म्यांमार में सैन्य तख्तापलट आसियान का नया सरदर्द | दुनिया | DW | 05.03.2021
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दुनिया

म्यांमार में सैन्य तख्तापलट आसियान का नया सरदर्द

म्यांमार में सैन्य तख्तापलट दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान की गले की फांस बन गया है. उसे डर है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का रोष उसके लिए भी नुकसानदेह न साबित हो.

म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद आसियान के दस देशों की आपात बैठक बुलाई गई जिसका मकसद था म्यांमार में चल रही हिंसा पर कूटनीतिक तरीके से काबू पाना और म्यांमार की सैन्य सरकार के साथ-साथ आसियान की धूमिल होती छवि को बचाना. दरअसल 1 फरवरी को सेना द्वारा अप्रत्याशित रूप से सत्ता पर कब्जा किए जाने के बाद से ही म्यांमार अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना का केंद्र बन गया है. म्यांमार में आम जनता का सेना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन लगातार जारी है तो वहीं अमेरिका और पश्चिम के कुछ देश म्यांमार की सेना तात्मादाव और सैन्य सरकार के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की कवायद में भी जुटे हैं. सैनिक शासन के खिलाफ जनता के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में, जिसे असहयोग आंदोलन की संज्ञा दी जा रही है, तीन दर्जन से भी अधिक लोगों की पुलिस और सेना की गोलीबारी में जान जा चुकी है. निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर हुई हिंसा ने विश्व समुदाय को फिर से झकझोड़ कर रख दिया है.

ऐसा लगता है जैसे म्यांमार एक बार फिर 1990 के दशक में वापस पहुंच गया है, ऐसा म्यांमार जहां सेना ऐसी सर्वोच्च शक्ति है जिसके आगे लोकतांत्रिक व्यवस्था और आम जनता की भावनाएं कोई मायने नहीं रखतीं. म्यांमार की इस दुर्दशा के पीछे आंग सान सू ची की कमजोर राजनीतिक समझ और हद से ज्यादा शराफत ने तो नुकसान किया ही है, यह भी आश्चर्य की ही बात है कि तख्तापलट की घटना के एक महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी कोई संवैधानिक प्रावधान, कोई नेता और कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था देश के आम नागरिक की मदद नहीं कर पाई है. लोकतंत्र की लड़ाई म्यांमार की जनता को पहले भी खुद ही लड़नी पड़ी थी, और इस बार भी उसे ही यह लड़ाई लड़नी पड़ रही है.

अंदरूनी मामलों में दखल न देने की नीति

जहां तक आसियान का सवाल है, तो उसकी समस्या यह है कि बरसों से इस क्षेत्रीय संगठन की यह नीति रही है कि वह किसी भी सदस्य देश के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देता. आंग सान सू ची की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) के तथाकथित लोकतांत्रिक राज में भी जब रोहिंग्या अल्पसंख्यक समुदाय और अराकान प्रदेश के तमाम लोगों पर सेना और प्रांतीय सरकार ने जम कर अत्याचार किए और लाखों लोगों को देश छोड़कर भागना पड़ा, तब भी आसियान "गैर हस्तक्षेप” की ही नीति के तहत चुप बैठा रहा. वैसे ये अलग बात है कि  संगठन के तौर पर आसियान भले ही चुप रहा हो, उसके दसों देश चुप नहीं बैठे रहे. रोहिंग्या के मुद्दे पर मलेशिया और इंडोनेशिया ने जम कर आवाज उठाई. लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला. उल्टे फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतैर्ते तो सू ची की पीठ थपथपाने के कगार तक तक पहुंच  गए थे.

