भारत में साफ हवा के लिए बजट में पैसे और पारदर्शिता की मांग | भारत | DW | 25.01.2021
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स्वच्छ हवा

भारत में साफ हवा के लिए बजट में पैसे और पारदर्शिता की मांग

भारत में लॉकडाउन और वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से प्रदूषण कम जरूर हुआ है लेकिन स्थित गंभीर बनी हुई है. हवा में पार्टिकुलेट मैटर अब भी सुरक्षित मानकों से बहुत ज्यादा हैं.

फरवरी 2020 में बजट पेश करते हुये वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम यानी एनसीएपी के लिए 4,400 करोड़ रुपये आवंटित किए. एनसीएपी जनवरी 2019 में शुरू किया गया कार्यक्रम है जिसके तहत देश के 122 शहरों की हवा साल 2024 तक 20%-30% साफ करने का लक्ष्य रखा गया है. दस लाख से अधिक आबादी वाले इन शहरों में प्रदूषण के लिए पीएम -10 कणों की हवा में मौजूदगी को आधार बनाया गया है.

सरकार ने पंद्रहवें वित्त आयोग की सिफारिश पर नवंबर में 42 शहरों के लिए 2,200 करोड़ रुपया रिलीज भी किया. हालांकि अभी केंद्र सरकार ने कहा है कि राज्यों को बाकी पैसा एनसीएपी में उनके "प्रदर्शन के आधार पर मिलेगा,” लेकिन राज्यों के पास प्रदूषण कम करने के लिए क्या रणनीति है यह अभी साफ नहीं है. ऐसे में सवाल है कि बजट में सरकार क्या ऐसे कदम उठाएगी जिससे अति प्रदूषित शहरों में हवा साफ हो सके.

अब भी जानलेवा हैं प्रदूषण के स्तर

हवा में मौजूद पीएम 2.5 और पीएम 10 कणों (पार्टिकुलेट मैटर) को प्रदूषण का एक बड़ा पैमाना माना जाता है. हालांकि पिछले कुछ वक्त में देश के कई शहरों में प्रदूषण का स्तर गिरा है लेकिन अब भी पार्टिकुलेट मैटर सुरक्षित मानकों से काफी ऊपर है. मिसाल के तौर पर केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड यानी सीपीसीबी द्वारा पीएम–10 के लिए सुरक्षित सालाना स्तर 60 माइक्रोग्राम/घन मीटर है लेकिन पिछले साल कोरोना महामारी के कारण लागू लॉकडाउन के बावजूद कई शहरों यह इस सुरक्षित सीमा से काफी ऊपर था. दिल्ली में पीएम-10 का सालाना स्तर 81, लखनऊ में 216, पटना में 224 और गाजियाबाद में 104 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रहा. हालांकि कुछ शहरों में पिछले साल यह आंकड़ा सुरक्षित स्तर पर भी रहा जैसे बंगलुरू में 29, भोपाल में 59, कोलकाता में 40 और मुंबई में 41 पर रहा. महत्वपूर्ण है कि सीपीसीबी के तय मानक विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों की तुलना में काफी ढीले हैं.

Indien Smog in Neu Delhi

स्मॉग में डूबे शहर

इसी तरह पीएम 2.5 जिसका सुरक्षित सालाना स्तर भारत में 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है वह भी पिछले साल कई शहरों में काफी ऊपर था. दिल्ली में यह सालाना आंकड़ा 94, लखनऊ में 89 और पटना में 66 रहा. इस साल सर्दियों में एयर क्वॉलिटी इंडेक्स का दैनिक स्तर तो कई शहरों में 500 को भी पार कर गया. दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो डॉ संतोष हरीश एनसीएपी के तहत दिए गए फंड को पर्याप्त नहीं मानते और कहते हैं कि वायु प्रदूषण से लड़ने के लिए ऐसा वित्तीय सहयोग 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों के लिए भी होना चाहिए क्योंकि छोटे शहरों और गांवों में भी प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है.

क्या साफ ईंधन पर होगा जोर

उधर पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड इंवायरेन्मेंट (सीएसई) ने सरकार से मांग की है कि वह दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में साफ ईंधन के प्रयोग को प्रोत्साहित करे. वित्तमंत्री को बजट से ठीक पहले लिखे पत्र में सीएसई ने मांग की है कि उद्योगों को सस्ती बिजली दी जाए और नेचुरल गैस पर जीएसटी 5% की जाए ताकि कोयले की खपत घट सके. सीएसई के मुताबिक जिस तरह साल 2000 में बसों को डीजल की जगह सीएनजी पर चलाना अनिवार्य किया गया और फिर उद्योगों और बिजलीघरों के लिए कोयले, पैटकोक और फर्नेस ऑइल की जगह नेचुरल गैस पर चलाने की पाबंदी लगाई गई उसी तरह अब सरकार को एक बार फिर दिल्ली और उसके आसपास कोयले के प्रयोग को कम करने के लिए कदम उठाने होंगे.

सीएसई का शोध बताता है कि दिल्ली के आसपास के 7 जिलों गाजियाबाद, भिवानी, सोनीपत, पानीपत, फरीदाबाद, अलवर और गुरुग्राम में इंडस्ट्री कोयले का जमकर इस्तेमाल कर रही है. इन जिलों में उद्योग हर साल कुल 14 लाख टन से अधिक कोयला जला रहे हैं जबकि नेचुरल गैस सिर्फ 2 लाख टन ही इस्तेमाल हो रही है. सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण के अनुसार, "नेचुरल गैस पर अभी भारी टैक्स लगता है. इसे खरीदने और बेचने दोनों ही वक्त टैक्स देना पड़ता है यानी प्रोडक्ट के अंतिम मूल्य पर टैक्स 18% तक हो सकता है. कोयले के विपरीत गैस अभी जीएसटी में शामिल नहीं है इसलिए इसे 5% जीएसटी स्लैब (18% वैट व अन्य टैक्स के बजाय) में शामिल किए जाने की जरूरत है.”

