″मैं अपना जिस्म वहीं छोड़ आई″: कहानी एक रोहिंग्या शरणार्थी की | दुनिया | DW | 18.10.2018
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दुनिया

"मैं अपना जिस्म वहीं छोड़ आई": कहानी एक रोहिंग्या शरणार्थी की

म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर हुए हमलों के दौरान फातिमा का सामूहिक बलात्कार हुआ. आज वह अपने परिवार के साथ बांग्लादेश के एक रिफ्यूजी कैंप में रहती है. डीडब्ल्यू की मुख्य संपादक इनेस पोल को उसने अपनी आपबीती सुनाई.

तिरपाल पर गिर रही बारिश के शोर के अलावा यहां और कोई आवाज सुनाई नहीं देती, न टीवी, न संगीत और न ही बच्चों की खिलखिलाहट. कॉक्स बाजार की चहल पहल वाली सड़कों से गुजर कर आने के बाद यहां का सन्नाटा और भी ज्यादा परेशान करता है.

सिर्फ अजान की आवाज ही इस सन्नाटे को चीरती है. चारों तरफ पेड़ों पर लाउडस्पीकर लगे हुए हैं, जो यहां की पहाड़ियों और कीचड़ भरी वादियों में मुअज्जिन की आवाज पहुंचाते हैं.

कुटुपालोंग दुनिया का सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर है. हम यहां के कैंप नंबर सात में पहुंचे. एक वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में यहां करीब 40,000 लोग रहते हैं. यह आंकड़ा सिर्फ एक अनुमान भर है.

ठीक से तो कोई भी नहीं जानता कि बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा पर स्थित इस तटवर्ती इलाके में कितने लोग फंसे हुए हैं. यह जगह कभी जंगल हुआ करती थी. सभी कैंपों को मिला कर यहां करीब 10 लाख लोग रह रहे हैं, या शायद 12, या उससे भी ज्यादा. जवाब इस पर निर्भर करता है कि आप वहां सवाल किससे कर रहे हैं.

1970 के दशक से ही रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार छोड़ कर भाग रहे हैं. लेकिन पिछले साल एक बार में ही जितने लोग यहां आ गए, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. कुछ महीनों के अंतराल में ही सात लाख से ज्यादा लोग हिंसा से बचने के लिए अपना घर बार छोड़ कर बांग्लादेश आ गए. कोई नहीं जानता कि कितने लोगों की हत्या की गई, लेकिन एक बात तो साफ है, दक्षिण एशिया के हालिया इतिहास में यह सबसे भयंकर जातीय संहार है.

30 से 40 बार बलात्कार

फातिमा, वहां से भाग कर आने वालों में से एक है. अपने अनुभवों को याद कर वह अपनी उंगलियां इस कदर चबा चुकी है कि नाखून भी दिखना मुश्किल है. उन यादों को भूलने के लिए तंबाकू भी चबाती है. हालांकि इस आदत ने मसूड़े सड़ा दिए हैं और दांत भी काले होने लगे हैं.

Bangladesch Rohingya Flüchtlings Camp (DW/I. Pohl)

फातिमा के साथ रात भर बलात्कार हुआ

फातिमा की उम्र 20 साल है और वह दो बेटों की मां है. म्यांमार से यहां आने से पहले फातिमा के साथ बलात्कार हुआ. एक बार नहीं, कोई 30 से 40 बार, वह भी एक ही रात में. वह ठीक से बता नहीं सकती कि कितनी बार उसके साथ दुष्कर्म किया गया और कितने आदमियों ने किया.

दबी हुई आवाज में वह कहती है, "मैंने अपना जिस्म वहीं छोड़ दिया था." ये कहते हुए उसकी नजरें नीचे जमीन को ही ताकती रहती हैं. और जब पलकें उठाती है, तब भी नजरें मिला नहीं पाती. ऐसा लगता है जैसे उसकी कजरारी आंखों के भीतर कोई दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो गया है.

चीखें सुनने वाला कोई नहीं

हम उसकी झोपड़ी में नीली और लाल धारियों वाली एक दरी पर बैठ कर उससे बात कर रहे थे. यहां बस एक प्लास्टिक का स्टूल है. फातिमा का पति अली पालथी मार कर उसके बगल में बैठा रहता है. वह उससे सिर्फ दो ही साल बड़ा है. बाकी लोगों की तरह उसे भी सेना से अपनी जान बचाने के लिए गांव छोड़ कर भागना पड़ा था. अपनी बीवी और दो बच्चों को अपने माता पिता के साथ पीछे छोड़ने के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं था. उस वक्त एक बच्चा 14 महीने का था और दूसरे का हाल ही में जन्म हुआ था. यह एक साल पहले की बात है.

वीडियो देखें 01:52

जब रोहिंग्या कैंप में पहुंची प्रियंका चोपड़ा

अली के जाने के कुछ ही दिन बाद सेना गांव में घुस आई. फातिमा और आस पास के गांवों की महिलाएं छिप कर जहां रह रही थीं, सेना वहां से उन्हें खींच कर जंगल में ले गई. यहां बार बार उनके साथ बलात्कार किया गया. लेकिन उनकी चीखों को सुनने वाला वहां कोई नहीं था. इन सभी के भाई और पति, जो शायद इन्हें बचा सकते थे, वे सभी या तो मारे जा चुके थे या फिर अली की तरह बांग्लादेश भाग गए थे.

