मलेरिया बॉक्स: जादू का पिटारा | मंथन | DW | 05.12.2013
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मंथन

मलेरिया बॉक्स: जादू का पिटारा

कई बार हम जो तीर इस्तेमाल कर रहे होते हैं वे काम के नहीं होते, और काम का तीर हमारे पास होता ही नहीं है. कुछ ऐसा ही ध्यान में रख कर मलेरिया से लड़ने की मुहिम में एक संस्था ने एक अनोखा तरीका निकाला है.

किसी भी बीमारी के लिए दवा विकसित करने के अब तक बेहद सुनियोजित तरीके अपनाए जाते रहे हैं. लेकिन स्विट्जरलैंड की एक संस्था मेडिसिंस फॉर मलेरिया वेंचर (एमएमवी) का तरीका बिलकुल अलग है. यहां एक मलेरिया बॉक्स है, पांच सफेद रंग की प्लेटों का सेट. हर प्लेट में छोटे छोटे खाने, जिनमें अलग अलग रासायनिक मिश्रण हैं. और ये सेट संस्था रिसर्चरों को मुफ्त बांट रही है. एमएमवी के लिए काम करने वाले थॉमास श्पांगेनबेर्ग ने बताया, "हमारे मलेरिया बॉक्स में 400 ऐसे कंपाउंड हैं जो मलेरिया के पैरासाइट को मार सकते हैं."

रसायनों की लाइब्रेरी

संस्था का मकसद है मलेरिया के खिलाफ रिसर्च को आगे बढ़ाना और कामयाबी हासिल करना. इसका उन्होंने खास तरीका निकाला है. संस्था हर उस रिसर्चर को ये प्लेटें मुफ्त भेजती है जो इस रिसर्च पर काम करना चाहते हैं. इन 400 में से कोई शायद ऐसा भी हो जो कामयाबी की कुंजी साबित हो जाए.

दवाएं विकसित करने के क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं. प्रयोगशाला में दवा विकसित करने से पहले रिसर्चर उन्हें कागजों पर तैयार करते हैं. फिर दवाओं की कंपनियों से इन्हें मंगाते हैं. कई लोग आज भी इसी तरीके को अपनाते हैं. लेकिन इस बीच दवाइयों की बड़ी कंपनियों ने दूसरा तरीका निकाला है. रोबोटों की मदद से वे ऐसे कई रासायनिक मिश्रण खोज निकालते हैं, जिनसे उदाहरण के तौर पर मलेरिया परजीवी को मारा जा सकता है. कौन सा कंपाउंड किस तरह काम करता है, इससे ज्यादा अहम है यह जानना कि वह काम का है भी या नहीं. इस तरह से काम करने वालों के लिए दवाओं की कई कंपनियों ने इन रासायनिक मिश्रणों की लाइब्रेरियां तैयार कर ली हैं.

60 लाख में से 400 मिश्रण

एमएमवी के लिए काम करने वाले यॉर्ग मोएर्ले ने बताया, "हम रिसर्चरों तक उन रासायनिक मिश्रणों को पहुंचाना चाहते थे, जो मलेरिया परजीवी को मार सकते हैं." कई बड़ी कंपनियों के साथ मिलकर एमएमवी ने करीब 60 लाख मिश्रणों की जांच की, इनमें से करीब 25,000 ने मलेरिया के खिलाफ असर दिखाया.

400 सबसे असरदार कंपाउंडों को मलेरिया बॉक्स में रखा गया है. ये केवल वे मिश्रण हैं जो बाजार में मिल सकते हैं. साथ ही जो मलेरिया के खिलाफ दवाओं में इस्तेमाल हो रहे मौजूदा मिश्रणों से अलग हैं.

श्पांगेनबेर्ग ने कहा, "हमने ऐसा इसलिए किया क्योंकि हमें उम्मीद है कि ये दवाओं में इस्तेमाल हो रहे मौजूदा मिश्रणों से अलग हैं. संक्रामक बीमारियों की दुनिया में परजीवियों में दवाओं के लिए प्रतिरोधन क्षमता का विकसित हो जाना बड़ी समस्या है. इसलिए हम ऐसे मिश्रणों को आगे लाना चाहते हैं जो अलग तरीके से काम करते हों."

Malaria Ausstrich

रोबोटों ने ऐसे कई रासायनिक मिश्रण खोज निकाले हैं, जिनसे मलेरिया परजीवी को मारा जा सकता है.

बढ़िया उपाय

एमएमवी अब तक 27 देशों के 160 रिसर्चरों को मलेरिया बॉक्स भेज चुकी है, जिनमें यूरोप, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, भारत, ब्राजील और युगांडा शामिल हैं.

एसेन यूनिवर्सिटी में रिसर्च कर रही अनेटे काइजर ने भी अपने लिए एक मलेरिया बॉक्स मंगाया है. उन्होंने बताया, "इस तरह हमारे पास वे मिश्रण मौजूद होंगे जो मलेरिया के विपरीत काम करते हैं. आम तौर पर यह संभव नहीं हो पाता है क्योंकि इस तरह के ज्यादातर मिश्रण बड़ी कंपनियों के पास ही होते हैं."

काइजर इन रासायनिक मिश्रणों को उन प्रोटीन पर आजमा रही हैं जो परजीवी के जीवन चक्र में अहम भूमिका निभाते हैं. उन्हें मिश्रण से काफी उम्मीद है और लगता है उन्हें कामयाबी मिल सकती है. वह इस पर और आगे काम करने की योजना बना रही हैं.

आखेन यूनिवर्सिटी की गाब्रिएल प्राडेल भी मानती हैं कि मलेरिया बॉक्स एक अच्छा उपाय है. उन्हें इन 400 में से कई मिश्रणों के बारे में तो पहले पता भी नहीं था. उन्होंने बताया, "ऐसा कोई खुला डाटाबेस नहीं है जहां ऐसे सभी तत्वों के बारे में जानकारी हो, जो मलेरिया के खिलाफ काम करते हैं. रिसर्चर के लिए एक और बड़ी समस्या होती है पैसा. मिश्रणों को खरीदने में कई हजार यूरो का खर्च है."

कोई रहस्य नहीं

मलेरिया बॉक्स मुफ्त में पाने के लिए संस्था की एक शर्त है. रिसर्चरों को अपनी रिसर्च में इस मिश्रण से संबंधित हर एक बात को प्रकाशित करना होगा. इससे दूसरे रिसर्चरों तक भी यह जानकारी पहुंच पाएगी. साथ ही इससे वे पिछले परिणामों के आधार पर वहीं से काम आगे बढ़ा पाएंगे.

श्पांगेनबेर्ग जोर देकर कहते हैं कि अगर परिणाम विपरीत आते हैं, यानि किसी मिश्रण से हताशा ही हाथ लगती है, तो भी इसके बारे में छापना जरूरी है. आमतौर पर वैज्ञानिक इस तरह के परिणामों की चर्चा नहीं करते.

इस कार्यक्रम की शुरुआत करीब दो साल पहले हुई. कई रिसर्चर कई सकारात्मक परिणामों के बारे में रिपोर्टें छाप भी चुके हैं. अच्छी बात यह है कि ना केवल मलेरिया के, बल्कि रिसर्चरों ने पाया कि इनमें से कई मिश्रण कई दूसरे परजीवियों पर भी असरदार हैं.

थोमास श्पांगेनबेर्ग मानते हैं कि इस तरह की दवाओं को विकसित करने में काफी लंबा समय लगता है. हालांकि इस पहल से काफी मदद मिली है, लेकिन किसी बड़े परिणाम तक पहुंचने के लिए हमें और इंतजार की जरूरत है.

रिपोर्ट: ब्रिगिटे ओस्टेराथ/ एसएफ

संपादन: ईशा भाटिया

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