मुस्लिम महिलाओं ने की बराबरी की मांग | दुनिया | DW | 27.11.2015
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दुनिया

मुस्लिम महिलाओं ने की बराबरी की मांग

भारत की 70 हजार मुस्लिम महिलाओं के संगठन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिखकर मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार की मांग की है. मुस्लिम महिलाओं ने बहुविवाह को अवैध और हलाला को अपराध घोषित करने की मांग की है.

मुस्लिम महिलाओं के राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा. इस गठजोड़ में 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिलाएं सदस्य हैं. संविधान दिवस पर इन महिलाओं ने बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की.

यह मांग पत्र मुस्लिम महिलाओं की अपेक्षाओं और मांगों को लेकर तैयार किया गया है. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह संस्थापक जकिया सुमन का कहना है कि इसे स्वीकार कर लेने से मुस्लिम महिलाओं को गरिमामय जीवन जीने में मदद मिल सकेगी. उनकी मांग है कि सम्पत्ति में भी मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का हिस्सा मिले. उन्होंने सुझाव दिया है कि शरियत अप्लीकेशन एक्ट-1937 और डिजोल्यूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट-1939 में संशोधन कर उन्हें न्याय दिलाया जाए.

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अनिल दवे और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की बेंच ने नेशनल लीगल सर्विसेस अथॉरिटी से इस बारे में जवाब मांगा था कि क्या भारत में मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव को उनके मूल अधिकारों का हनन नहीं माना जाना चाहिए. ये वे मूल अधिकार हैं जो कि उन्हें संविधान की 14,15 और 21 धाराओं के तहत मिले हैं.

जकिया सुमन ने कहा, "लैंगिक न्याय हमारे संविधान का सिद्धांत है. प्रधानमंत्री को हमारे मांगपत्र के जरिए हम मुस्लिम महिलाओं की चिंता सरकार तक पहुंचाना चाहते हैं. हमने मुस्लिम महिलाओं की अपेक्षाओं और मांगों पर आधारित ड्राफ्ट तैयार किया है."

पत्र लिखने वाली महिलाओं का कहना है कि उन्होंने भारत के 10 राज्यों की 4,710 महिलाओं पर रिसर्च कर पाया कि 92.1 फीसदी महिलाएं तलाक के जुबानी तीन बार कहने के तरीके पर प्रतिबंध चाहती हैं. 91.7 फीसदी बहुविवाह के खिलाफ पाई गईं और 83.3 फीसदी महिलाओं ने माना कि मुस्लिम फैमिली लॉ को संहिता में ढाले जाने पर समुदाय की महिलाओं के साथ इंसाफ हो सकेगा.

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