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तस्वीर: DW

मंथन 55 में खास

२६ सितम्बर २०१३

यूरोप के कई देशों में लोग साइकिल चलाना बहुत पसंद करते हैं. आठ करोड़ की आबादी वाले जर्मनी में करीब सवा छह करोड़ साइकिलें हैं. लेकिन पारंपरिक साइकिलों की सवारी कुछ लोगों को लुभा नहीं पाती, उनके लिए बना है खास स्क्रूजर.

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स्क्रूजर दिखता तो ऐसा है जैसे बड़ों के लिए बच्चों का स्कूटर हो. यह बिजली की मोटर की मदद से 25 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल कर सकता है. जर्मनी में पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ तो होते ही हैं, साथ ही साइकिल के लिए भी अलग रास्ता होता है. स्क्रूजर को भी बस इसी रास्ते पर ही चलाया जा सकता है, सड़कों पर नहीं.

4,000 यूरो का स्कूटर

इस अनोखी सवारी को तैयार किया है येन्स थीमे ने. लेकिन इसे बनाने के पीछे वजह क्या थी, "यहां के हालात से मुझे खीझ हो रही थी. कार चलाना परेशान कर रहा था, खास तौर से छोटे मोटे काम के लिए बाजार जाना. मुझे कुछ ऐसा चाहिए था जो मेरे लिए सही हो. साइकिल मेरी पसंद नहीं और मैं आमतौर पर सड़कों पर दिखने वाली सवारियों से कुछ अलग भी चाहता था."

इलेक्ट्रिक स्कूटर ई-साइकिल की ही तरह पल्स ड्राइव से चलता है. यह ड्राइवर की गति समझ लेता है और फिर उसे कई गुना बढ़ा देता है. ई-साइकिल भी लोगों को लुभा रही हैं. एक अनुमान है कि जर्मनी की सड़कों पर 13 लाख ऐसी साइकिलें हैं. हालांकि बिजली से चलने वाली गाड़ियां अपनी तकनीक के कारण महंगी हैं. स्क्रूजर की कीमत करीब 4,000 यूरो है. जर्मनी में जहां 2,000 यूरो में पुरानी कार मिल जाती है, वहां यह थोड़ा महंगा है.

इरादा है इस बिजली से चलने वाले स्कूटर के लिए ऊंची कमाई वाले शहरवासियों को लुभाना. लोगों को अक्सर छोटे मोटे कामों के लिए निकलना पड़ता है और वे इसके लिए गाड़ी नहीं लेना चाहते. पहला स्क्रूजर मई 2014 तक आ जाएगा. दुनिया भर से 60 ऑर्डर मिल भी चुके हैं.

ध्रुवों की पिघलती बर्फ

इसके अलावा मंथन के इस अंक में पर्यावरण पर खास ध्यान दिया गया है. कार्यक्रम के पहले हिस्से में ले चलेंगे आपको जर्मनी की जानी मानी आल्फ्रेड वेगनर इंस्टीट्यूट में, जहां ध्रुवों पर पिघल रही बर्फ पर रिसर्च चल रही है. जलवायु परिवर्तन, ध्रुवों की बर्फ का पिघलना या फिर समुद्री जीवन का बदलना, कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद वैज्ञानिक पुख्ता तौर पर इनके बारे में कोई दावा करते हैं. बेहद मुश्किल हालात में गुजरने और फिर सैकड़ों घंटे कंप्यूटर पर गुणा भाग करने के बाद ही हम तक नतीजे पहुंचते हैं. दुनिया भर में मशहूर जर्मन संस्थान आल्फ्रेड वेगनर इंस्टीट्यूट या एडब्ल्यूआई 1980 से इसी काम में लगा है.

साथ ही बताएंगे आपको कि क्यों विवादों में घिरी है पनामा नहर. इंजीनियरिंग के लिहाज पनामा नहर एक अजूबा है. यह दुनिया का अकेला ऐसा जलमार्ग है जहां जहाज का कप्तान अपने जहाज का नियंत्रण पूरी तरह पनामा विशेषज्ञ कप्तान को सौंप देता है. प्रशांत और अटलांटिक महासागर के बीच बनी इस नहर से गुजरने के लिए हजारों टन भारी हर जहाज को 85 फुट ऊपर उठाया जाता है और यह काम लॉक में भरा पानी करता है. इन दिनों नहर पर नए लॉक लगाए जा रहे हैं जो विवादों में घिरे हैं. कैसे चल रहा है यहां निर्माण का काम और क्या हैं विवाद जानेंगे मंथन के इस अंक में शनिवार सुबह 10.30 बजे डीडी-1 पर.

एनआर/आईबी

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