ऐसा नहीं है कि आसियान को यह लगाव सिर्फ म्यांमार के साथ ही है. लगभग छः साल पहले 22 मई 2014 को जब थाईलैंड में सेना ने सेना प्रमुख प्रयुथ चान ओ-चा  के नेतृत्व में सत्ता पर कब्जा जमाया तब भी आसियान चुप था. इसी तरह के एक दर्जन मामले और गिनाए जा सकते हैं जब आसियान अपनी मौन रहने की प्रतिज्ञा पर टिका रहा. और यही कारण है कि दक्षिणपूर्व एशिया के किसी भी जानकार को इस बार भी आसियान की यह चुप्पी ना अप्रत्याशित लगी और न ही चौंकाने वाली. अपनी ताजा बैठक में भी आशा के अनुरूप आसियान ने म्यांमार के हालात पर चिंता जताई और देश में अमन और चैन कायम करने की गुहार लगाई और बैठक के बाद अपने-अपने देश में नेताओं ने म्यांमार को जम कर कोसा.

आसियान पर विश्व समुदाय का बढ़ता दबाव

इंडोनेशिया इस मामले में अभी भी बीच का और सबको मान्य रास्ता निकालने की कोशिश में लगा है. लेकिन अब आसियान पर भी अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है. दुनिया के तमाम देशों, खास तौर से अमेरिका और पश्चिम के देशों की उम्मीद है कि आसियान को कुछ कड़े कदम उठाने चाहिए. आसियान के अंदर भी म्यांमार में तख्तापलट के खिलाफ विरोध की आवाजें मुखर हो रही हैं. तो क्या आसियान के पास कोई रास्ता नहीं है? ऐसा नहीं है.

आसियान के पास रास्ते तो कई हैं. पहला तो यही है कि आसियान के देश म्यांमार की सेना और उससे जुड़ी कंपनियों के साथ व्यापार और निवेश सम्बंधी ताल्लुकात खतम कर लें. आसियान म्यांमार पर आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिबंध भी लगा सकता है. लेकिन सच्चाई यह है कि इनमें से किसी भी कदम का म्यांमार पर बहुत बड़ा असर नहीं पड़ेगा. आसियान का म्यांमार पर प्रभाव बहुत ज्यादा नहीं है और दंडात्मक कार्यवाई करने के मामले में तो यह प्रभाव न के बराबर है. हां, संयुक्त राष्ट्र संघ, आसियान और ऐसी ही दूसरी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में आसियान के देश म्यांमार को कूटनीतिक तौर पर कमजोर करने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन यह म्यांमार की सैन्य सत्ता को डिगा पाएगा ऐसा नहीं है.

म्यांमार की सेना के समर्थक

इस संदर्भ में म्यांमार की सेना का यह कथन महत्वपूर्ण है कि वह किसी भी तरह के प्रतिबंध झेलने के लिए तैयार है. सेना ने यह भी कहा कि अतीत में भी म्यांमार ने इस तरह की परिस्थितियों को झेला है और उसे बहुत कम और भरोसेमंद दोस्तों के साथ काम चलाने की आदत है. साफ है, म्यांमार की सैन्य तानाशाही को बखूबी पता है कि चीन उसका साथ नहीं छोड़ेगा. पड़ोस के थाईलैंड में जमी प्रयुथ की सरकार भी तात्मादाव का साथ देती रहेगी. दोनों सेनाओं के बीच बहुत गहरे संबंध हैं. चाहे अनचाहे भारत भी म्यांमार के ही साथ खड़ा दिखेगा यह भी लगभग तय ही है.

जो भी हो, म्यांमार में बिन बुलाए इस तख्तापलट ने आसियान को मुश्किल में तो डाल ही दिया है. हस्तक्षेप करें या नहीं, यह उलझन आसियान और उसके सदस्य देशों को आने वाले समय में काफी उलझा कर रखने वाली है. ऐसे में आसियान देश अपने व्यापारिक हितों और क्षेत्रीय एकता को वरीयता देते हैं या मानवीय मूल्यों और लोकतंत्र को, यह देखना दिलचस्प होगा.

(राहुल मिश्र मलाया विश्वविद्यालय के एशिया-यूरोप संस्थान में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं)

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