत इंफ्रास्ट्रक्चर में कमी रह गईं. हालांकि दूसरे राज्यों से इसकी तुलना करने पर शिवेंद्र कोई खास जवाब नहीं दे पाते हैं.

रेलवे स्टेशन पर ऑटो चलाने वाले महेंद्र सिंह का कहना है कि दिग्विजय के आने से पहले कांग्रेस यहां बुरी तरह हार रही थी लेकिन अब टक्कर में है. प्रज्ञा सिंह अपने नाम पर चुनाव नहीं जीत पाएंगी. अगर वो जीतेंगी तो बस मोदी के नाम पर. भोपाल के परिपेक्ष्य में उनकी कोई खास पहचान नहीं है. लेकिन लोग मोदी के नाम पर उनको वोट देंगे.

Indien BJP-Kandidatin Sadhvi Pragya in Ujjain (Imago Imaged/Hindustan Times)

प्रज्ञा सिंह की उम्मीदवारी से भोपाल सीट चर्चा में है

वोट बैंकों की राजनीति

भोपाल में सबसे बड़ा वोट बैंक मुस्लिमों का है. लगभग 19.75 लाख वोटों में से पांच लाख से भी ज्यादा मुस्लिम वोट हैं. भोपाल के स्थानीय निवासी और टैक्सी चलाने वाले रियाज खुद को कट्टर कांग्रेसी वोटर बताते हैं. उनका कहना है कि 2014 के चुनाव में भोपाल में बहुत से मुस्लिमों ने भी बीजेपी को वोट दिया था.

उनका मोहल्ला मुस्लिमों का था और उसमें घरों पर बीजेपी के झंडे भी लगे दिखते थे. लेकिन इस बार मामला एक दम अलग है. प्रज्ञा सिंह का नाम लेने से बचते हुए वो मोदी पर सिर्फ विदेश यात्राएं करने और झूठे वादे करने का आरोप लगाते हैं. भोपाल की बात करने पर कहते हैं कि बीजेपी ने ऐसा उम्मीदवार दिया है जिसे मुस्लिम अगर चाहें तो भी वोट नहीं कर सकते. इस बार भोपाल के मुस्लिमों का एकमुश्त वोट कांग्रेस को मिलेगा.

शायद यही वजह है दिग्विजय सिंह भी अपनी पूरी बिसात हिन्दू-मुस्लिम पर ना रख युवाओं और जातियों पर बिछा रहे हैं. पांच लाख मुस्लिम, साढ़े तीन लाख ब्राह्मण, साढ़े चार लाख ओबीसी, दो लाख कायस्थ और सवा लाख के करीब क्षत्रिय वोट वाले भोपाल में दिग्विजय मुस्लिम समुदाय से दूरी बनाए हुए हैं. मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों भोपाल उत्तर और भोपाल मध्य पर प्रचार की पूरी जिम्मेदारी वहां के विधायकों आरिफ अकील और आरिफ मसूद पर ही है.

दिग्विजय इस चुनाव में पूरी तरह हिन्दू राह पर चलने की कोशिश में हैं. ब्राह्मणों के बीजेपी छोड़ कांग्रेस का साथ देने की उम्मीदें कम हैं लेकिन दिग्विजय कायस्थ वोट पर नजर लगाए बैठे हैं. वो भोपाल के सांसद और इसी समाज से आने वाले अलोक संजर की जगह प्रज्ञा सिंह को टिकट दिए जाने को कायस्थों के बीच रख रहे हैं.

उनके तमाम कार्यक्रमों में जाकर वोट मांग रहे हैं. क्षत्रियों से भी उन्हें समर्थन की उम्मीद है. राजपूतों से ताल्लुक रखने वाली करणी सेना के कार्यकर्ता यहां दिग्विजय सिंह का प्रचार करने के लिए आए हैं. दिग्विजय के साथ साधु-संतों की भी एक जमात चल रही है जो उन्हें हिन्दू विरोधी बताने वाले तर्कों को छोटा करने की कोशिश है.

मीडिया से दूरी

दिग्विजय किसी भी विवाद से बचने के लिए मीडिया से दूरी बनाए हुए हैं. एक छोटी नुक्कड़ सभा के मंच पर दस बजते ही वो माइक का इस्तेमाल बंद कर बिना माइक के भाषण देने लगते हैं जिससे आचार संहिता के उल्लंघन का भी विवाद ना हो. प्रज्ञा सिंह के ऊपर वो एक शब्द नहीं बोलते. अपने साथ 'भोपाल विजन' डॉक्यूमेंट लेकर चल रहे हैं और पूरी बात उसी पर कर रहे हैं. उनके बेटे जयवर्धन सिंह और पत्नी अमृता भी अलग-अलग प्रचार में जुटे हैं.

दिग्विजय की पत्नी अमृता इस चुनाव में खास भूमिका निभा रही हैं. वही तय कर रही हैं कि दिग्विजय सिंह किस पत्रकार से बात करेंगे और क्या बात करेंगे. वो किसी भी बयान को दिग्विजय के खिलाफ नहीं जाने देना चाहती. खुद महिलाओं के बीच जाकर प्रचार कर रही हैं. कमलनाथ सरकार में मंत्री दिग्विजय के बेटे की युवाओं के बीच पकड़ है.

वो बहुत सौम्यता से व्यवहार करते हैं. ऐसे में लोगों के बीच जल्दी घुल मिल पा रहे हैं. दिग्विजय सिंह के अंदर भी आज से पांच साल पहले दिखाई देने वाला घमंड अब कम दिख रहा है. वो बस हाथ जोड़े खड़े वोट की अपील करते नजर आ रहे हैं. पिछली बार बीजेपी यहां से करीब साढ़े तीन लाख वोट से जीती थी लेकिन इस बार पार्टी दिग्विजय सिंह और प्रज्ञा सिंह के मुकाबले में फंसी हुई है.

दिग्विजय सिंह को खासकर युवाओं से उम्मीद है. इस सीट पर इस बार बंपर वोटिंग की उम्मीद है. मालेगांव बम धमाकों के आरोप में नौ साल जेल में रही प्रत्रा ठाकुर को उम्मीदवार बनाकर बीजेपी ने इस चुनाव क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय महत्व का बना दिया है. भोपाल की सीट विचारधाराओं की लड़ाई की सीट बन गई है. ज्यादा वोटिंग का फायदा प्रज्ञा सिंह और बीजेपी को मिल सकता है. लेकिन दिग्विजय सिंह भी धर्म के साथ साथ जातीय समीकरणों के सहारे भोपाल के भंवर से अपनी नैया पार करने की कोशिश में हैं.

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