Luftreiniger in Neu Delhi installliert

राजधानी में हवा को साफ करने के प्रयास

डॉ संतोष हरीश कहते हैं कि बाहरी प्रदूषण के साथ साथ इनडोर एयर पॉल्यूशन पर काबू पाना भी बहुत जरूरी है और बजट में इसे लेकर सरकार को सक्रियता दिखानी चाहिए. डॉ संतोष के मुताबिक, "उज्ज्वला योजना ने देश में रसोई गैस कनेक्शनों की संख्या में बहुत इजाफा किया है जो अच्छी बात है लेकिन अब सरकार को चाहिए कि वह गरीबों के लिए रसोई गैस का इस्तेमाल भी मुमकिन बनाए. रसोई गैस सब्सिडी का ढांचा ऐसा हो जिससे अधिक से अधिक गरीब साल भर सिलेंडर खरीद सकें. यह इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि शहरों में ही नहीं बल्कि गांवों में भी प्रदूषण बढ़ रहा है.”

आंकड़ों और पारदर्शिता का अभाव

एयर क्वॉलिटी मॉनिटरिंग में आंकड़ों का अभाव एक बड़ी समस्या है. दो साल पहले शुरू किए गए क्लीन एयर प्रोग्राम में क्या तरक्की हो रही है किसी प्लेटफॉर्म पर इसकी जानकारी नहीं है. केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) और राज्य प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (एसपीसीबी) हवा में प्रदूषण के सीमित डाटा देते हैं लेकिन यह नहीं बताते कि हर सेक्टर का इमीशन लोड कितना है.

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के सीनियर एनालिस्ट सुनील दहिया कहते हैं, "सिर्फ वायु प्रदूषण का स्तर जानना ही पर्याप्त नहीं है. यह भी पता लगाना जरूरी है कि किस सेक्टर से कितना प्रदूषण हो रहा है. मिसाल के तौर पर अगर हमें यह जानकारी हो कि किसी शहर में 20,000 टन कोयला जल रहा है तो इस खपत को घटाने की दिशा में काम हो सकता है और पावर सेक्टर में साफ ईंधन की सप्लाई बढ़ाने की मांग या दबाव बनाया जा सकता है. इसी तरह अगर पता हो कि कितनी पेट्रोल या डीजल किसी शहर में खर्च होता है तो ट्रांसपोर्ट सेक्टर में उस हिसाब से नियोजन की कार्यवाही हो सकती है लेकिन अगर किसी सेक्टर का इमीशन लोड ही पता न हो तो आप कैसे कदम उठाएंगे.”

Indien Kohlemine

अभी भी बड़े पैमाने पर कोयले का इस्तेमाल

दहिया के मुताबिक इस तरह की व्यवस्था तो पिछले बजटों में भी की गई थी लेकिन उनका जमीनी स्तर कितना क्रियान्वयन हुआ इसके ऊपर प्रश्न चिन्ह है. इसलिए बजट में यह ध्यान रखना होगा कि सरकारी धन का प्रयोग हवा को प्रदूषण के स्रोत पर ही साफ करने के उपाय हों. स्मोक टावर खड़े करना ऐसे कॉस्मैटिक कदम है जिनसे सिर्फ जनता के पैसे की बर्बादी ही होगी.

गैरकानूनी औद्योगिक इकाइयों पर नजर

सीएसई में औद्योगिक प्रदूषण यूनिट के प्रोग्राम डायरेक्टर निवित कुमार यादव कहते हैं कि उद्योगों के संचालन में पारदर्शिता बहुत जरूरी है. बड़े उद्योगों के अलावा कई छोटे उद्योग जो एमएसएमई सेक्टर में आते हैं, गैरकानूनी तरीके से चल रहे हैं और प्रदूषण फैलाने वाला ईंधन जलाते हैं. महत्वपूर्ण है कि सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्योगों (एमएसएमई) का अर्थव्यवस्था में 30% से अधिक योगदान है और सरकार इसे 50% तक बढ़ाना चाहती है.

यादव के मुताबिक, "न केवल बहुत सारी छोटी इंडस्ट्री गैरकानूनी तरीके से चल रही है इनमें इस्तेमाल हो रहे ईंधन, कार्य के घंटों और निकलने वाले प्रदूषण को लेकर कोई पारदर्शिता नहीं है. हम चाहते हैं जहां भी संभव हो इन उद्योगों को संचालित करने के लिए उन्हें गैस कनेक्शन से जोड़ा जाए. बहुत से इलाकों में गैस उपलब्ध है और ऑपरेटर कनेक्शन देने को तैयार हैं तो इसे जरूर लागू किया जाना चाहिए. इसके अलावा उद्योगों के आंकड़े और प्रदूषण सार्वजनिक होने चाहिए. किसी इलाके में कोई इंडस्ट्री कितना प्रदूषण कर रही है इसके बारे में वहां रह रहे लोगों को पता होना चाहिए. इससे वायु प्रदूषण से लड़ने में लोगों की सक्रिय भागेदारी बढ़ेगी और सरकार को बजट में ऐसी नीति के लिए प्रोत्साहन जरूर देना चाहिए.”

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