मजहबी ताकतों से हारा महान वैज्ञानिक | विज्ञान | DW | 10.07.2012

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विज्ञान

मजहबी ताकतों से हारा महान वैज्ञानिक

पाकिस्तान ने धार्मिक कारणों से नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अपने एकमात्र वैज्ञानिक को भुला दिया है. अब्दुस सलाम ने 'दिव्य कण' कहे जाने वाले हिग्स बोसोन की खोज के लिए सैद्धांतिक ढांचा विकसित करने में योगदान दिया.

अब्दुस सलाम पाकिस्तान में पिछले तीन दशकों में बढ़ते धार्मिक कट्टरपंथ का सबूत हैं. उनका 1996 में निधन हुआ. भौतिकी में अपने अग्रणी काम और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के आरंभिक चरणों में उसे दिशा निर्देश देने वाले काम के लिए कभी उन्हें राष्ट्रीय हीरो माना जाता था. अब उनका नाम स्कूल की किताबों से भी हटा दिया गया है क्योंकि वे अहमदिया संप्रदाय के थे जिसे पाकिस्तान की सरकार ने गैर इस्लामिक घोषित कर दिया है और तालिबान उन्हें अधर्मी मानता है.

पाकिस्तान में पिछले सालों में इस्लाम की कट्टरपंथी व्याख्या ने जोर पकड़ा है और देश में अहमदिया के अलावा शिया मुसलमानों, हिंदुओं और ईसाइयों जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति खराब होती गई. पाकिस्तान की ज्यादातर आबादी सुन्नी संप्रदाय की है.

कौन थे अब्दुल सलाम

अविभाजित भारत के पाकिस्तानी हिस्से में 1926 में जन्मे अब्दुस सलाम बचपन से ही प्रतिभाशाली थे. उन्होंने अपने जीवन काल में एक दर्जन से ज्यादा पुरस्कार और सम्मान जीते. 1979 में कणीय भौतिकी के सामान्य मॉडल पर उनके काम के लिए उन्हें स्टीवन वाइनबर्ग के साथ नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसमें इस बात की सैद्धांतिक व्याख्या की गई थी कि किस तरह आधारभूत ताकतें ब्रह्मांड की कुल गत्यात्मकता का संचालन करती हैं.

Illustration des Zerfalls eines fiktiven Higgs-Boson

सलाम और वाइनबर्ग ने एक दूसरे से स्वतंत्र रूप से सब एटॉमिक कण के अस्तित्व की भविष्यवाणी की, जिसे अब ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स और भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस के नाम पर हिग्स बोसोन का नाम दिया गया है. इसे दिव्य कण के नाम से भी पुकारा जा रहा है क्योंकि इसका अस्तित्व ब्रह्मांड के आरंभिक विकास को समझने के लिए अत्यंत जरूरी है.

पिछले बुधवार को स्विट्जरलैंड के सर्न में काम कर रहे वैज्ञानिकों की इस घोषणा ने तहलका मचा दिया कि उन्होंने एक ऐसा कण खोजा है जो दिव्य कण के समान है. इसका सबूत जेनेवा में यूरोपीय परमाणु शोध संस्थान में विश्व के सबसे बड़े हाइड्रोन कोलाइडर में हुए शोध में मिला. इस्लामाबाद में कायदे आजम यूनिवर्सिटी के भौतिकी विभाग के प्रमुख खुर्शीद हसनैन कहते हैं, "यह सलाम के काम और सामान्य मॉडल का सबसे बड़ा प्रमाण है."

1960 और 70 के दशक में पाकिस्तान में अब्दुस सलाम का बड़ा रुतबा था. वे राष्ट्रपति के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार थे और देश की अंतरिक्ष एजेंसी तथा परमाणु विज्ञान संस्थान बनाने में सरकार की मदद कर रहे थे. सलाम ने परमाणु बम बनाने के पाकिस्तानी प्रयासों में भी शुरुआत में मदद दी. पाकिस्तान ने 1998 में परमाणु परीक्षण किया.

अब्दुस सलाम और उनके जैसे दूसरे 30 लाख अहमदिया की जिंदगी 1974 में तब बदल गई जब पाकिस्तानी संसद ने संविधान में संशोधन कर अहमदिया लोगों को मुसलमान मानने से इनकार कर दिया. अहमदिया संप्रदाय के लोगों का मानना है कि 1908 में मारे गए हजरत मिर्जा गुलाम अहमत अल्लाह के पैगम्बर थे.

पाकिस्तान सरकार ने देश की प्रमुख इस्लामी पार्टियों के आंदोलन के बाद यह कदम उठाया. इस्लाम पैगम्बर मोहम्मद को अंतिम पैगम्बर मानता है और उनके बाद अपने को पैगम्बर घोषित करने वालों को अधर्मी मानता है. पाकिस्तानी पासपोर्ट के लिए अर्जी देने वालों को इस बयान पर दस्तखत करना होता है कि अहमदिया संप्रदाय के संस्थापक छली थे और उनके अनुयायी गैर मुस्लिम हैं.

एक कानून पास कर अहमदिया संप्रदाय को लोगों पर खुद को मुसलमान कहने, खुलेआम अपनी आस्था पर बात करने, अपने पूजा स्थलों को मस्जिद कहने और अजान देने पर पाबंदी लगा दी गई. उन्हें ऐसा करने पर जेल या मौत की सजा दी जा सकती है.

1974 में अब्दुस सलाम ने संविधान संशोधन के विरोध में अपने सरकारी पद से इस्तीफा दे दिया और अपने काम को जारी रखने के लिए देश छोड़कर यूरोप चले गए. इटली में उन्होंने विकासशील देशों के वैज्ञानिकों की मदद के लिए सैद्धांतिक भौतिकी संस्थान बनाया. नोबेल जीतने के बाद जनरल जिया उल हक ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा लेकिन आम लोगों का रवैया रूखा रहा.

उनके साथ काम कर चुके पाकिस्तान वैज्ञानिक परवेज हुडभॉय कहते हैं कायदे आजम यूनिवर्सिटी को सलाम के लेक्चर का एक कार्यक्रम कट्टरपंथियों की धमकी के कारण रद्द करना पड़ा. "जिस तरह का बर्ताव उनके साथ किया गया है, वह एक त्रासदी है. वे राष्ट्रीय हीरो से ऐसे व्यक्ति बन गए जो पाकिस्तान में पैर नहीं रख सकता था." सलाम को सम्मानित करने वाले राष्ट्रपति जिया ने अपने कार्यकाल में अहमदिया पर जुल्म बढ़ा दिया.

सलाम का अपमान उनकी मौत के बाद भी जारी रहा. 1996 में ऑक्सफोर्ड में मौत के बाद उनका शव पाकिस्तान में दफनाया गया. उनकी कब्र के पत्थर पर लिखा गया नोबेल पुरस्कार जीतने वाला पहला मुसलमान. बाद में एक स्थानीय मजिस्ट्रेट ने उससे मुसलमान शब्द हटाने का आदेश दिया. पाकिस्तान में तालिबान के उदय के बाद अहमदिया के खिलाफ हमले बढ़े हैं. 2010 में उनकी दो मस्जिदों पर हमले हुए जिसमें 80 लोग मारे गए.

एमजे/ओएसजे (एपी)

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