मुख्यधारा में आने का रास्ता अभी लंबा | ब्लॉग | DW | 31.07.2015
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ब्लॉग

मुख्यधारा में आने का रास्ता अभी लंबा

भारत और बांग्लादेश के बीच जमीन की अदला-बदली के ऐतिहासिक समझौते पर अमल के साथ अब तक बेवतन हजारों लोगों को नया वतन मिला है. भारत में स्थित बांग्लादेशी भूखंडों में रहने वाला एक भी व्यक्ति सीमा पार कर नहीं गया.

इन लोगों ने भारत को ही अपना देश मान लिया है जबकि बांग्लादेश स्थित भारतीय भूखंडों से 979 लोगों ने इस पार आ कर भारत में बसने का फैसला किया है. इस ऐतिहासिक समझौते के लागू होने के मौके पर सीमा के दोनों ओर बसे भूखंडों में जश्न का माहौल है. लोग अपनी असली आजादी की खुशियां कई दिनों से मना रहे हैं. भारत स्थित भूखंडों में रहने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा अल्पसंख्यकों का है. लेकिन अब असली आजादी पाने के जश्न में यहां धर्म हाशिए पर है. यह भूखंड भाईचारे और आपसी सद्भाव की मिसाल बन कर उभरे हैं. भारत में स्थित ऐसे 51 भूकंड़ों में कोई 14 हजार लोग रहते हैं.

आजादी के जश्न के बावजूद फिलहाल इन भूखंडों में रहने वाले लोगों की आगे की राह आसान नहीं है. अभी तो उनके पंजीकरण का काम चल रहा है. कई लोगों के पास जमीन के मालिकाना हक के कागजात तक नहीं हैं. ऐसे में उनको अपनी जमीन पर हक साबित करने में काफी दिक्कतें आएंगी. दूसरी ओर, ऐसे लोगों की तादाद भी कम नहीं है जिनको देश की आजादी से पहले कूचबिहार के तत्कालीन राजा से जमीन दान या इनाम में मिली थी. उनके पास इसके कागजात तो हैं. लेकिन भारतीय अदालतों में अब उन कागजातों को बदलवाने के लिए उनको काफी पापड़ बेलने पड़ सकते हैं.

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले में बिखरे इन 51 भूखंडों में अब तक कोई नागरिक सुविधाएं नहीं हैं. इसलिए भारत का नागरिक बन जाने के बावजूद उनकी समस्याएं फिलहाल जस की तस ही रहेंगी. सड़क, बिजली, पीने के पानी के अलावा स्कूल और अस्पताल जैसी आधारभूत सुविधाएं रातोंरात खड़ी नहीं हो सकतीं. इसी तरह राशन कार्ड, वोटर कार्ड, आधार कार्ड और पासपोर्ट जैसे कागजात बनाने की प्रक्रिया में भी बरसों लग सकते हैं. तमाम कागजात होने के बावजूद मुख्य भूमि पर रहने वाले नागरिकों को ही पासपोर्ट और दूसरे कागजात हासिल करने में पसीने छूट जाते हैं. ऐसे में इन लोगों की हालत समझना मुश्किल नहीं है. भूखंडों में रहने वाले तमाम बच्चों में से इक्का-दुक्का के अलावा ज्यादातर के पास कोई जन्म प्रमाणपत्र नहीं है. उच्चशिक्षा और दूसरे तमाम कागजात बनवाने के लिए अब यह प्रमाणपत्र अनिवार्य हो गया है. जिनके पास ऐसे प्रमाणपत्र हैं वे भी असमंजस में हैं. इसकी वजह यह है कि उनमें पिता की जगह किसी और का नाम लिखा है.

लेकिन आखिर ऐसा क्यों हुआ? दरअसल इन भूखंडों में रहने वाले लोगों को भारतीय अस्पतालों में इलाज कराने या प्रसव की अनुमति नहीं थी. इसलिए यहां रहने वाली महिलाएं किसी भारतीय नागरिक को फर्जी पति बना कर जिले के अस्पतालों में इलाज कराती थीं. नतीजतन प्रसव के बाद बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र पर उसी फर्जी पति का नाम पिता की जगह लिख दिया जाता था. भारतीय स्कूलों में पढ़ रहे छात्रों के पिता के नाम भी इसी तरह फर्जी है. दाखिले के लिए उनलोगों ने रुपए देकर इन फर्जी नामों का सहारा लिया था. लेकिन अब कोई सात दशकों से लंबित आजादी उनके लिए जश्न के साथ इस तरह की कई समस्याएं भी साथ लेकर आई हैं. इन कागजातों को बदलवाना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं है.

भारतीय सीमा में स्थित सबसे बड़े बांग्लादेशी भूखंड मशालडांगा के नवाजुद्दीन मियां कहते हैं, ‘हम जानते हैं कि महज आजादी मिलने से ही हमारा जीवन आसान नहीं हो जाएगा. भूखंडों की समस्याओं को सुलझाने और यहां नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने में अभी काफी वक्त लगेगा. फिर भी हम इसी से खुश हैं कि कम से कम हमें एक पहचान तो मिल गई.'

राज्य की ममता बनर्जी सरकार ने कूचबिहार जिला प्रशासन को नए बने भारतीय नागरिकों को तमाम सुविधाएं शीघ्र मुहैया कराने के निर्देश दिए हैं. लेकिन जिला प्रशासन के एक अधिकारी कहते हैं कि ऐसा कहना आसान है. लेकिन जमीनी हकीकत अलग है. दशकों से उपेक्षित इन भूखंडों में रहने वालों के देश की मुख्यधारा में शामिल होने का रास्ता अभी काफी लंबा है.

ब्लॉग: प्रभाकर

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