युद्ध से जुड़े शोध पर सवाल | दुनिया | DW | 26.11.2013
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दुनिया

युद्ध से जुड़े शोध पर सवाल

बमों और टैंकों पर शोध कौन करता है.इस सवाल का जवाब ढूंढने निकले पत्रकार तब हैरान हुए जब उन्हें पता चला कि विश्वविद्यालय इन खास विषयों पर अपना ज्ञान बढ़ा और बांट रहे हैं.

रेगिस्तान पर रहने वाली टिड्डी कोई साधारण कीड़ा नहीं है. उसकी आंखों की एक खासियत है, यह रात के घने अंधेरे या चिलचिलाती धूप में भी अपना रास्ता ढूंढ लेती हैं. रास्ता भले ही हजारों किलोमीटर लंबी हो, लेकिन टिड्डी की मदद तारे और चांद की रोशनी करते हैं. भविष्य में हवाई जहाजों में भी इस तरह की तकनीक लगाई जा सके, मार्बुर्ग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं.

"यह शोध काफी सामान्य सा लगता है लेकिन मुझे थोड़ा ताज्जुब हुआ." जर्मनी के रेडियो स्टेशन में काम कर रहे पत्रकार बेनेडिक्ट श्त्रुंज ने अपने कुछ साथियों और ज्युडडॉयचे अखबार के साथ मिलकर इस बात का पता लगाया कि जर्मन विश्वविद्यालय अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के लिए शोध का काम कर रहे हैं. अमेरिकी वायुसेना ने इस शोध के लिए 70,000 डॉलर दिए हैं. श्त्रुंज कहते हैं, "हमने जब पूछा तो विश्वविद्यालय ने कहा कि यह शुरुआती शोध है."

करीब से देखने पर पता चला कि वैज्ञानिक रेगिस्तान की टिड्डी की खासियत को ड्रोन विमान के लिए तकनीक विकसित करने में लगाना चाहते हैं. श्त्रुंज कहते हैं कि यह साफ तौर पर हथियारों के लिए शोध है और भविष्य में इसका इस्तेमाल लोगों को मारने के लिए भी हो सकता है.

22 विश्वविद्यालयों में शोध

जर्मनी में पिछले सालों में 22 विश्वविद्यालयों को अमेरिकी रक्षा मंत्रालय से आर्थिक सहयोग मिला. अमेरिका से अब तक एक करोड़ डॉलर इस काम के लिए जर्मनी आया है.

2012 में म्यूनिख के विश्वविद्यालय को चार लाख 70,000 डॉलर से ज्यादा पैसे शोध के लिए मिले. शोध में उन्होंने बमों को ज्यादा बेहतर बनाने पर काम किया. जाना माना फ्राउनहोफर इंस्टिट्यूट अमेरिकी सेना के लिए टैंकों के शीशों और बमों का अध्ययन कर चुका है. सारलांड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अमेरिकी रक्षा मंत्रालय से जनवरी 2012 में एक लाख डॉलर से ज्यादा पैसे लिए और भाषा को लेकर शोध किया.

जर्मन संसद में वामपंथी दलों की प्रवक्ता निकोल गोल्के कहती हैं कि विश्वविद्यालयों के अपने कानून में सेना के लिए शोध करने पर प्रतिबंध हैं लेकिन वह खुद नहीं मानते कि उन्होंने कानून का उल्लंघन किया है. ब्रेमन विश्वविद्यालय का मानना है कि अमेरिका के साथ सैटेलाइट पर उनका शोध असैन्य तकनीक के भी काम आ सकता है. ज्यादातर विश्वविद्यालय इस तरह का रवैया अपनाकर सेना के साथ अपने काम को नैतिक रूप से सही साबित करने की कोशिश करते हैं.

पारदर्शिता की जरूरत

जर्मन विश्वविद्यालयों के अध्यक्षों के प्रतिनिधि हॉर्स्ट हिपलर कहते हैं कि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के साथ जर्मन विश्वविद्यालयों के शोध पर रोक लगाने के पीछे कोई ठोस वजह नहीं हो सकती, खास तौर से इसलिए क्योंकि अमेरिका जर्मनी का करीबी साझेदार है.

लेकिन भौतिकशास्त्री युर्गेन आल्टमान इस तरह के मामलों को लेकर चिंतित हैं, "परेशानी तो उसी वक्त शुरू हो जाती है जब विज्ञान युद्ध के लिए शोध करता है. खास परेशानी तब आती जब आप अमेरिकी सेना के लिए शोध करते हैं. क्योंकि अमेरिका आक्रामक कार्रवाई करता है वह भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी के बगैर."

पत्रकार श्त्रुंज की खोज से पता चला कि जर्मनी के ज्यादातर विश्वविद्यालय इस तरह के शोध का प्रचार नहीं करना चाहते. पत्रकारों को जानकारी अमेरिका के एक डेटाबेस में मिली. जर्मन राजनीतिज्ञ इस खुलासे को लेकर चिंतित हैं, लेकिन जर्मन सेना खुद भी विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर शोध करती आई है. जर्मन रक्षा मंत्रालय के मुताबिक पिछले तीन सालों में हर साल करीब दस लाख यूरो विश्वविद्यालयों को दिया गया. पत्रकार जर्मन सरकार की तरफ से भी और पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं.

रिपोर्टः नील्स नाउमान/एमजी

संपादनः एन रंजन

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