याद आएंगे यादव जी | मनोरंजन | DW | 03.07.2010
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मनोरंजन

याद आएंगे यादव जी

डॉयचे वेले हिंदी सेवा के सबसे वरिष्ठ पत्रकार राम यादव रिटायर हुए. डॉयचे वेले के साथ अपने तीन दशकों से ज्यादा के अनुभव के बारें में उनकी कई खट्टी मीठी यादें रही हैं. उन यादों में श्रोताओं के साथ विज्ञान और इतिहास भी है.

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राम यादव

अनवर : डॉयचे वेले हिंदी की जब बात होती है, तो लोग सीधे तौर पर उसे आपसे जोड़ते हैं. तो इस बारे में आप क्या सोचते हैं, क्या महसूस करते हैं.

राम यादव : मुझे नहीं पता कि ऐसा है. लेकिन अगर आप ऐसा कह रहे हैं तो कोई वजह होगी. मेरे लिए यह निजी तौर पर संतोष की बात है. अगर लोग मुझे डॉयचे वेले से जोड़कर देखते हैं, उसकी परिचय आवाज के तौर पर देखते हैं. अब भी मुझे ऐसा महसूस करने में कठिनाई होती है, क्योंकि डॉयचे वेले तो एक बड़ी संस्था हैं. मैं भी डॉयचे वेले के मुकाबले कहीं एक छोटी चीज़ हूं. हां लेकिन अगर श्रोता अगर ऐसा कहते हैं तो यह मेरे लिए खुशी की बात है.

अनवर : यादव जी, आप हमेशा हमारा मार्गदर्शन करते रहे हैं. लेकिन अब आपने काम को अलविदा कहने का फैसला किया है. यादव जी हमें लगता है कि आप भी हमारे बिना तो नहीं रह पाएंगे.

राम यादव : बिल्कुल सही. डॉयचे वेले से मेरा कम से कम 30 साल का साथ रहा है. इससे पहले भी मैं 10 साल तक रेडियो से जुड़ा रहा हूं. कुल मिलाकर मेरे 40 साल ऐसे बीते हैं. मेरे जीवन का सबसे ज्यादा समय डॉयचे वेले के साथ बीता है. आठ साल में पूर्वी जर्मनी में रहा. एक विदेशी होने के नाते मैंने हजारों बार दीवार पार की होगी. ऐतिहासिक अनुभव रहे, कुछ खट्टे और कुछ मीठे.

अनवर : यादव जी, इतने साल तक डॉयचे वेले. अब एक दूसरी दिनचर्या. अब इसका अचानक रुक जाना.

राम यादव : हां. दिनचर्या तो बदल जाएगी. मैं भी नहीं जानता कि इसके बाद मेरे दिन, मेरी दिनचर्या क्या होगी. अभी तक तो यह था कि सुबह छह बजे उठ जाता था. तैयार होता था ताकि नौ, सवा नौ बजे तक ऑफिस पहुंच जाऊं. अब सोचता हूं कि थोड़ा ज्यादा सोऊंगा, आराम करूंगा. वो सारे लेख, किताबें और पत्रिकाएं जो मैंने जमा की थी, उन्हें पढ़ूंगा. अभी तक मैं उन्हें पढ़ नहीं पाया हूं. यात्राएं करने का मुझे इतना शौक नहीं रहा क्योंकि दुनिया मूल रूप से एक ही है. किसी कोने में चले जाइए, इंसान का रंग, बोली या अन्य चीजें बदल जाती हैं पर इंसान एक ही रहता है.

Deutschland Deutsche Welle Funkhaus in Bonn

अनवर : आपने सुभाष चंद्र बोस के ऊपर एक सीरीज तैयार की थी, जिसे काफी पसंद किया गया. उसका विचार आपको कैसे आया.

राम यादव : विचार तो इसलिए आया था क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध को समाप्त हुए 60 साल हो रहे थे. और हम बताना चाहते थे भारत के श्रोताओं को कि भारत की दृष्टि से द्वितीय विश्वयुद्ध का कितना बड़ा महत्व था. पहली बात, भारत के लाखों सैनिकों ने द्वितीय विश्वयुद्ध लड़ा. हजारों बंदी हुए थे. उन्हीं हजारों बंदियों के बीच से सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी में रहते हुए 1941-1943 के बीच में आजाद हिंद फौज का गठन किया है.

