मुश्किल है अफगानिस्तान में शांति की राह | दुनिया | DW | 05.02.2019
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दुनिया

मुश्किल है अफगानिस्तान में शांति की राह

अमेरिका अफगानिस्तान में शांति समझौता करने को उत्सुक दिख रहा है ताकि अमेरिकी सैनिकों को वापस घर लाया जा सके. जबकि भारत ने उसे तालिबान के साथ हड़बड़ी में शांति संधि करने पर चेतावनी दी है.

भारत का कहना है कि तालिबान के साथ किसी भी संधि में अफगानिस्तान की मौजूदा राजनीतिक और संवैधानिक संरचना की सुरक्षा होनी चाहिए. भारत चुनाव से पहले किसी अंतरिम सरकार के गठन के पक्ष में नहीं है. दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार भारत ने ये बातें अमेरिकी दूत जालमाय खालिदजाद को उनके नई दिल्ली दौरे पर कही. खालिदजाद अफगानिस्तान में विवाद का कूटनीतिक हल निकालने की हड़बड़ी में हैं ताकि 17 साल की लड़ाई खत्म हो और अमेरिकी सैनिक वापस लौट सकें, लेकिन समझौते की राह आसान नहीं.

अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत पर सालों तक जोर देते रहने के बाद अमेरिका ने सितंबर में खालिदजाद को अफगान दूत नियुक्त किया. उसके फौरन बाद उन्हृोंने विद्रोहियों से बातचीत शुरू कर दी जो अफगान सरकार को अमेरिका की कठपुतली बताते हैं और उनके साथ बात करने को तैयार नहीं हैं. अफगान युद्ध से अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की निराशा और गर्मियों तक आधे सैनिकों को वापस बुलाने की योजना ने खालिदजाद के मिशन को फौरी बना दिया है.

Afghanistan TV Ansprache Aschraf Ghani (Reuters/Afghan Presidential Palace office)

राष्ट्रपति गनी

तालिबान ने अफगानिस्तान में 1996 से 2001 तक कठोर इस्लामी शरिया कानून के आधार पर शासन किया है. इस दौरान अमेरिका पर 9/11 हमले का मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन वहीं रहता था. अब तालिबान का कहना है कि वह सत्ता पर एकाधिकार नहीं चाहता और वह दूसरे देशों के लिए खतरा पैदा नहीं करेगा. लेकिन बहुत से विश्लेषकों को डर है कि नाटो सैनिकों की पूरी वापसी के बाद अफगानिस्तान की कमजोर और भ्रष्ट सरकार चरमरा पर गिर सकती है या नए गृहयुद्ध की शुरुआत हो सकती है, जिसमें पहले ही लाखों लोग मारे जा चुके हैं,.

कौन कर रहा है बातचीत

अमेरिका का कहना है कि वह अफगानिस्तान के नेतृत्व वाली प्रक्रिया के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन इस समय मुख्य बातचीत अमेरिकी दूत खालिदजाद और तालिबान के राजनीतिक नेतृत्व के बीच हो रही है जो कतर में रह रहा है और उसमें युद्ध में शामिल कई कमांडर शामिल हैं. विश्लेषकों का कहना है कि तालिबान ताकतवर होकर वार्ता की मेज पर आया है. उसने देश के करीब आधे हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है. अफगान सैनिकों पर उनके हमले इतने जानलेवा हैं कि अफगान सरकार और अमेरिका ने उन्हें गोपनीय की श्रेणी में रखा है. एकाध बार तो उन्होंने पूरे के पूरे शहर पर कब्जा कर लिया है और नाटो के हवाई हमलों के डर से पीछे हटे हैं.

Afghanistan | Zalmay Khalilzad (picture-alliance/AP Photo/R. Maqbool)

जालमाय खालिदजाद

तालिबान के वार्ताकारों का नेतृत्व अब्दुल गनी बारादर कर रहे हैं. इस भूतपूर्व कमांडर को पाकिस्तान ने 8 साल की कैद के बाद कथित तौर पर अमेरिकी आग्रह पर पिछले साल रिहा किया था. समझा जाता है कि आंदोलन में उनका इतना आदर है कि वे शांति समझौते के लिए मोर्चे पर लड़ रहे तालिबान लड़ाकों का समर्थन पा सकते हैं. उनकी टीम में 2014 में अमेरिकी सैनिकों की रिहाई के बदले गुआंतानामो बे से छोड़े गए पांच तालिबान कमांडरों में से दो कमांडर भी शामिल हैं. खालिदजाद चीन, भारत और रूस के अलावा पाकिस्तान के साथ भी बातचीत कर रहे हैं जिसके बारे में समझा जाता है कि वह तालिबान नेतृत्व को पनाह दे रहा है.

किस बात पर हुई है सहमति

समझा जाता है कि दोनों पक्ष सहमति की ओर बढ़ रहे हैं जिसके तहत आतंकवादी हमलों के लिए इस्तेमाल न होने के तालिबान के बादे के ऐवज में अमेरिका अफगानिस्तान से वापस हट जाएगा. दोनों पक्ष एक संघर्ष विराम और अंतरिम सरकार के गठन पर भी बातचीत कर रहे हैं. खालिदजाद ने कहा है कि अमेरिका महिला अधिकारों, कानून के शासन और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए भी प्रतिबद्ध है, लेकिन साथ ही उसका ये भी कहना है कि इन अधिकारों पर बातचीत करना अफगानिस्तान के संगठनों का काम होगा.

अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार न सिर्फ भ्रष्टाचार में लिप्त है बल्कि जातीय और गुटीय आधार पर विभाजित भी है. उसकी सत्ता मुख्य रूप से शहरों में केंद्रित है जबकि देहाती इलाकों में व्यापक रूप से तालिबान का वर्चस्व है. अमेरिका और नाटो ने 2014 में अपनी लड़ाकू भूमिका खत्म करने की घोषणा की थी लेकिन अभी भी वह अफगान सेना को हवाई और रणनीतिक समर्थन दे रही है.

अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी, जो जुलाई में होने वाले चुनावों में फिर से उम्मीदवार बनने वाले हैं, देश में अंतरिम सरकार बनाने और नियोजित संसदीय चुनावों में देरी करने के सख्त खिलाफ हैं. हालांकि इस समय चल रही बातचीत में उन्हें दरकिनार कर दिया गया है. उनके शांति दूत ओमर दाउदजई इलाके में घूमकर अमेरिकी दूत के साथ हो रही बातचीत पर निगाह रखने की कोशिश कर रहे हैं. पिछले सालों में अफगानिस्तान की सरकारों को समर्थन दे रहे भारत की तालिबान के साथ बातचीत पर अभी तक कोई स्पष्ट नीति नहीं है, हालांकि उसने रूस में हुई बातचीत में पहली बार अपने दो पूर्व राजनयिकों को अनौपचारिक रूप से भेजा था. वह शांति वार्ता में अफगान सरकार की भूमिका चाहता है और वहां अंतरिम सरकार बनाने के खिलाफ है.

Russland Friedensgespräche Afghanistan | Taliban-Delegation in Moskau (Reuters/S. Karpukhin)

मॉस्को वार्ता में तालिबान प्रतिनिधि

तालिबान शासन की आशंका

कट्टर इस्लामी शासन के विरोधियों के मन में तालिबान शासन की यादें अभी ताजा हैं जब तालिबान ने लड़कियों की पढ़ाई और महिलाओं के घर से बाहर काम करने पर पर रोक लगा दी थी. हालांकि तालिबान नेतृत्व अब समझौतावादी रवैया अपना रहा है और उसने अफगान लोगों से अतीत को भूलने और एक दूसरे को बर्दाश्त करने की अपील की है. हालांकि तालिबान सैनिक तौर पर ताकतवर प्रतीत होता है लेकिन ये स्पष्ट नहीं है कि क्या उनके पास सरकार को गिराने की भी ताकत और संख्या है.

इस बीच पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित अफगान सरकार को अत्यंत भ्रष्ट और अक्षम माना जा रहा है. लोग सार्वजनिक सेवाओं के खस्ताहाल होने, असुरक्षा और घुसखोरी की शिकायत कर रहे हैं. 2001 में तालिबान सरकार को हटाए जाने के बाद महिलाओं को नई आजादियां मिली हैं, लेकिन उन पर अत्यंत अनुदारवादी समाज में अभी भी बहुत सारी रोक है. तालिबान शासन के खात्मे के 17 साल बाद भी अफगानिस्तान महिलाओं के लिए सबसे खराब देशों में शामिल है.

अफगानिस्तान के लोग किसी भी ऐसे समझौते का समर्थन करेंगे जो उनके लिए ज्यादा सुरक्षा लेकर आए और शासन में सुधार हो. लेकिन दमन और बर्बर लड़ाइयों के इतिहास को देखते हुए उनका किसी भी पक्ष पर भरोसा नहीं है. लोगों को डर है कि अमेरिका संधि कर लेगा लेकिन आखिरी सैनिकों के जाते ही उसे तोड़ दिया जाएगा और देश एक नए गृहयुद्ध का शिकार हो जाएगा.

Afghanistan Jugend misstraut Zukunft mit Taliban (Reuters/Mohammad Ismail)

युवाओं की आशंका

शांति की संभावना

अफगानिस्तान दशकों से युद्ध का सामना कर रहा है. हालांकि पिछली वार्ताओं में अमेरिका और तालिबान दोनों ने ही अहम प्रगति की बात की है लेकिन अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है. ये कहना जल्दबाजी होगी कि क्या तालिबान दूसरे हथियारबंद गुटों पर कार्रवाई करने का इच्छुक है और इसमें समर्थ भी है. देश में इस्लामिक स्टेट से जुड़ा एक गुट सक्रिय है जो अफगानिस्तान सरकार और तालिबान से झगड़ों के बावजूद बचा हुआ है और यदि तालिबान अमेरिकी मांगों को मानता हुआ दिखता है तो भविष्य में तालिबान के असंतुष्टों की भर्ती कर सकता है.

अमेरिका का कहना है कि उसने अफगानिस्तान और पाकिस्तान से अल कायदा को लगभग पूरी तरह खत्म कर दिया लेकिन माना जाता है कि अल कायदा के प्रमुख नेता आयमान अल जवाहिरी और ओसामा बिन लादेन का बेटा हमजा अभी भी उसी इलाके में रह रहे हैं. उग्रपंथियों के ठिकानों को या फिर उन्हें मदद देने वालों के बारे में जाने बिना उन्हें खत्म करना मुश्किल है. इसके साथ अमेरिका उसी स्थिति में पहुंच जाएगा जिसमें वह दो दशक पहले था जब अफगानिस्तान स्थित विदेशी लड़ाकों के एक छोटे से दल ने अमेरिका के अंदर हमला किया था.

एमजे/एनआर (एपी)

अफगानिस्तान की बुर्के वाली पावरलिफ्टर

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