महज उन्नीस साल की उम्र में सुषमा वर्मा को मिली रिसर्च फेलोशिप | भारत | DW | 20.08.2019
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भारत

महज उन्नीस साल की उम्र में सुषमा वर्मा को मिली रिसर्च फेलोशिप

लखनऊ के बाबा साहब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के एनवायरनमेंटल माइक्रोबायलोजी विभाग की शोध छात्रा सुषमा वर्मा को शोध कार्य के लिए यूजीसी की प्रतिष्ठित फेलोशिप मिली है.

हालांकि फेलोशिप मिलना कोई नई बात नहीं है, हर साल मिलती है, उनके चार और साथियों को मिली है लेकिन जो सबसे अहम बात है वो यह कि यह उपलब्धि उन्हें महज उन्नीस वर्ष की उम्र में मिली है.

सुषमा वर्मा ने जब माइक्रोबायलोजी में एमएससी की उपाधि ली, उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ पंद्रह साल थी, यानी जिस उम्र में लोग आमतौर पर दसवीं कक्षा पास करते हैं. इससे पहले सुषमा ने महज दस साल की उम्र में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली थी. इस उपलब्धि के लिए उनका नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है.

सुषमा वर्मा बताती हैं, "मैं जब ढाई साल की थी तो मैंने मंच से रामायण का पाठ किया था जो मुझे याद था. उसके बाद मेरी पढ़ाई घर पर ही होती थी. जब मैं पांच साल की हुई तो लोगों के कहने पर मेरे घर वाले मेरा एडमिशन नवीं कक्षा में कराने गए. कुछ स्कूलों ने तो मना कर दिया लेकिन सेंट मिराज इंटर कॉलेज, हिन्द नगर में मेरा टेस्ट लेने के बाद मुझे नवीं कक्षा में दाखिला मिल गया.”

सुषमा वर्मा ने पांच साल की उम्र में सीधे नवीं कक्षा में दाखिला लिया और दस साल की उम्र तक वो स्कूली दहलीज लांघ कर विश्वविद्यालय की चौखट पर पहुंच गईं. वो बताती हैं कि विश्वविद्यालय में उम्र को लेकर ज्यादा समस्या इसलिए नहीं आई क्योंकि उसके पहले की परीक्षाएं वो अच्छे अंकों से पास कर चुकी थीं.

 Sushma Verma (privat)

सुषमा वर्मा

हालांकि नवीं कक्षा के बाद दसवीं की बोर्ड परीक्षा के दौरान भी उम्र की समस्या आड़े आई लेकिन स्कूल प्रबंधन ने यूपी बोर्ड के बड़े अधिकारियों से जब बात की और उन्हें पूरी जानकारी दी तो सुषमा को बोर्ड परीक्षा में बैठने की अनुमति मिल गई.

लेकिन नवीं कक्षा के बच्चों के साथ पांच साल की एक लड़की कैसे पढ़ती थी? सुषमा कहती हैं, "तब का बहुत ज्यादा तो पता नहीं लेकिन मुझे कोई समस्या नहीं हुई. और ना ही मेरी वजह से किसी और को कोई दिक्कत हुई.”

दरअसल, सुषमा के बड़े भाई शैलेंद्र कुमार वर्मा ने भी अपनी शुरुआती पढ़ाई घर से ही की थी और उन्होंने भी कम उम्र में ही अपनी पढ़ाई पूरी कर ली थी. सुषमा बताती हैं कि शैलेंद्र इस समय बेंगलुरु में किसी कंपनी में अच्छे पद पर काम कर रहे हैं.

दिलचस्प बात ये है कि सुषमा जिस बाबा साहब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं, उनके पिता तेजबहादुर वर्मा उसी विश्वविद्यालय में पहले एक सफाईकर्मी थे और अब सुपरवाइजर हो गए हैं. मूल रूप से रायबरेली के रहने वाले तेजबहादुर बताते हैं कि आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण बच्चों को शुरू में घर पर ही पढ़ाना पड़ा लेकिन जल्दी ही उन्हें अच्छे स्कूलों में एडमिशन मिल गया जहां उनकी फीस भी माफ हो गई.

सुषमा वर्मा की इस उपलब्धि के लिए पिछले साल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी उन्हें सम्मानित किया था. सुषमा वर्मा ने न सिर्फ इतनी कम उम्र में स्कूली और विश्वविद्यालय की शिक्षा पूरी की बल्कि हमेशा कक्षा में अव्वल भी रही हैं. एमएससी में उन्होंने विश्वविद्यालय में पहला स्थान हासिल किया था.

यही नहीं, यूनिवर्सिटी रिसर्च एंट्रेंस टेस्ट में भी सुषमा ने सातवीं रैंक हासिल की थी. एंवायरमेंटल माइक्रोबायोलॉजी के विभाग प्रमुख रहे और सुषमा के गाइड प्रोफेसर नवीन कुमार कहते हैं कि सुषमा ने इतनी कम उम्र में जो कर दिखाया है वो काबिलेतारीफ है और हमें उसकी हिम्मत बढ़ानी चाहिए. शोध के दौरान भी उसके टैलेंट का पता चलता है.

सुषमा के पिता तेजबहादुर वर्मा बताते हैं कि सुषमा ने मेडिकल की पढ़ाई के लिए भी टेस्ट दिया था लेकिन उसका रिजल्ट रोक दिया गया था. आरटीआई डालने के बाद भी कोई जवाब नहीं दिया गया था. उसके बाद उसने विश्वविद्यालय से बीएससी करने का फैसला किया.

उन्नीस वर्षीय सुषमा का रिसर्च का यह चौथा साल है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी की यह फेलोशिप रिसर्च के दौरान छात्रों को आर्थिक मदद के लिए दी जाती है. इसके तहत हर महीने पचीस हजार रुपये की छात्रवृत्ति दी जाती है.

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