यमन में क्या सऊदी अरब और यूएई एक दूसरे से लड़ेंगे | दुनिया | DW | 09.08.2019
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

यमन में क्या सऊदी अरब और यूएई एक दूसरे से लड़ेंगे

गृहयुद्ध में फंसे यमन की लड़ाई में एक और मोर्चा खुलने की आशंका उठ गई है. अब तक गठबंधन में शामिल हो कर हूथी विद्रोहियों का सामना कर रहे सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात समर्थित गुट अब आमने सामने आ रहे हैं.

हूथी विद्रोहियों से लड़ रहे सऊदी अरब के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना में संयुक्त अरब अमीरात के सैनिक बड़ी संख्या में हैं लेकिन अब उसने अपने सैनिकों की वापसी शुरू कर दी है. समस्या इतनी भर नहीं है, यूएई समर्थित गुट यमन की सरकार के सामने चुनौती पेश कर रहा है.

यमन में संघर्षरत सरकार के गृह मंत्री ने दक्षिणी अलगाववादी नेता पर "बगावत भड़काने" का आरोप लगाया है. ये अलगाववादी ताकतें यमन की सेना से अदन में राष्ट्रपति के महल के पास लड़ रही है. इसके साथ ही यह चिंता भी पैदा हो गई है कि क्या पहले से ही गृहयुद्ध झेल रहे यमन में एक नया मोर्चा खुलने जा रहा है.

गृह मंत्री अहमद अल माइसारी ने अलगाववादी नेता हानी बेन ब्राइक के समर्थकों से कहा है कि वे सरकार को उखाड़ने की उनकी मांग अनसुनी कर दें. माइसारी का कहना है कि ब्राइक का लक्ष्य केवल युद्ध का खतरा पैदा करना और हूथी विद्रोहियों के खिलाफ चल रही लड़ाई को कमजोर करना है.

बीते कई साल से यमन गृहयुद्ध में घिरा है. यहां सऊदी अरब के नेतृत्व में एक गठबंधन सेना ईरान समर्थित हूथी विद्रोहियों से 2015 से ही लड़ रही है. यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता वाली सरकार तो अब बस अदन के कुछ इलाकों में ही सिमट गई है. अब तक इस लड़ाई में 10 हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और देश एक एक तरह से भुखमरी के मुहाने पर पहुंच गया है.

यमन देश के उत्तरी हिस्से और दक्षिणी हिस्से में रहने वालों के बीच बहुत पहले से तनाव रहा है. उत्तर के लोग हूथी विद्रोहियों के आगे बढ़ने पर दक्षिण की तरफ भाग गए. दक्षिण वालों के पास कभी अपना खुद का राज्य था और वो ज्यादा स्वायत्तता या फिर सीधे आजादी चाहते हैं.

अंतरराष्ट्रीय गठबंधन में संयुक्त अरब अमीरात भी प्रमुख सदस्य है लेकिन वह मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ यमन की सरकार के संबंधों के चलते नाखुश है. मुस्लिम ब्रदरहुड को सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात एक आतंकवादी गुट के रूप में देखते हैं. ऐसे में संयुक्त अरब अमीरात अब उन अलगाववादी गुटों को समर्थन दे रहा है जो सरकारी सेना से लड़ रहे हैं.

बुधवार को संयुक्त अरब अमीरात समर्थित मिलीशिया के एक कमांडर के अंतिम संस्कार के दौरान इस विभाजन की छाया साफ देखने को मिली. कमांडर को दफनाए जाने के बाद उनके समर्थकों ने राष्ट्रपति के महल तक मार्च किया और वहां मौजूद सैनिकों से भिड़ गए. इस झड़प में राष्ट्रपति के एक गार्ड की मौत हो और दो आम लोगों समेत कम से कम चार लोग घायल हो गए.

गुरुवार को सरकार समर्थित सेना और यूएई समर्थित सिक्योरिटी बेल्ट फोर्स के बीच संघर्ष जारी रहा और अदन के खोरमाकसर इलाके में कम से कम पांच लोगों की मौत हो गई. एक सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि इसमें तीन लोग राष्ट्रपति के गार्ड थे. इसके अलावा दो लोग घायल हुए इनमें एक बच्चा भी है. इस अधिकारी का कहना है कि सेंट्रल बैंक की इमारत के बाहर तैनात राष्ट्रपति के गार्डों ने हथियारबंद लोगों पर फायरिंग की जिन्हें अलगाववादी बताया जा रहा है. इस अधिकारी ने अपना नाम बताने से मना कर दिया.

कथित सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल के उप प्रमुख बेन ब्राइक ने सरकार को उखाड़ फेंकने की मांग की है. उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया है कि यह देश की कीमत पर ब्रदरहुड के हितों का ध्यान रख रही है.

उधर गृह मंत्री अल माइसारी का कहना है कि उन्हें सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की तरफ से भरोसा मिला है कि वे अलगाववादियों की इस तरह की गतिविधियों के खिलाफ है. सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रवक्ता तुर्की अल मलिकी ने बुधवार को अदन में "हो रही गंभीर घटनाओं को सिरे से खारिज" किया इसके साथ ही उन्होंने सभी पक्षों से मांग की कि वो सरकार के साथ मिल कर "इस कठिन समय से बाहर आने" में मदद करें.

संयुक्त अरब अमीरात ने पिछले महीने ही हजारों की संख्या में अपने सैनिकों को यमन से बाहर निकालना शुरू कर दिया इससे हूथी विद्रोहियों के खिलाफ लड़ रहे गठबंधन की ताकत कम होगी. इस वजह से इन सऊदी अरब और यूएई के बीच विवाद के बढ़ने की आशंका पैदा हो गयी है.

हालांकि यूएई के करीब 90 हजार सैनिक उस गठबंधन में बने रहेंगे जिनका दक्षिणी हिस्से पर नियंत्रण है. ऐसे में उसका इलाके में असर बना रहेगा और साथ ही सऊदी अरब समर्थित सरकार के लिए खतरा भी.

सऊदी अरब ने सैनिकों की वापसी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन अलगाववादियों के खिलाफ ज्यादा सख्त रुख अपना लिया है. बुधवार की झड़पों के बाद सऊदी सैनिक और बख्तरबंद गाड़ियां राष्ट्रपति के महल के इर्दगिर्द जमा हो गई हैं ताकि हिंसा को रोका जा सके.

लंदन के थिंक टैंक चाथम हाउस में रिसर्चर फारेया अल मुस्लिमी का कहना है, "पिछले साल सऊदी अरब ने इस तरह का साफ और कड़ा रुख ट्रांजिशनल सदर्न काउंसिल की तरफ नहीं अपनाया था. इसके उलट पर्दे के पीछे रह कर स्थिति को शांत करने की कोशिश की थी. आप अगर अब सऊदी टीवी चैनलों की तरफ देखें तो वे ट्रांजिशनल काउंसिल के बारे में बिल्कुल हूथी विद्रोहियों जैसे ही बात कर रहे हैं."

एनआर/ओएसजे (एपी)

 _______________

हमसे जुड़ें: WhatsApp | Facebook | Twitter | YouTube | GooglePlay | AppStore

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन