मलाला ने दिखाया स्कूल का रास्ता | मनोरंजन | DW | 15.10.2013
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मनोरंजन

मलाला ने दिखाया स्कूल का रास्ता

मलाला यूसुफजई को भले ही शांति के लिए नोबेल पुरस्कार नहीं मिला हो, इसके बावजूद बहुत से लोगों का मानना है कि पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में मलाला के संघर्ष के कारण स्कूलों में लड़कियों के दाखिले में तेजी आई है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मलाला को मिली प्रशंसा के बाद पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के स्कूलों में लड़कियों के दाखिले में बढ़त दर्ज की गई है. खास करके मलाकंद डिवीजन में. मलाकंद डिवीजन में चितराल, निचली दीर, ऊपरी दीर, स्वात, बुनेर, शांगला और मलाकंद जिला शामिल हैं.

खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के शिक्षा मंत्री आतिफ खान का कहना है, ''एक महीने के भीतर दो लाख से ज्यादा बच्चों ने स्कूलों में दाखिला लिया है, जिनमें करीब 75 हजार लड़कियां भी शामिल हैं.'' उनके मुताबिक इस इलाके में रहने वाले लोगों को ये बात समझ में आ गई है कि शिक्षा देश की तरक्की के लिए अहम है. खान का कहना है कि मलाला के साथ जो हुआ, वो काफी बुरा था और ऐसा किसी और के साथ नहीं होना चाहिए.

मलाला का अभियान

मलाला युसुफजई जब 11 साल की थी तब उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए अभियान की शुरुआत की थी. पिछले साल 9 अक्टूबर को इस्लामी कट्टरपंथियों ने उनपर हमला किया था.

पाकिस्तान तालिबान ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी. साथ ही धमकी भी दी थी कि अगर कोई मलाला की तरह खड़ा होता है, तो उसका भी अंजाम यही होगा. मलाला के सिर पर गोली मारी गई थी, कई ऑपरेशनों के बाद उन्हें बचा लिया गया.

Pakistan Bloggerin Malala Yousafzai aus dem Swat-Tal

पिछले साल इस्लामी कट्टरपंथियों ने मलाला पर हमला किया, कई ऑपरेशनों के बाद उन्हें बचा लिया गया.

साल 2007 में इस्लामी कट्टरपंथियों ने स्वात इलाके पर कब्जा कर लिया था जिसके बाद शरिया कानून लागू कर दिया गया था. विरोधियों को मौत के घाट उतार दिया गया.

शरिया कानून तोड़ने वालों को सरेआम कोड़े मारे जाने लगे, औरतों के बाजार जाने पर रोक लगा दी गई और लड़कियों के स्कूल जाने पर भी. तालिबानियों न केवल मलाकंद में स्कूलों को तबाह कर डाला बल्कि गैरकानूनी रेडियो प्रसारण के जरिए लड़कियों की शिक्षा के खिलाफ प्रचार भी किया.

तालिबान के अभियान का नतीजा यह रहा कि लड़कियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया. 2009 में सैन्य कार्रवाई के बाद तालिबान समर्थकों के एक बड़े हिस्से को खदेड़ दिया गया. अब बहुत लड़कियां स्कूलों में वापस लौट आईं हैं.

दाखिले में तेजी

स्वात इलाके के शिक्षा अधिकारियों का कहना है कि तालिबान के जाने और मलाला की पहल के बाद मलाकंद इलाके में लड़के और लड़कियों के स्कूल में दाखिले में तेजी आई है.

हालांकि स्थानीय प्रशासन ने एक हजार महिला शिक्षकों की भर्ती और करीब 200 क्लासरूम के निर्माण के काम में नाकाम साबित हुआ है. महिला शिक्षकों की भर्ती और क्लासरूम नहीं होने के कारण खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में समस्या हो गई है.

इस्लामिक कट्टरपंथियों ने 800 से ज्यादा स्कूलों को तबाह कर दिया था. 182 तो सिर्फ मलाकंद डिवीजन में थे. स्थानीय प्रशासन सिर्फ 43 स्कूलों का पुननिर्माण करवा पाया.

अंतरराष्ट्रीय समुदायों ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत और अफगानिस्तान से सटे इलाके में दर्जनों स्कूल चलाने में मदद भी की .

खैबर पख्तूनख्वा प्रांत विधानसभा की सदस्य नगीना खान के मुताबिक, "शिक्षा के मामले में स्वात अव्वल नंबर पर था, एक समय में स्वात का बुरा दौर था. लेकिन हम फिर वापस आ गए हैं. स्वात में कई मलाला हैं, सभी मलाला की तरह पढ़ना चाहती हैं."

इस्लामिक कट्टरपंथी अभी भी खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में मौजूद हैं. स्थानीय लोग तालिबान के खौफ से मलाला के समर्थन में खुलकर सामने नहीं आते. लेकिन वे मलाला को शुभकामनाएं देने से पीछे नहीं हटते.

खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के पूर्व शिक्षा मंत्री हुसैने बाबक ने डॉयचे वेले को बताया कि मलाला पर हमले के बाद लोगों ने शिक्षा को लेकर और ध्यान केन्द्रित किया है. उनके मुताबिक, "जब उन्होंने मलाला पर हमला किया तब पूरे देश ने सोचा कि उन्हें अपने बच्चों को पढ़ाना चाहिए. उसके बाद ही लड़कियों के दाखिले में तेजी आई. हम लगता है कि एक दिन सभी लड़कियां स्कूल जाने लगेंगी."

रिपोर्ट: फरीदुल्लाह खान, पेशावर/ ए अंसारी

संपादन: आभा मोंढे

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