फातिमा किसी तरह दोबारा अपने गांव पहुंची. इतना खून बह चुका था कि वक्त रहते उसके जख्मों का इलाज ना हुआ होता, तो वह जिंदा ना बची होती. पर अब शायद वह कभी दोबारा मां नहीं बन सकेगी.

छोड़ दी जाती हैं महिलाएं

अपने सास ससुर के साथ वह सीमा पार कर बांग्लादेश आ गई. यहां अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठनों ने अली को खोज निकालने में उसकी मदद की. अकसर बलात्कार पीड़ित महिलाओं को उनके पति स्वीकार नहीं करते.

उन्हें जिंदगी भर के दर्द और बच्चों के साथ अकेले छोड़ दिया जाता है क्योंकि उनकी राय में किसी और आदमी ने उनकी इ्ज्जत छीन ली है. लेकिन अली ऐसा नहीं सोचता, "मुझे उसके साथ रहने में कोई दिक्कत नहीं है. उसने अपनी मर्जी से तो ऐसा नहीं किया."

पश्चिम की महिला होने के नाते मेरे लिए यहां कई चीजें अनजान थीं. जैसे कि यहां महिलाएं अपनी झोपड़ी से कम ही बाहर निकलती हैं. भले ही अंदर खूब गर्मी हो और तापमान चालीस डिग्री पार कर चुका हो. राहत संस्था रेड क्रॉस के कर्मचारियों ने मुझे बताया, "ऐसा कोई लिखित नियम नहीं है, बस लंबे वक्त से चली आ रही परंपरा है." रोहिंग्या मुसलमानों में महिलाएं घर से सिर्फ तब ही बाहर निकलती हैं, अगर इसकी सख्त जरूरत हो.

कच्चे घरों में जीवन

कुटुपालोंग कैंप में ऐसी 19 बड़ी बड़ी झोपड़ियां हैं, जहां सिर्फ महिलाओं को आने की इजाजत है. साफ सुथरी जगह में वे कुछ घंटे बिता सकती हैं, चिकित्सीय सुविधाओं का भी लाभ उठा सकती हैं. और अगर बिजली आ रही हो, तो कुछ वक्त पंखे के सामने भी बैठ सकती हैं.

यहां पक्के टॉयलेट भी हैं और बच्चों को नहलाने की सुविधा भी. लेकिन अगर आप पहाड़ी के ऊपर से इस कैंप को देखेंगे, तो दूर दूर तक आपको बस कच्ची झोपड़ियां ही दिखेंगी. बांस की डंडियों पर तिरपाल डाल कर बस कुछ ढांचे से बना दिए हैं. कम ही घर ऐसे हैं, जिन पर टीन की छत हो.

Rohingya Flüchtlingslager (Getty Images/P. Bronstein)

झोपड़ियों में रहने को मजबूर रोहिंग्या

फातिमा और अली ऐसे कैंप में रहते हैं जिसे पिछले साल आनन फानन में बनाया गया था, जब लाखों रोहिंग्या भाग कर यहां आ गए थे. इस तरह के कैंप को अकसर आपातकालीन स्थिति में इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए नहीं कि वहां लंबे समय के लिए लोगों को ठहरा दिया जाए. लेकिन फातिमा और अली जानते हैं कि उनके पास और कोई विकल्प भी नहीं है.

म्यांमार रोहिंग्या मुसलामानों के लिए कागजी दस्तावेज बनाने के लिए भी तैयार नहीं है और उन्हें वापस लेने के लिए भी नहीं. बिना किसी वैध दस्तावेज के ये लोग कहीं के भी नागरिक नहीं हैं और पूरी तरह बांग्लादेश सरकार पर निर्भर हैं.

सहानुभूति भी नहीं रही

बांग्लादेश खुद विस्थापन की समस्या को बखूबी जानता है. ये उसके इतिहास का हिस्सा रहा है. इसलिए शुरुआत में तो शरणार्थियों के प्रति सहानुभूति दिखती थी. लेकिन धीरे धीरे यह भी बदल रहा है.

बहुत लोगों को ऐसा लगता है कि उनके देश ने इन पराए लोगों के लिए अब बहुत कर लिया. लगातार प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त रहने वाले बांग्लादेश में यूं भी संसाधनों की कमी है. ड्रग्स और हथियारों की स्मगलिंग पर काबू पाने के लिए पुलिस का भी अभाव है.

इसके अलावा युवा मुसलामानों के चरमपंथ की ओर बढ़ने का डर भी लोगों को सता रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि इन झोंपड़ियों में जिंदगी गुजार रहे युवाओं को बहकाना चरमपंथियों के लिए काफी आसान है. आधिकारिक रूप से ये रोहिंग्या कैंप छोड़ कर कहीं नहीं जा सकते हैं. इन्हें नौकरी करने की भी इजाजत नहीं है और यहां रह रहे बच्चों को प्राथमिक शिक्षा ही मिल पाती है.

अब फातिमा की बस एक ही ख्वाहिश है. वह वापस जाना चाहती है. अपने वतन लौटना चाहती है. शायद उसे उम्मीद है कि वहां उसे एक बार फिर वो मिल जाएगा, जो उस रात उस जंगल में खो गया था. शायद हिम्मत भी उसका साथ नहीं दे रही है जो उसे यकीन दिला सके कि वह इस अनजान देश में अपने लिए भविष्य खोज सकती है.

और इस सबके बीच बारिश की बूंदें अब भी तिरपाल पर गिर रही है. बारिश का ये शोर अब फातिमा की खोई हुई जिंदगी में इंतजार की धुन बन चुका है.

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