यहां, वहां, हर जगह मैर्केल ही मैर्केल | ब्लॉग | DW | 13.02.2015
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ब्लॉग

यहां, वहां, हर जगह मैर्केल ही मैर्केल

मिंस्क, वॉशिंगटन, ओटावा, बर्लिन, म्यूनिख, ब्रसेल्स, मॉस्को. एक हफ्ते में मैर्केल इन सब जगहों में दिखीं. मामला आतंरिक राजनीति का हो, यूरोप की अर्थव्यवस्था का या फिर सेना का, हर जगह मैर्केल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.

घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मंच पर मैर्केल महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, अक्सर निर्णायक भूमिका भी. कभी यूक्रेन और रूस के बीच अघोषित युद्ध पर चर्चा, तो कभी यूरोजोन में चल रहे संकट पर और कभी जर्मनी के इस्लामीकरण के खिलाफ सड़कों पर नारे लगाते हजारों लोगों पर. कोई कुछ भी कहें, पर मैर्केल के धैर्य और कूटनीति ने सब जगह सकारात्मक नतीजे दिखाए हैं. कीव और मॉस्को में, ब्रसेल्स और बर्लिन में, वॉशिंगटन और मिंस्क में भी. फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद के सहयोग से वे यूक्रेन संकट को और बढ़ने से रोकने में सफल हो पाई हैं.

Kommentarfoto Marcel Fürstenau Hauptstadtstudio

डॉयचे वेले के मार्सेल फुर्सटेनाऊ

पोस्टर बॉय पुतिन बनाम मां मैर्केल

मैर्केल बहुत आसानी से अपना आपा नहीं खोती हैं, वे काफी शांत स्वभाव की हैं. शायद साम्यवादी पूर्वी जर्मनी की तानाशाही में बिताए जीवन ने उनमें यह धैर्य डाला है. स्कूल में रूसी भाषा सीखना अनिवार्य था. और आज उनके लिए बचपन में सीखी यह भाषा वरदान साबित हो रही है. मैर्केल पुतिन से शांति और युद्ध की हर बात उन्हीं की मातृभाषा में कर पाती हैं. वहीं पुतिन भी बर्लिन में समय बिता चुके हैं और जर्मन भाषा का उनका ज्ञान भी दोनों नेताओं के लिए फायदेमंद है.

यानि रणनीतियां भले ही अलग हों, लेकिन इंसानियत के स्तर पर कुछ बातें ऐसी हैं जो इन नेताओं को एक दूसरे से जोड़ती हैं. हालांकि उनके मतभेदों पर ही सबका ध्यान पहले जाता है. पुतिन रूस में खुद को एक पोस्टर बॉय के रूप में प्रस्तुत करना पसंद करते हैं. वहीं जर्मनी में मैर्केल को मुटी यानि मां के नाम से पुकारा जाने लगा है. और सही भी है क्योंकि उनका राजनीतिक अंदाज मां की परवरिश जैसा ही तो है. वे सुनती हैं, सोचती हैं और फिर बात करती हैं. इसके लिए कभी उनकी तारीफ होती है तो कभी आलोचना.

दुनिया की सबसे ताकतवर महिला

लेकिन मैर्केल साफ साफ फैसले लेना जानती हैं. यूक्रेन और रूस के बीच खूनखराबे को रोकने के उनके कदम इसका उदाहरण हैं. आर्थिक प्रतिबंधों के लिए हां और सैन्य मदद के लिए ना. ऐसा करके वे अपने सबसे मजबूत दोस्त अमेरिका को नाराज करने से भी नहीं डर रहीं. अमेरिका को इसे स्वीकारना ही होगा. दुनिया की सबसे ताकतवर महिला के लिए यूक्रेन को हथियार मुहैया कराने की अमेरिका की मांग नागवारा है. बात जब जिंदगी और मौत की होती है, तो मैर्केल अपना रुख नहीं बदलतीं. इसके लिए लोग उनका सम्मान करते हैं, उन्हें मानते हैं और उनके शुक्रगुजार हैं.

फिलहाल दुनिया में शांति का माहौल स्थापित करना मैर्केल की सूची में सबसे ऊपर है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके लिए उनकी जरूरत है और जिसके लिए उनकी सराहना की जाती है. लेकिन इसका नतीजा यह है कि मैर्केल के रडार से कुछ मुद्दे छूट रहे हैं. दुनिया में फैली आग को बुझाने के लिए मैर्केल की जरूरत अब पहले से भी ज्यादा है. पर ऐसे में उन्हें अन्य समस्याओं पर ध्यान देने का समय नहीं मिल पा रहा.

अपने देश में कमजोर छवि

परेशान करने वाली बात यह है कि जहां यूरोप में मैर्केल एक महत्वपूर्ण नेता के रूप में नजर आती हैं, वहीं अपने देश में उनकी छवि कमजोर पड़ रही है. इसके दो उदाहरण हैं. एक, देश में परमाणु ऊर्जा को खत्म करना और दूसरा, न्यूनतम वेतन की सीमा तय करना. इन दोनों ही मामलों में मैर्केल ने पूरी तरह यूटर्न ले लिया. पहले तो फुकुशिमा हादसे के बाद जनता के दबाव में आ कर उन्होंने परमाणु संयंत्र बंद करने का फैसला लिया और फिर गठबंधन बनाने के लिए एसपीडी पार्टी की इस मांग को स्वीकार कर लिया.

राजनीति करने के उनके इस रवैये से उनकी पार्टी सीडीयू को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है. इससे जो खालीपन उभर रहा है, उसे जनवादी प्रवृत्तियां भर रही हैं. कहीं यूरो मुद्रा का विरोध करने वाली एएफडी यानि ऑल्टरनेटिव फॉर जर्मनी पार्टी है, तो कहीं इस्लाम विरोधी पेगीडा आंदोलन. चांसलर को देश में अपनी और अपनी पार्टी की छवि मजबूत बनाने की ओर काम करना होगा. मैर्केल के लिए अब जरूरी है कि अपनी अंतरराष्ट्रीय राजदूत वाली छवि पर ध्यान दें, उससे सीख लें और घरेलू राजनीति में उसका इस्तेमाल करें. शायद इसी से उन्हें देश के नेता के तौर पर भी फायदा मिल सके.

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