मगरमच्छ के मुंह लगा इंसानी जायका | दुनिया | DW | 23.05.2014
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दुनिया

मगरमच्छ के मुंह लगा इंसानी जायका

करीम उनेई झील में मछली पकड़ रहे थे, तभी उन्हें पता चला जिसे वह पानी पर फैला शैवाल समझ रहे थे वह कुछ और ही है. यूगांडा की नदियों और झीलों में इन दिनों मगरमच्छ घात लगाए बैठे रहते हैं.

पानी में उनके शिकार जैसे जैसे कम होते जा रहे हैं, इंसानों का शिकार उनके लिए नया विकल्प बनता जा रहा है.40 वर्षीय करीम ने बताया, "अचानक ही इस चीज ने मेरा बायां हाथ झपटा और पकड़ कर नीचे खींच लिया." मगरमच्छ उन्हें पानी में खींच कर ले गया. "मैं खुद को बचाने के लिए मगरमच्छ से जूझता रहा, लेकिन उसने मुझे जकड़ रखा था. हम लड़ते रहे." उन्होंने बताया कि वह मदद के लिए चिल्लाते रहे. उनकी आवाज सुन कर लोग दौड़ कर आए और करीम को छुड़ाने के लिए मगरमच्छ को लाठियों से पीटा.

इस हमले में उनका हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया. देश में मगरमच्छ मछलियों को मार कर मछुआरों को नुकसान तो पहुंचा ही रहे हैं, साथ ही उनके जीवन के लिए खतरा भी बन गए हैं. यूगांडा के वन्यजीव प्राधिकरण के पशु नियंत्रण निदेशक पीटर ओगवांग के मुताबिक बहुत ज्यादा मछली पकड़ने से पानी में मगरमच्छ का आहार तो कम हो ही गया है, साथ ही आसपास कई इंसानी बस्तियां बस गई हैं. इससे मगरमच्छ इंसानों को आहार बनाने पर मजबूर हो गए हैं.

विक्टोरिया, अलबर्ट, क्योगा झीलों और नील नदी के किनारे पिछले 14 सालों में करीब 340 लोग मगरमच्छ का शिकार हो चुके हैं. 2013 में 31 मौतों के मामले दर्ज हुए. ओगवांग कहते हैं कि असल आंकड़े और भी ज्यादा हो सकते हैं.

उन्होंने बताया, "कई इलाकों में तो मगरमच्छों ने अब मछलियों का शिकार बंद ही कर दिया है, वे इंसानों को शिकार बनाने के इंतजार में रहते हैं. वे पानी में छिप कर बैठे रहते हैं, उन्हें इंसानों से डर नहीं लगता. कोई एक मगरमच्छ शिकार करता है और दूसरे उसके साथ खाने के लिए आ जाते हैं."

पूर्वी अफ्रीकी देशों में कितने जंगली मगरमच्छ घूम रहे हैं, उनकी ठीक संख्या की जानकारी नहीं है. लेकिन अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ अलबर्ट झील के आसपास ही करीब 600 मगरमच्छ गिने जा चुके हैं.

Bildergalerie Demokratische Republik Kongo

युगांडा के इन इलाकों में आबादी का बड़ा हिस्सा जीवन के लिए मछली पकड़ने पर निर्भर है.

करीम पर भी विक्टोरिया झील के उत्तरी किनारे के पास ही हमला हुआ था. यह दुनिया में ताजे पानी की झीलों में दूसरी सबसे बड़ी झील है. इन इलाकों की ज्यादातर आबादी जिंदगी गुजारने के लिए मछली मारने पर ही निर्भर करती है. राष्ट्रीय सांख्यिकी विभाग के अनुसार यहां से 2012 में करीब सवा चार लाख टन मछली पकड़ी गई. खतरा सिर्फ रात को या मछली पकड़ते समय नहीं. आसपास रहने वाले लोगों को यह डर भी रहता है कि मगरमच्छ रेंगते हुए उनके घर तक न पहुंच जाएं.

2004 से अब तक अधिकारियों ने 79 मगरमच्छ पकड़े हैं जिन्हें राष्ट्रीय उद्यानों में पहुंचा दिया गया. इनमें से सबसे भारी, करीब एक टन के मगरमच्छ पर शक था कि वह पूर्वी यूगांडा में 15 साल में करीब 83 लोगों को शिकार बना चुका है.

ओगवांग का कहना है कि उन्हें मगरमच्छों को पकड़ने के लिए आर्थिक मदद के साथ आधुनिक उपकरणों की भी जरूरत है. उन्होंने बताया कि फिलहाल मगरमच्छ पानी में उतर कर पकड़े जा रहे हैं जिससे कई बार कर्मचारी जख्मी भी हो जाते हैं. इलाके के मछुआरे हमजा मुगर्या सरकार को इसका दोषी मानते हैं. वह कहते हैं, "सरकार ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. सात साल के बच्चे तक को मछली पकड़ने की छूट है."

एसएफ/एजेए (डीपीए)

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