″मैम, हम गरीब लोग हैं, हमारी कौन परवाह करता है.″ | भारत | DW | 29.06.2020
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भारत

"मैम, हम गरीब लोग हैं, हमारी कौन परवाह करता है."

भारत में कोरोना महामारी ने बहुत से लोगों को अपने सपनों के बारे में दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया है. इन्हीं में गुरुग्राम में रहने वाली एक प्रवासी मजदूर प्रियंका भी शामिल हैं.

गुरुग्राम में रहने वाली प्रियंका कुमारी

प्रियंका का कहना है कि वह पेट भर खाना नहीं खाती हैं ताकि उनके बच्चे और पति को भूखा ना रहना पड़े

"मैम, हम गरीब लोग हैं, हमारी कौन परवाह करता है." यह कहना है प्रियंका कुमारी का, जो गुरुग्राम में एक कमरे वाली छोटी सी झुग्गी में रहती है. मैंने आसपास नजर दौड़ाई तो मुझे कोने में एक अवन दिखा, एक अल्मारी और कुछ देवी देवताओं की तस्वीरें.

मई के मध्य में मेरी उनसे मुलाकात हुई, देश व्यापी लॉकडाउन लागू होने के करीब दो महीने बाद. वह चाहती हैं कि "कोरोना वायरस जल्दी से खत्म हो जाए". जब मैंने उनसे पूछा कि कोरोना वायरस क्या है, तो प्रियंका ने कहा, "ज्यादा कुछ नहीं पता है. हर कोई मास्क पहन रहा है तो मैं भी पहन रही हूं."

प्रियंका की उम्र 19 साल है और वह बिहार के सारण जिले से गुरुग्राम में अच्छी जिंदगी का सपना लेकर पहुंची थीं. 17 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई. एक बच्चा है. इसी साल जनवरी में वह अपने पति के पास गुरुग्राम आई थीं.

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अपने बेटे आर्यन को खिलाते हुए प्रियंका कहती हैं, "इस झुग्गी से बाहर निकलना है. अगर महामारी नहीं हुई होती तो हम बड़े घर में चले गए होते. यहां नहीं रहना है, क्योंकि यहां बहुत कचरा है."

उनका घर बिल्कुल साफ सुथरा दिखता है. सफाई को लेकर उनकी धुन खास तौर से कोरोना महामारी के बाद बढ़ गई है. वह कहती हैं, "मैं अपने घर में आने से पहले लोगों से हाथ सैनिटाइज करने को कहती हूं. मैं अपने बच्चों को बाकी बच्चों के साथ नहीं खेलने देती हूं, क्योंकि मुझे उसके स्वास्थ्य की चिंता है."

जीवन का संर्घष

मार्च में भारत सरकार ने देशव्यापी लॉकडाउन लगाया, जिससे करोड़ों लोगों का रोजगार ठप हो गया. विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती है कि भारत में लॉकडाउन की वजह से चार करोड़ प्रवासी कामगारों का रोजगार प्रभावित हुआ है.

घरों में काम करने वाले लोगों की मदद करने वाली घरेलू कामगार यूनियन की सदस्य और श्रम इतिहासकार माया जॉन कहती हैं, "लॉकडाउन ने प्रवासी महिलाओं को पाई पाई के लिए मोहताज कर दिया है. उन्हें हमेशा गर्व था कि वे मेहनतकश तबके से ताल्लुक रखती हैं. लेकिन अब वो कहां जाएं. लॉकडाउन की वजह से झुग्गियों में रहने वाले लोगों को पानी जैसी जरूरी चीजों के लिए भी तरसना पड़ रहा है."

सरकार ऐसे लोगों के लिए शेल्टर कैंप बनाने, मुफ्त राशन देने और कैश ट्रांसफर करने का दावा करती है लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही है.

प्रियंका के लिए लॉकडाउन शुरू होने के बाद से अपने परिवार का पेट भरना मुश्किल हो रहा है. राशन की स्थानीय दुकान से उन्हें वापस लौटा दिया गया क्योंकि उनके पास बिहार का राशन कार्ड है. उन्होंने बताया कि जिस कम्युनिटी सेंटर को लोगों को पका हुआ खाने बांटने की जिम्मेदारी दी गई थी वह अप्रैल से बंद पड़ा है.

