मैर्केल बिन क्या करता यूरोप | OLD - जर्मन चुनाव | DW | 21.09.2013
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OLD - जर्मन चुनाव

मैर्केल बिन क्या करता यूरोप

जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल ने पिछले चार सालों में देश को यूरो और कर्ज संकट से होकर निकाला है और इस प्रक्रिया में दोस्त गंवाए हैं. यूरोप में हर कोई उनसे प्यार नहीं करता, लेकिन उनके बदले यह चुनौती कौन लेता?

यदि यूरो विफल होता है, तो यूरोप विफल हो जाएगा और ऐसा नहीं होना चाहिए. ये शब्द अंगेला मैर्केल ने अक्टूबर 2011 में कहे थे और तब से इसे कई बार दोहरा चुकी हैं. यह संकट से निबटने की उनकी नीति के केंद्र में है. चांसलर ने पहले हिचकिचाहट के साथ मुश्किल में पड़े देशों के लिए वित्तीय मदद देने की बात मानी थी. उसके बाद उन्होंने बचाव की छतरी बनाने में मदद दी, कर्ज माफ करने का सौदा किया और अंत में यूरोपीय सेंट्रल बैंक के जरिए बॉन्ड खरीदने की बात मानी. इसके बारे में चांसलर कहती हैं, "हमारे लिए यह नया इलाका था."

चांसलर की यूरोप नीति के बारे में ब्रसेल्स के थिंक टैंक यूरोपियन पॉलिसी सेंटर के यानिस इमानुईलिडिस कहते हैं, "आज का यूरोपीय संघ पांच साल पहले के ईयू जैसा नहीं है. बहुत कुछ हुआ है क्योंकि संकट बेहद गहरा और संरचनात्मक है." वे कहते हैं कि पिछले पांच साल में जर्मन सरकार और उसके साथ चांसलर ने अहम भूमिका निभाई है.

हिचकिचाहट भरा नेतृत्व

राजनीतिशास्त्री इमानुईडिलिस का मानना है कि अंगेला मैर्केल खुद संकट से निबटने में नेतृत्व नहीं चाहती थीं, लेकिन यूरोप की आर्थिक रूप से सबसे मजबूत सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में इससे इनकार नहीं कर पाईं. इमानुईडिलिस ने कहा, "मैं नहीं समझता कि वे यह चाहती थीं, लेकिन जब परिस्थितियां पैदा हुईं तो वे इस भूमिका में चली गईं. बहुत से साथियों ने भी उनसे विनती की, जर्मनी नेतृत्व दे." ब्रिटिश साप्ताहिक इकॉनॉमिस्ट ने जर्मनी से कुछ हफ्ते पहले यहां तक मांग की कि वह यूरोपीय स्तर पर कर्ज लेने पर रोक, बजट यूनियन और बैंक यूनियन के बाद और सुधारों के लिए जोर डाले. पत्रिका ने जर्मनी को अनिच्छुक आधिपत्य वाला कहा.

संकट और उसका प्रबंधन करनेवाली ने ब्रसेल्स में सत्ता संतुलन बदल दिया है. पहले शक्तिशाली रहा यूरोपीय आयोग, जो कानूनों का प्रस्ताव देता है और उनकी निगरानी करता है, कमजोर हुआ है, क्योंकि वह बहुत धीमी गति से काम करता है और लचीला नहीं है. यूरोपीय संसद का प्रभाव कम है, क्योंकि संकटग्रस्त देशों में खस्ताहाल बैंकों की मदद के लिए पैसा सदस्य देशों के राष्ट्रीय बजट से आ रहा है. इसलिए रास्ता ईयू की मंत्री परिषद दिखा रही है, जिसमें राष्ट्रीय सरकारों का प्रतिनिधित्व है.

