मुट्ठी भर चावल से शुरुआत, आज टर्न ओवर 6 करोड़ के पार | दुनिया | DW | 17.02.2017
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दुनिया

मुट्ठी भर चावल से शुरुआत, आज टर्न ओवर 6 करोड़ के पार

माधुरी सिंह ने 1997 में एक मुट्ठी चावल के साथ गरीब बैंक की शुरुआत की और आज इसका सालाना टर्न ओवर 6 करोड़ रुपये के करीब है.

माधुरी सिंह को 1997-98 में उत्तर प्रदेश में वाराणसी के शंकरपुर गांव में परिवार नियोजन का काम करते हुए सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाने का विचार आया. माधुरी कहती हैं, "जब मैं परिवार नियोजन के काम के लिए महिलाओं के बीच जाती थी तो मुझे पता चला कि गांव की महिलाएं 500 से लेकर 5000 रुपये तक के कर्ज में डूबी हुई हैं.

साहूकार उन महिलाओं से 10 फीसदी की दर से ब्याज लेते. एक ऐसी ही महिला मुझे मिली जिसने महाजन से प्रसव के लिए 500 रुपये का कर्ज लिया था. वह महिला अगले 7 साल तक मूल रकम ही नहीं चुका पाई. महिला का 500 रुपये का कर्ज करीब 7 हजार रुपये से अधिक पहुंच गया था.'' यह सब देख माधुरी ने उसी गांव की 10-12 महिलाओं को इकट्ठा किया और सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाया. उस समय किसी महिला को समूह के बारे में जरा भी समझ नहीं थी.

एक मुट्ठी चावल की कीमत

माधुरी ने 10-12 महिलाओं का एक समूह बनाया और हफ्ते में 5 रुपये जमा करने को कहा. महिलाएं इतनी गरीब थीं कि उनसे पास 5 रुपये तक नहीं जुट पाते थे. तब माधुरी ने कहा कि रोज खाना बनाते वक्त एक मुट्ठी चावल कम बनाए और एक आलू को बचा ले. इस तरह से 7वें दिन उस बचे हुए चावल और आलू का इस्तेमाल करें और हफ्ते में एक दिन का आलू और चावल का पैसा बचने लगा. 5 रुपये से इस रकम को बढ़ाकर 20 रुपये किया गया.

महिलाओं के ही बीच में से किसी एक महिला को खाते की देखभाल की जिम्मेदारी गई. समूह में जमा रुपये समूह की सदस्य महिला को बतौर कर्ज दिया जाता. इस कर्ज का इस्तेमाल महिलाएं पशुपालन, मुर्गी पालन, खेती, बागवानी के काम में करती और आर्थिक तौर पर सशक्त होती गईं. महिलाएं किराए पर खेत लेती और उस पर अनाज और सब्जी उगातीं.

एक समूह की सफलता ने माधुरी सिंह को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी. उन्होंने धीरे-धीरे ह्यूमन वेल्फेयर एसोसिएशन के तहत काम करते हुए सेल्फ हेल्प ग्रुप को बढ़ाते हुए 40 गांव में करीब 300 समूहों का गठन किया. इन समूहों की शीर्ष संस्था का नाम 'महिला शक्ति' है. आज करीब 3750 महिलाएं आर्थिक तौर सशक्त हैं और किसी ना किसी समूह से जुड़ी हैं. सेल्फ हेल्प ग्रुप की खास बात ये है कि इनसे जुड़ी महिलाओं के घर में सभी बच्चे पढ़े लिखे हैं और अच्छी जगह नौकरी करते हैं. सेल्फ हेल्प ग्रुप से जुड़ी महिलाओं के बच्चे कभी बाल मजदूरी नहीं करते.

एक सेल्फ हेल्प ग्रुप की इतनी शक्ति और माधुरी की इच्छाशक्ति ने बहुत सी महिलाओं के स्वावलंबन के सपने को साकार किया. समाज की आखिरी पंक्ति में खड़ी महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाया और वित्तीय आजादी दिलाई.

माधुरी सिंह को ये सब करने की प्रेरणा ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी डॉ. रजनीकांत से मिली. माधुरी सिंह शुरू में परिवार नियोजन का काम डॉ. रजनीकांत के साथ करती थीं. डॉ. रजनीकांत इन खास ग्रुप के बारे में बताते हैं कि, "सेल्फ हेल्प ग्रुप से जुड़ी महिलाएं 70 फीसदी से अधिक लोन आजीविका के लिए लेती हैं और 10 फीसदी का लोन रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लिया जाता है. सेल्फ हेल्प ग्रुप से जुड़े लोगों की बस्तियों में बाल मजदूरी नहीं है, बच्चों और गर्भवती महिलाओं का 100 फीसदी टीकाकरण है. सेल्फ हेल्प ग्रुप न केवल लोगों की वित्तीय जरूरतों को पूरा करता है बल्कि राजनीतिक और समाजिक सशक्तिकरण के भी काम करता है.”

सेल्फ हेल्प ग्रुप की खूबियां बताते हुए डॉ. रजनीकांत कहते हैं कि यह स्थिरता की दिशा में एक आंदोलन है. उनके मुताबिक, "जब हम सतत विकास की बात करते हैं तो सबसे पहले आर्थिक विकास भी होना चाहिए. तब जाकर महिलाओं का समाजिक और राजनीतिक विकास हो पाएगा." 

बैंक भी बने मददगार

माधुरी सिंह की इस सफलता ने बैंकों को भी ऋण देने और स्वरोजगार को बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है. आज के समय में ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन के तहत 300 सेल्फ हेल्प समूह चल रहे हैं और इन समूहों की मदद और प्रमोशन के लिए नाबार्ड बैंक आगे आया है. समूहों को ऋण के लिए अन्य बैंक भी समर्थन करते हैं. समूह के डेढ़ साल या दो साल हो जाने पर समूह या फिर उसके सदस्यों को बैंक लोन देता है.

यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने एक सौ सेल्फ हेल्प ग्रुप या फिर उसके सदस्यों को ढाई करोड़ रुपये का लोन दिया है. हालांकि बैंकों ने जो भी लोन दिया है वह महिलाओं की साख को देखते हुए दिया है यानी किसी पंचायत या सरपंच की सिफारिश के बिना. वाराणसी के लेढ़ुपुर में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के शाखा प्रबंधक अवनीश झा बताते हैं कि 2013 में शाखा खुलने के बाद से ही महिलाओं को भूमिहीन क्रेडिट कार्ड पर लोन दिया जा रहा है. अवनीश झा कहते हैं, "यूनियन बैंक के ट्रेनिंग सेंटर में सेल्फ हेल्प ग्रुप की महिलाओं को ट्रेनिंग दी जाती हैं. यह ट्रेनिंग खेती-बाड़ी और अन्य स्वरोजगार से जुड़ी होती हैं. उसके बाद उनकी निजी क्षमता को देखते हुए लोन दिया जाता है.”

अवनीश झा के मुताबिक ग्रामीण महिलाओं के अंदर आगे बढ़ने की क्षमता बहुत अधिक है और वे वित्तीय तौर आगे बढ़ने की क्षमता रखती हैं और बैंक केवल सहारा देता है. वे कहते हैं कि इससे बैंक और महिलाओं दोनों के लिए फायदेमंद है.

जब महिला अधिकारों की बात होती है तो उनके समाजिक और राजनीतिक अधिकारों की भी बात होनी चाहिए तभी जाकर महिलाएं आर्थिक तौर पर भी सशक्त हो पाएंगी और तब बराबरी करके और स्वावलंबी बनकर समाज का नेतृत्व कर पाएंगी.

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