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बिहार और ओडिशा से आई दो अन्य प्रवासी मजदूर महिलाओं कैशाल और रीता ने भी प्रियंका की बात पर मुहर लगाई. वे मुझे स्थानीय कम्युनिटी सेंटर ले गईं, जो खाली पड़ा था. वहां कुछ संपन्न लोग थे जो अपने कुत्तों के साथ टहल रहे थे.

फ्री राशन, अब नहीं

राशन बांटने के लिए जिम्मेदारी एक अधिकारी ने बताया कि जब एक ही परिवार के लोग फ्री राशन का फायदा उठाने की कोशिश करने लगे तो कम्युनिटी सेंटर को बंद कर दिया गया. उनका कहना है, "मैम, ये गरीब लोग ऐसे ही होते हैं."

उसने बताया कि हरियाणा सरकार ने एक जून से गरीबों को फ्री राशन देने पर रोक लगा दी है क्योंकि लॉकडाउन से प्रभावित ज्यादातर लोगों ने फिर से काम शुरू कर दिया है और अब उन्हें "फ्री का खाना" देने की कोई जरूरत नहीं है.

हाल के दिनों में प्रियंका का वजन तेजी से घटा है. वह कहती हैं, "मैं पर्याप्त खाना नहीं खा रही हूं क्योंकि हमारे पास सीमित खाना ही है. मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा और पति भूखे रहें."

गुरुग्राम में रहने वाले प्रवासी कामगार कमलेश

कमलेश एक फर्नीचर शोरूम पर काम करते हैं

प्रियंका के पति कमलेश फर्नीचर की एक दुकान पर सेल्समैन है. लेकिन लॉकडाउन की वजह से बेरोजगार हो गए. मई में वह वापस काम पर लौट गए. लेकिन शोरूम ने उनकी सैलरी 14 हजार से घटाकर सात हजार कर दी क्योंकि वहां बिक्री नहीं हो रही है.

जून की सैलरी तो उन्हें अब तक नहीं मिली है. लेकिन उन्हें भरोसा है कि हालात अच्छे होंगे. वह कहते हैं, "चीजें खुल रही हैं और जल्द ही सब ठीक हो जाएगा." लेकिन प्रियंका कहती हैं, "लेकिन अगर लॉकडाउन जारी रहा तो हम अपने गांव वापस चले जाएंगे."

कमलेश ने अपने परिवार के सदस्यों से उधार लेकर लॉकडाउन के मुश्किल समय में खाना खरीदा. जब उनसे मकान मालिक के व्यवहार के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "उसने हमें किराए के लिए बिल्कुल भी परेशान नहीं किया. किराए को लेकर वह ज्यादा सख्ती नहीं करता है."

सपनों की खातिर

प्रियंका कुमारी उन बहुत सी युवा महिलाओं में से एक हैं जो बेहतर जिंदगी का सपना लेकर शहर पहुंचीं. प्रियंका के मुताबिक उनके सपने ज्यादा बड़े नहीं हैं और उन्हें आसान से पूरा किया जा सकता है. वह एक अच्छा घर, बेटे की पढ़ाई लिखाई और स्मार्ट फैमिली प्लानिंग चाहती हैं ताकि उनके उतने ही बच्चे हों जिनकी परवरिश वे आराम से कर पाएं.

प्रियंका ने तो अपनी पूरी जिंदगी की योजना बना रखी थी. लेकिन फिर महामारी आ गई. उन्होंने तो यह भी सोच रखा था कि बेटा बड़ा हो जाएगा तो वह कोई कोर्स करके अपने लिए नौकरी तलाश लेंगी.

अब महामारी के कारण वह अपने सपनों पर दोबारा विचार कर रही हैं. उन्हें अब यह भी एहसास हो रहा है कि उनकी शादी बहुत जल्दी हो गई जिसकी वजह से वह पढ़ाई पूरी नहीं कर पाईं. वह कहती हैं, "गांव के स्कूल में पढाई पूरी नहीं कर पाई, क्योंकि आप तो जानती ही है कि वहां स्कूलों का क्या होता है. मेरे माता पिता ने मेरी जल्दी शादी कर दी क्योंकि उन्हें अपनी जवान कुंवारी बेटी की सुरक्षा की चिंता थी. मैं अब अपने बेटे को पढ़ाना चाहती हूं. मैं वापस गांव नहीं जाना चाहती जिससे मेरा बेटा अनपढ़ रह जाए."

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