ब्रिटिश विदेश मंत्री विलियम हेग इसके बारे में यूं कहते हैं, "सभी यूरोपीय संस्थानों में राष्ट्रीय संसद के प्रति जवाबदेह मंत्रि परिषद ने नेतृत्व संभाला है. मामला फैसलों का है, जिसमें धन लगेगा. इसलिए लोग वैध फैसला लेने वाले के रूप में राष्ट्रीय संसदों की ओर देख रहे हैं." यूरोपीय संघ के प्रति संदेह दिखाने वाला ब्रिटेन ही नहीं, नीदरलैंड भी इस बीच निर्णायक सुधारों की मांग कर रहा है. बताया जाता है कि अंगेला मैर्केल यदि सत्ता में बनी रहती हैं तो यूरो संकट में नई नीति पर विचार कर रही हैं. वे ईयू से ताकत और जिम्मेदारी लेना चाहती हैं. चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कहा है कि वे ब्रसेल्स को और जिम्मेदारी देने की जरूरत नहीं देखतीं.

चुनाव के बाद बड़े सुधार

लंदन के "ओपन यूरोप" थिंक टैंक के प्रमुख लॉर्ड लीच वित्तीय और कर्ज संकट के बाद यूरोपीय संघ को छोटा कर चुस्त बनाने की वकालत कर रहे हैं. जनमत सर्वेक्षण दिखाते हैं कि जर्मनी में भी ईयू संस्थानों में लोगों का भरोसा कम हो रहा है. जर्मन चांसलर को इस पर प्रतिक्रिया दिखानी होगी. लॉर्ड लीच कहते हैं कि हर जर्मन चांसलर को इस पर प्रतिक्रिया करनी होगी, "तार्किक है कि बर्लिन रैडिकल सुधारों का समर्थन करे, क्योंकि अपने मतदाता इसका समर्थन कर रहे हैं. पूरे यूरोप में बहुत से मतदाता भी यही कर रहे हैं." सोशल डेमोक्रैट सांसद ऊडो बुलमन को संदेह है कि मैर्केल सुधारों की ताकत जुटा पाएंगी.

खुद अंगेला मैर्केल अपने नेतृत्व का खुलेआम डंका पीटने से बच रही हैं. जर्मनी नम्रता दिखाने की कोशिश कर रहा है, जैसे ग्रीस को बचाने के प्रयास जब उफान पर थे तब अक्टूबर 2011 की सरकारी घोषणा में मैर्केल ने कहा, "हम आर्थिक रूप से ताकतवर देश हैं, लेकिन मैं यह भी कहूंगी कि हम दुनिया का केंद्र नहीं हैं. दुनिया यूरोप और जर्मनी की ओर देख रही है. वह यह देख रही है कि क्या हम द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के सबसे गंभीर संकट में नेतृत्व लेने के लिए तैयार और सक्षम हैं." यानिस इमानुईडिलिस कहते हैं कि संकट के समय में जर्मनी और उसके नेता से काफी उम्मीदें हैं. लेकिन जर्मनी को यूरोपीय संघ में दूसरे साथियों की भी जरूरत है.

ओपन यूरोप के अनुसार 22 सितंबर के चुनावों के बाद जर्मनी की यूरोप नीति में बहुत बदलाव नहीं आएगा, भले ही अंगेला मैर्केल चांसलर रहें या न रहें. ऐसा नहीं है कि यदि मैर्केल विफल होती हैं, तो यूरो फेल हो जाएगा, यूरोप फेल हो जाएगा. वामपंथी सरकार संभवतः वित्तीय संकट का सामना कर रहे देशों के साथ दोस्ताना तरीके से पेश आएगी, लेकिन वह भी करदाताओं और मतदाताओं के धन को बचाएगी. ओपन यूरोप की राजनीतिक विश्लेषक नीना शिक कहती हैं कि सोशल डेमोक्रैट भी बचत करने के जर्मन रवैये का पालन करेंगे. आखिरकार यूरो को बचाने की नीति को डी लिंके के अलावा जर्मन संसद में सभी पार्टियों का समर्थन मिला है.

रिपोर्ट: बैर्न्ड रीगर्ट/एमजे

संपादन: निखिल रंजन

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