मुंबई सेंसेक्स में हैप्पी दिवाली | दुनिया | DW | 01.11.2013
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दुनिया

मुंबई सेंसेक्स में हैप्पी दिवाली

एक तरफ एशियाई शेयर संघर्ष कर रहे हैं तो दूसरी ओर भारतीय शेयर बाजार कुलांचे भर रहा है. अब तक की सर्वाधिक ऊंचाई पर पहुंच कर भारतीय शेयर बाजार ने निवेशकों को गर्मजोशी से हैप्पी दिवाली कहा है.

मुंबई शेयर बाजार में शुक्रवार को कामकाज शुरू होने के साथ ही सेंसेक्स की ऊंचाई बढ़ने लगी और बहुत जल्द ही यह वैश्विक मंदी से पहले 2008 की ऊंचाइयों को पीछे छोड़ 21250 तक जा पहुंचा. हालांकि इसके बाद धीरे धीरे यह नीचे उतरने लगा और दोपहर आते आते 21150 तक गिर गया. इससे पहले 10 जनवरी 2008 को सेंसेक्स अपनी सर्वाधिक ऊंचाई 21,206 पर पहुंचा था. विदेशी निवेशकों के बाजार में वापस लौटने के साथ ही वैश्विक और घरेलू स्तर पर आर्थिक चिंताओं में कुछ कमी को इसकी वजह बताया जा रहा है.

भारतीय शेयर बाजार इस साल विदेशी फंडों के पैसा निकालने के कारण बुरी हालत में पहुंच गया. एक तरफ अमेरिकी निवेशकों ने हाथ खींच लिए थे तो दूसरी तरफ घरेलू अर्थव्यवस्था विकास की धीमी दर, रुपये की गिरती कीमत और बढ़ते कारोबार घाटे का सामना कर रही थी. ऐसे में शेयर बाजार में कहां से रौनक दिखती. बीते कुछ हफ्तों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के साथ ही घरेलू स्थिति में भी कुछ सुधार हुआ है. अक्टूबर में विदेशी फंडों ने करीब ढाई अरब डॉलर का निवेश किया. इससे 2013 में भारतीय इक्विटी की कुल खरीदारी 16.19 अरब तक जा पहुंची है. मुंबई में शेयरों की दलाली करने वाली कंपनी प्रभुदास लीलाधर के निवेश रणनीतिकार अजय बोदके कहते हैं, "यह तेजी उभरते बाजारों में वैश्विक तरलता का तूफान आने की वजह से है."

Indien Finanzen

आईटी और ऑटो क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के अच्छे प्रदर्शन और सितंबर में खत्म हुई तिमाही में उम्मीद से बेहतर मुनाफे के आंकड़ों ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है और घरेलू बाजार भी कुछ बेहतर हुआ है. विश्लेषकों को तो यह भी लग रहा है कि सितंबर में रिजर्व बैंक के नए गवर्नर रघुराम राजन की नियुक्ति का भी कुछ अच्छा असर हुआ है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख अर्थशास्त्री रहे राजन ने निवेशकों का भरोसा लौटाने, मुद्रा स्फीति की दर पर लगाम कसने और कमजोर रुपये में जान फूंकने के लिए योजना बनाई है. अमेरिकी आंकड़ों ने उभरते बाजारों की मुद्रा का बुरा हाल कर रखा है. इसमें भारत और इंडोनेशिया के रूपये की सबसे ज्यादा दुर्दशा हुई है. एशियाई मुद्रा में सबसे खराब प्रदर्शन कर रहा भारतीय रूपया बीते एक महीने में करीब 10 फीसदी की खोई कीमत वापस पाने के साथ ही कुछ स्थिर भी हुआ है. अगस्त में एक डॉलर के मुकाबले 68.85 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था और तब इसके और गिरने की आशंका जताई जा रही थी. हालांकि जानकार अब भी मान रहे हैं कि रुपये पर दबाव बहुत ज्यादा है और आने वाले दिनों में यह फिर नीचे जा सकता है.

राजन के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुद्रा स्फीति की दर को नीचे लाने की है और उन्होंने अपनी तरफ से काफी कोशिश भी की है. इतने ही दिन में दो बार ब्याज दरों को बदला जा चुका है लेकिन वार्षिक मुद्रा स्फीति सितंबर में 6.46 फीसदी के ऊंचे दर पर है जिसमें खाने पीने की चीजों और ईंधन की कीमतें सबसे बड़ी भूमिका निभा रही हैं. हालांकि बोदके जैसे विश्लेषक मान रहे हैं कि कीमतें जल्दी ही ही नीचे आएंगी. मानसून अच्छा रहा है, रिजर्व बैंक ब्याज दरों को कम करेगा और विकास में तेजी आएगी जिसकी मांग कारोबार जगत कर रहा है. भारत के विकास की दर पिछले साल 5 फीसदी रही है जो बीते एक दशक में सबसे कम है.

भारत में स्थिति भले ही सुधरती दिख रही हो लेकिन एशियाई शेयरों की हालत खस्ता है. चीन के उत्पादन क्षेत्र पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के प्रोत्साहन कार्यक्रमों के बंद होने की आशंका का ग्रहण छा गया है. इस अनिश्चितता ने रातों रात डॉलर की कीमत को दो हफ्तों की सबसे ऊंची दर पर पहुंचा दिया. इसके पीछे वजह जोखिम वाली संपत्तियों के कारोबार में निवेशकों का चौकस हो जाना है. यूरोप का हाल भी बहुत अच्छा रहने की उम्मीद नहीं है. आर्थिक जानकारों ने मिला जुला हाल रहने की बात कही है. यूरोपीय शेयर बाजारों में ब्रिटेन के एफटीएई में 0.1 फीसदी तो जर्मनी के डीएएक्स और फ्रांस के सीएसी में 0.2 फीसदी के गिरावट की आशंका है. इन सब के बीच अगर कहीं राहत मिल सकती है तो वह चीनी फैक्ट्रियों से ही है. चीन का उत्पादन क्षेत्र अक्टूबर में पिछले 18 महीनों में सबसे तेजी से बढ़ा.

एनआर/एमजे (एएफपी, रॉयटर्स)

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