महाराष्ट्र में अचानक क्यों की इतने सारे किसानों ने आत्महत्या | भारत | DW | 03.01.2020
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भारत

महाराष्ट्र में अचानक क्यों की इतने सारे किसानों ने आत्महत्या

महाराष्ट्र में नवंबर 2019 में चार सालों में पहली बार एक महीने में 300 किसानों ने आत्महत्या कर ली. राज्य में आखिरी बार एक महीने में 300 से ज्यादा आत्महत्याएं 2015 में हुई थीं.

किसानों की आत्महत्या महाराष्ट्र के लिए पिछले तीन दशक से एक ऐसी चुनौती बना हुआ है जिसका सामना करने में एक के बाद एक हर सरकार विफल साबित हुई है. ताजा आंकड़ों से लग रहा है कि हालात और गंभीर होते जा रहे हैं.

महाराष्ट्र में नवंबर 2019 में चार सालों में पहली बार एक महीने में 300 किसानों ने आत्महत्या कर ली. टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार ने महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग के आंकड़ों का विश्लेषण कर यह आंकड़ा निकाला है. राज्य में आखिरी बार एक महीने में 300 से ज्यादा आत्महत्याएं 2015 में हुई थीं.

राज्य के लिए विशेष रूप से शर्मनाक बात यह है कि नवंबर में जब यह जानें जा रही थीं तब राज्य के सभी विधायक और प्रमुख राजनीतिक पार्टियां सत्ता हथियाने की होड़ में व्यस्त थे. इसके ठीक एक महीना पहले अक्टूबर 2019 में यह आंकड़ा 186 पर था. यानी सिर्फ उस एक महीने में 61 प्रतिशत ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली.

अक्टूबर में ही, यानी जिस महीने में विधान सभा चुनाव हुए थे, बेमौसम बरसात ने पूरे राज्य में किसानों की फसल को बर्बाद कर दिया था. पूरे राज्य में कम से कम एक करोड़ किसानों का नुकसान इस बरसात की वजह से ही हुआ. नवंबर में हुई आत्महत्याओं में सबसे ज्यादा (120) मराठवाड़ा में हुई. विदर्भ में 112 आत्महत्याएं हुईं और वह दूसरे स्थान पर रहा.

नवंबर में आंकड़ों में हुई वृद्धि की वजह से जनवरी से नवंबर तक की अवधि में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले ज्यादा आत्महत्याएं हुईं. जहां 2018 में इसी अवधि में 2,518 आत्महत्याएं हुईं, 2019 में इसी अवधि में ये बढ़कर 2,532 हो गईं.

सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर में कार्यरत डॉ जीवी रामंजनेयुलु का कहना है कि इसके पीछे दो कारण हैं. वह बताते हैं, "भारत में यूं तो कृषि क्षेत्र की हालत हमेशा ही खराब रहती है, पर पिछले 20 साल का डाटा देख कर यह पता चलता है कि चुनावी वर्ष में कृषि की हालत और बिगड़ जाती है." इसकी वजह समझाते हुए वह कहते हैं, "होता यह है कि किसान एक कृषि मौसम के खत्म होने के बाद दूसरे की शुरुआत की तैयारी कर रहा होता है और ऐसे में चुनावों की वजह से कृषि अधिकारी सक्रिय नहीं होते, बाजार सक्रिय नहीं होता, ऋण ठीक से नहीं मिल रहे होते हैं, सब कुछ ठप्प पड़ा होता है."

किसान ऐसे में असहाय हो जाता है और या तो पहले से परेशान किसान की हताशा बढ़ जाती है या वो ऐसे निर्णय ले लेता है जिनसे उसे बाद में नुकसान उठाना पड़ता है. डॉ जीवी रामंजनेयुलु आगे बताते हैं कि पिछले चार-पांच सालों में कृषि का संकट और गहरा गया है. वह इसका कारण "कृषि उत्पादों के दामों में लगातार होती गिरावट और दूसरी तरफ खेती के खर्च और आम खर्चों में लगातार हो रही वृद्धि" को बताते हैं.

डॉ रामंजनेयुलु के अनुसार यह हालात ना सिर्फ भारत सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के विफल होने के संकेतक हैं, बल्कि इस बात का भी कि नीति निर्धारकों का ध्यान अभी भी किसानों के लिए जोखिम प्रबंधन के उपायों की जगह विफल बीमा योजनाओं तक ही सीमित है.

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