इसमें मैंने 1977 में हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका धर्मयुग के लिए कवर स्टोरी लिखी थी. हां व्यक्तिगत रूप से मैं सुभाष चंद्र बोस के निजी जीवन और व्यक्तित्व से प्रभावित रहा हूं. इस बारे में कार्यक्रम तैयार करने के दौरान मैंने काफी खोजबीन की और पाया कि हिटलर और सुभाष चंद्र बोस के बीच कोई दोस्ती नामकी चीज कतई नहीं थी.

अनवर : यादव जी साइंस की जो पत्रिका रही, आपने उस पर हजारों कार्यक्रम किए. लेकिन कुछ ऐसे खास कार्यक्रम होंगे जो आपको लगा होगा कि ये बढ़िया था.

राम यादव : हां, इस वक्त मुझे अचानक दो चीजें याद आ रही हैं. आदमी के जब चांद पर कदम पड़े तब तो मैं भारत में था. हां लेकिन जब आदमी का बनाया हुआ यान जब पहली बार मंगल ग्रह और टाइटन पर पहुंचा तो मैं यहां से कार्यक्रम कर रहा था. वह बहुत रोमांचक क्षण थे. मैं कार्यक्रम कर रहा था. वो आदमी जो पृथ्वी पर सिर्फ पांच-छह फुट का दो हाथ, दो पैर वाला जीव है वह कितनी अरबों किलोमीटर की यात्रा के बाद कहां कहां पहुंचने लगा है. आज उसके यान पहुंचे हैं, कल परसों उसके पांव वहां पड़ेंगे. एक और चीज जिससे मुझे झटका, जिसकी मैंने तुरंत आलोचना भी की और अब लग रहा है कि वह सही थी वो विषय था 10 साल पहले मानवीय जीनोम का विकोडिकरण.

उसे पड़ लेना या समझ लेना, अमेरिका के एक वैज्ञानिक क्रेग वेंटर ने यह दावा किया. तब उसे भारत समेत दुनिया भर में बहुत उछाला गया कि अब हमारी सारी बीमारियां दूर हो जाएंगी. हर चीज का रहस्य मालूम चल जाएगा. हो सकता है कि हम अमर भी हो जाएं. 10 साल बाद का अनुभव यही है कि उस खोज से मानवता को अब तक मुश्किल से एक या दो फीसदी फायदा ही हुआ है, अधिक कुछ नहीं मिला है.

अनवर : अच्छी चीजें हमेशा आदमी के साथ लगी रहती हैं लेकिन कहीं पर यह भी लगा कि ये एक ऐसा पड़ाव था या ये अगर न होता.

राम यादव : नहीं, ऐसा मुझे कभी नहीं लगा. हां एक चीज का दुख मुझे कुछ वर्षों से हो रहा है. लेकिन उसका संबंध डॉयचे वेले से उतना नहीं है, जितना पत्रकार जगत या मीडिया से है. हम समझते थे कि पत्रकार ऐसे लोग होते हैं जो बड़े ईमानदार हैं.

बेबाक ढंग से तटस्थ होकर, निरपेक्ष होकर सिर्फ तथ्यों को सामने लाते हैं. जनता को जगाते हैं, सूचित करते हैं आदि. मैं इस बीच पाता हूं कि मी़डिया और पत्रकार इस समय सबसे अविश्वसनीय लोग हैं. सबसे अधिक झूठ फैलाते हैं. खासकर जब मैं भारत को देखता हूं तो मुझे बहुत दुख होता है. मैं पूछता हूं कि इससे हमें कौन सा ज्ञान मिल रहा है.

अनवर : मैं अपनी भी एक बात करता हूं. जिस दिन मैंने यहां पहली बार लाइव प्रसारण किया था उस दिन पाकिस्तान में बड़े धमाके हुए थे और मैं कई तकनीकी चीजों को समझ नहीं पाया था. ये भी मुझे याद है कि आप हमारे साथ स्टूडियो में थे. मैंने उस दिन से एक चीज जानी कि आपके अंदर चीजों को संभालने की एक शक्ति है.

राम यादव : मैं अपने आपको ऐसा नहीं देखता. लेकिन अगर ऐसा है तो यह मेरे चरित्र या स्वभाव में होगा. मैंने हमेशा निजी जीवन में एक बात मानी है कि हो सके तो किनारे से दूर बीच धार में रहें. उसके भी अपने खतरें हैं लेकिन बीच धार के जरिए आप अपने गंतव्य तक सबसे आसानी से पहुंच सकते हैं.

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